कभी कभी....
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*कभी कभी....*
कहाँ व्यस्त हो सभी साथियों,
इसी पटल पर आओ ना।
अज्ञानी हूँ मै तो भाई,
मुझको ज्ञान सिखाओ ना।
कभी कभी यह शीशपटल,
सूना क्यों हो जाता है।
सबके चुप हो जाने से
मन मेरा घबराता है।
हिन्दी सारथी सखा हमारे,
कहाँ व्यस्त हो जाते हो।
बहिने भी गृहकाज संभाले,
आप कहाँ खो जाते हो।
एक अकेले दम घुटता है,
शीशपटल पर आओ तो।
सब के संग में अपने तराने,
गाओ और सुनाओ तो।
पुण्य पटल के तुम्ही सितारे,
हिन्दी के तुम गौरव हो।
हमसे कभी खफ़ा नहीं होना,
इस उपवन के सौरभ हो।
माँ शारद के वरद पुत्र हो,
पुण्य प्रकाश हो भाषा के।
मेरे तो सब भाँति पुज्यवर,
आशा और अभिलाषा के।
सीख और आशीषें रखना,
नेह स्नेह अभिलाषी हूँ।
कविताई मै तुम से सीखूँ,
रीत प्रीत उपवासी हूँ।
✍©
बाबू लाल शर्मा
सिकंदरा,दौसा
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