सागर वंदन
. 🌸 *सागरवंदन्* 🌸
--🌸-- सागर के 27 नाम --🌸--
जलबिनथल क्या कल्पना,सृष्टा *रत्नागार*।
वरुणराज तुमसे बने , धन्य हो *नीरागार*।
अगनित नदियां उमड़ी चली आती *नदीश* में।
सब तटिनी तटतोड़,समाती जाती *बारीश* में।
विविध रूप विशालकाय प्राण *जलागार* है।
पुरातन सभ्यतावशेष की , नींव *पारावार* है
हृदय मध्य जतन से *रत्नाकर* ही रखता है।
परिघटनाओं को *उदधि* संभाले ही रहता है।
रहता सदा मान मर्यादा के साथ ही *कंपति*।
कभी न छोड़े इनका संगसाथ भी रमापति।
देव असुरों ने मिल *सागर* मंथन कर लिया।
हलाहल विष शिवशंभु ने कंठ में धर लिया।
बाँट दिये सृष्टिहित ,चौदह रत्न किये साकार।
लक्ष्मी श्रीहरि की हुई,देवों कोअमृत की धार।
*क्षीरसिंधु* बन के हरि के आश्रय बन गये।
बीच *नीरनिधि* शेष विष्णु शैय्या बन गये।
*जलधि* तुम हो शांति के भक्तिपुंज भार से।
*वारिधि* बंध रामसेतु रामशक्तिपुंज सार से।
आज भी अवशेष *अकूपाद* में जो बसरहे।
राघव धर्म की कर्मठता बखान वो कर रहे।
*पयोधि* मछुओं की जीविका है तुमसे ही।
देश विदेश की सीमाएं *समुद्र* है तुमसे ही।
*पंकनिधि* व्यापार के ये केन्द्र बंदरगाह है।
सीमाओं पर *तोयनिधि* करते आगाह है।
*अंबुधि* अन्वेषण होते ही रहते अविराम से।
*जलनिधि* विविध वस्तु , संभावना धाम से।
साधन संपन्न पोत यहाँ,रहते आते जाते हैं।
युद्ध शान्ति की विश्व की रीत को निभाते हैं।
द्वारिका ,जगन्नाथ, रामेश्वरम *जलधाम* है।
कपिल मुनि का वहाँ आश्रम अभिराम है।
*बननिधि* मनुज के मन शमन कर भ्रान्ति।
*महासागर* तुम करो सब जनमन शान्ति।
विवेक शिला को देख आती भारती मे क्रांति।
क्रांति केअग्रदूत की हिन्द *सिन्धु* में विश्रांति।
अगाध *समन्दर* की गम्भीरता ही धीरता है।
मान्य *अर्णव* की शीतक्षारवीचिअसीमता है।
द्वीप महाद्वीप प्रायद्वीप, भूमि के श्रृंगार से।
खार सार पी लिया है चन्द्र के अभिसार से।
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उक्त 👆रचना में सागर के 27 नामोल्लेखित है।
🙏🏻रचनाकार-
बाबू लाल शर्मा "बौहरा"
सिकन्दरा,दौसा
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