आपबीती, जगबीती

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बाबू लाल शर्मा©
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*आप बीती,जग बीती*
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शीश महल की बात पुरानी,
रजवाड़ी  किस्से अनजाने।
हम  भी   शहंशाह  है,  बंधु,
शीश  पटल    के   दीवाने।🙏

आभासी  रिश्तों  के कायल,
कविताई    के       मस्ताने।
कर्म विमुख साधु सा जीवन,
और  व्याकरणी   है पैमाने।🙏

कुछ तो नभमंडल जैसे तारे,
कुछ  मुझ  जैसे  घसि यारे।
काम  छोड़  कविताई करते,
दुखी  भये सब के  घर वारे।🙏

संचालक   मंडल  में रहूँ तो,
जाने   माने     वारे    न्यारे।
मुखिया बनूं शक्ति मान सम,
जिसको चाहे तारे चाहें मारे।🙏

मैं भी शीश  पटल सत संगी,
तुम  भी  मेरे  साथ   सयाने।
पंख हीन बिन दीपक जलते,
हम तो बिन मौसम  परवाने।🙏

सुप्रभात  से   शुभ रात्रि तक,
शीशपटल पर टिक रहता हूँ।
घरवाली दिन रैना  मारे  ताने,
जाने  बिन जाने सहता    हूँ।🙏

नदिया,  मे  बुंदिया  की जैसे,
स्वप्न  लोक    में   बहता  हूँ।
मनोभाव   ऐसे   रहते   ज्यों,
शीश महल  मे  हीे रहता  हूँ।🙏

इसी  पटल पर भी  रह लेता,
अन्य पटल  भी मंडराता  हूँ।
संदेशे  पढ़  पढ़  कर  मै, तो,
भँवरे  सा नित  भरमाता  हूँ।🙏

चैन पटल  बिन नहीं मिलता,
और  पटलों   पर   बेचैन हूँ।
नैन पटल में क्या क्या खोजे,
लागे   घर  में   बिना  नैन हूँ।🙏

कैसे,  अनुपम  रिश्ते   जोड़े,
सब  आभासी  प्रतिबिंबो से।
धरा  धरातल   भूल  रहें,हम,
दूर  हो  रहे  सत  बिम्बो  से।🙏

जीवन ही आभास मात्र  अब,
शीश पटल  के  आचरणों  में।
जैसे    शहंशाह      रमते   थे,
शीश महल  के सत वरणों में।🙏

मूल भूत,  अन्तर   पहचाना,
कैसा,   हुआ    परि  हास है।
वो, तो शीश महल के स्वामी,
हम, शीश पटल सन दास हैं।🙏

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बाबू लाल शर्मा "बौहरा
सिकंदरा,दौसा(राज.)
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