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प्रांत 29

👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀 ~~~~~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा,विज्ञ *दोहे के रूप में,एक प्रयास, .....* देखिए सार्थक हुआ क्या ? भारत के 29 राज्यों के नाम.. *उप अपंगु आजहि उमे,* .           *अत्रि झाक सिउ राम।* *गोमि बिमत 'छग' के हते,* .            *'विज्ञ प्रांत के' नाम।।* 🌞 उ - उत्तर प्रदेश         🌞 गो - गोवा 🌞 प - पश्चिमी बंगाल     🌞 मि - मिजोरम 🌞 अ - अरुणाचल प्रदेश 🌞 बि - बिहार 🌞 पं - पंजाब               🌞 म - महाराष्ट्र 🌞 गु - गुजरात             🌞 त - तमिलनाडु 🌞 आ - आंध्रप्रदेश        🌞 'छग' - छत्तीसगढ़ 🌞 ज - जम्मू - कश्मीर    🌞 के - केरल 🌞 हि - हिमाचल प्रदेश    🌞 ह -  हरियाणा 🌞 उ - उत्तराखंड           🌞 ते - तेलंगाना 🌞 मे - मेघालय       ,                    ...

दोहा: पाँलीथिन

👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀 ~~~~~~~~~~~~~~_बाबूलालशर्मा,विज्ञ_ .                     *दोहा छंद* .               🌹 पाँलीथिन 🌹 .                    👀🌹👀 पाँलीथिन से  अट रहे, गली पन्थ घर द्वार। धरती  सागर  गौ नदी, होते सतत शिकार।। जलपथ के अवरोध से, दूषित हैं जलस्रोत। पाँलीथिन खा  गौ मरे, मछली पोत कपोत।। रखते  रोटी  साग फल, पाँलीथिन में डाल। बचे हुए  को  फेंकते, यही  गाय का  काल।। पाँलीथिन भर फेंकते, बासी भोज्य पदार्थ। गाय सड़क पर खा रही, यह कैसा परमार्थ।। अब पाँलीथिन  बन्द कर, पर्यावरण सुरक्ष। गाय धरा नदियाँ  बचे, हरियाली हित वृक्ष।। .                    👀👀👀 ✍© बाबू लाल शर्मा, बौहरा, विज्ञ  निवासी - सिकन्दरा,  दौसा  राजस्थान ३०३३२६ 👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀

प्रेम विरह के दोहरे

👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀 ~~~~~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा,विज्ञ ❤️🌹 *प्रेम - विरह के दोहरे......*🌹❤️ १ जैसे भी तुम हो जहाँ, खुश रहना मन मीत। दोष  हमें  देना  नही, मिले  तुम्हे  हर जीत।। २ सुप्त करो मन को नहीं, खिलते बनो गुलाब। प्रीति रीति यों पालिए, कलकल बहे चिनाब।। ३ बाट देख  कर सो  गया, खिले न  तारे रात। नेह ढूँढ़  कर खो  गई, यादों  की   बरसात।। ४ तकता रहूँ चकोर बन, शशिसम तुम को मीत। मेघ  बीच  में  आ  रहे, निभे  न  दर्शन  प्रीत।। ५ प्रेम सभी  चाहे  मनुज, हर पल मन सम्मान। देना  वह  चाहे  नही, प्रेमिल  मन  प्रतिदान।। ६ प्रेम  प्रेम  सब जन कहें, करे  असंख्यों  लोग। मनुज निभाते भी बहुत, कुछ समझे यह रोग।। ७ रूठ रूठ कर प्रेम का, बुनते निश दिन जाल। मीत स्वयं ही फँस रहे, सहज काल की चाल।। ८ पड़े  गँठीली  गाँठ बहु, उलझे  मन की डोर। सुलझाए  सुलझे  नहीं, पचे  रात  हो  भोर।। ९ प्रीति पुष्प कुम्हले मनुज, खिले न फ...

भोर महारानी जगो

👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀 ~~~~~~~~~~~~~~~_बाबूलालशर्मा,विज्ञ_ .            🌼 *दोहा छंद शतक* 🌼 .           🌹भोर महारानी जगो 🌹 .              👀🌹१००🌹👀 १ प्राकृत छटा निहारिए, सुन चिड़ियों का शोर। भोर  महारानी  जगो,  मौसम  है  चित चोर।। २ जागे खग मृग और जन, भक्त सहित भगवान। भोर  महारानी  जगो,  हुआ  नवल   दिवमान।। ३ कुसुम खिले गुलदान सी, लगी कामिनी देह। भोर  महारानी  जगो,  बरसे  सरस   सनेह।। ४ नेह  मेह  से  देह  में,  उठती  रही  हिलोर। भोर महारानी जगो, सुनकर कलरव शोर।। ५ देह थके मन शांत है, झूम रहे मन भाव। भोर महारानी जगो, डग मग होती नाव।। ६ घन गरजे नभ दामिनी, पुरवाई का शोर। भोर  महारानी  जगो, तकते मोर चकोर।। ७ मौसम हुआ सुहावना, पुरवा चली बयार। भोर महारानी जगो, प्राकृत  रही  दुलार।। ८ सावन की सरगम बजी, नभ छाए घन श्याम। भोर  महारानी  जगो,  तज ...

महादेवी वर्मा

👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀 ~~~~~~~~~~~~~~~_बाबूलालशर्मा,विज्ञ_ .                       *दोहा छंद* .                 🌹 महादेवी 🌹 .                    👀🌹👀 छायावादी  काल  में, हुए  चार कवि  स्तंभ। महा  महादेवी  हुई, एक  प्रमुख  थी  खंभ।। सन  उन्नीस् सौ सात में, माह  मार्च छब्बीस। जन्म फर्रुखाबाद में, फलित कृपा जगदीश।। इन्हे आधुनिक काल की, मीरा कह उपनाम। करे प्रशंसा लोग सब, किए काव्य हितकाम।। कहे  निराला जी  बहिन, सरस्वती नव नाम। भाई सम रखती  उन्हे, विपदा  में कर थाम।। उपन्यास लिखती कभी, कथा कहानी गीत। नारायण वर्मा  सुजन, पति साथी मन मीत।। दीपशिखा  अरु  नीरजा, सांध्यगीत  नीहार। रश्मि  सप्तपर्णा  रची, चकित  हुआ संसार।। काव्य  अग्निरेखा  रचे, और  प्रथम आयाम। रेखा चित्रों  में  रचित, संस्मरण   सुख ...

कुण्डलिया बादल

👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀 ~~~~~~~~~~~~~~_बाबूलालशर्मा,विज्ञ_ .            🌼 *कुण्डलिया* 🌼 .            💧 वर्षा/बादल 💧 *बादल नीरद मेघ घन, वारिद जलद पयोद।* *अम्बुद जलधर वारिधर, वारिवाह भू  मोद।* *वारिवाह  भू  मोद, धराधर   जल  बरसाते।* *धरती  पर  असमान, बाढ़  या  सूखा लाते।* *'विज्ञ'  पयोधर हेतु, बजे  स्वागत में मादल।*  *वर्षा  करो  समान, धरा के हित कर बादल।* .                     🦚💧🦚 ✍© *बाबू लाल शर्मा, बौहरा,'विज्ञ'* *सिकन्दरा,  दौसा  राजस्थान* 👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀

नवगीत- प्रीत की रीत

👀👀👀👀👀👀👀👀👀 ~~~~~~~~~~_बाबूलालशर्मा,विज्ञ_ *गंगोदक सवैया*  आधारित २१२ २१२ २१२ २१२, २१२ २१२ २१२ २१२ .        🌼  *नवगीत*  🌼 *प्रीत की रीत का गीत गाते रहे,* *मीत वे  शीत में  पात जैसे दहे।* *छंद के द्वंद से  फंद में जिंद से,* *नंद  के  चंद्र  में इंद्र  जैसे  रमें।* *दोहरे   दोहते   दोहरे   ही  हुए,* *दो  रहे  दो  बहे  दो गए दे हमें।* *बात वे याद हैं  रात भारी कटे,* *ज्ञात है घात वे शांत होते सहे।* *प्रीत...............................।।* *संग में  अंग थे  नंग जन्मे  सखे,* *रंग के  चंग भी  भंग  जैसे  गमे।*      *केश भी कृष्ण वे क्लेश देते नये,* *'विज्ञ' होते वही  श्वेत हो के जमे।* *ढंग  से  दंग  हो  नैन हो  गंग से,* *कंक से शंख के  पंक  धोते बहे।* *प्रीत.................................।।* *वेष हीने  जने  देश  में  मेष  से,* *द्वेष आवे...