टूटते परिवार...
टूटते ...बिखरते...
बिसरते...प...रि...वा...र
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*परिवार*
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कहाँ अब साझे के घर बार,
मर चुकेअब तो वे परिवार।
बरगद की डाली की मंशा,
मनी प्लांट की तलब गार।
घर की नई परि भाषा मे,
आया है एकल परिवार।
आँगन नाम रह गया शेष ,
बचा बस यादों मे परिवार🌳
हम उनको भी करलें याद,
कहाँ हैअब असलीपरिवार🌳
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पहले था दादा दादी का साथ ।
सब,नाती,पोत बहू और सास ।
घर के साझे चूल्हे पर पकता था,
सबका भोजन संग,संग विश्वास।
जिनमें सतत नेह,करुणादुलार।
कहाँ है वे असली परिवार🌳
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रिश्तों के दर्पण,घट कच्चे,
हो गए किर-किर कच्चे
दायरा मैं,और बीबी बच्चे
सब झूठे केवल हम सच्चे
माँ बाप नहीं रहे परिवार के हिस्से।
तो समझिये कहाँ बचेंगे वे किस्से।
नही रहा आगत का सत्कार,
कहाँ है वे असली परिवार🌳
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माँ बाप ही आर्थिक चका चौंध में।
विकास व धन की अंध-धुंध में।
बेटों को घर से बहुत दूर,
उन्हे बनाना है जी हजूर
हाँस्टल पढ़ाते है जरूूर,
परिवारी संपर्को से ..दूर।
रहे ना कोई भी तक रार,
कहाँ है वे असली परिवार🌳
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घरपरिजन से दूर हो गये पढ़ने के बहाने,
बदलने लगते है उनकी सोच के पैमाने।
वंचित होते हैं प्रेम से जाने अनजाने।
संस्कार क्या होते ,ये बच्चे कैसे जाने।
जहाँ पर मिलते हों संस्कार,
कहाँ है वे असली परिवार🌳
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आज की शिक्षा हुनर सिखाती है।
पर मान,संस्कार नही दे पाती है।
पढ़ लिख के बेटा डॉलर की लूट मचाता है,
धन की चका चौंध में परदेशी बन जाता है।
माँ कब मर जाती पता नही चल पाता है,
बाप को कंधा देने, नहीं वक्त पे आता है।
हुआ ऐसे जीवन निस्सार,
कहाँ है वे असली परिवार🌳
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कुछ बस जाते हैं,बैंगलोर,गुड़गांव में,
लौटते नहीं माँ,बाप, घर,की छांव में।
लगता वृद्ध जनो का भार,
कहाँ है वे असली परिवार🌳
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गत वर्षों की एक कहानी,
विधवा माँ की रामकहानी
बेटा पुस्तैनी घर बेच गया ,
माँ का विश्वास तोड़ गया।
माँ को यतीम की तरह,
हवाईअड्डे पर छोड़ गया।
उसने तोड़ा दैव करार ,
कहाँ है वे असली परिवार🌳
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सुना एक नालायक ने
माँ के एकल पायक ने
माँ को फोन नहीं किया,पूरे एक साल।
आया तब देखा निज माँ का कंकाल।
माँ से मिलना केवल एक बहाना था।
असली मकसद घर बेचकर खाना था।
कर लिया जीवन कपटकरार,
कहाँ है वे असली परिवार🌳
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घरेलू प्रेम के खत्म हो रहे है पेटे ।
धन के लिए लड़ रहे,सगे बाप,बेटे।
एक नामी सेठ को लाले पड़े खाने में।
बेटे का निकाला,अब डोले कोर्ट थाने में।
हो गया उसका बंटा ढार ,
कहाँ हैं वे असली परिवार🌳
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काम काजी जोड़े,
अब हो गये भगोड़े,
कमाई की देते दोनो ही धौंस।
बच्चों के लिए दोनो मद हौंस।
पति अपनी बीबी का सगा नहीं।
बीबी भी सगे पति की बफा नहीं।
बच्चों के लिए दोनो बेबफा ही माने।
दूजों पर विश्वासअधिक अपने बेगाने ।
नहीं है अपनो पर विश्वास,
कहाँ है वे असली परिवार🌳
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परिवार तोड़ने में कानून बो रहा बीज।
भाई बहन बाँटतेे बाबुल की दह लीज।
बचे क्या भाई बहन का प्यार ,
कहाँ है अब वैसा परिवार🌳
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जो लिवइनरिलेशनशिप माने जाइज,
और मान ली जो कॉन्ट्रैक्ट मैरीज।
न फेरे,जीमन,शादी न भीड़ जमघट
सास ससुर मर्यादा,न कानूनी झंझट
वे बंधन हो गये तार तार,
कहाँ है अब वैसे परिवार🌳
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पति पत्नी बिने परिवार कैसे बसते।
कॉन्ट्रैक्ट खत्म,चल दिए अपने रस्ते।
इस दौरान जो बच्चे हुए है
पलते यतीमों की तरह है
खाते है गम और गालियां,
सहते है तिरस्कार तालियां ।
करे तब दुनिया से तकरार,
कहाँ हैअब असलीपरिवार🌳
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मीलों पीछे छूटगए नाते रिश्तेदार,
धन के घन से टूट रहे घर द्वार,
टूट चुके नेह युक्त परिवार,
टूट रहा है इंसानों का प्यार ।
घट गये साझे के घर बार,
कहाँ हैअब असली परिवार🌳
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परिवारों का इस पीढ़ी ने
ऐसा सत्यानाश किया है।
आने वाली नई पीढ़ी को
यह किस्सा दान दिया है...
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"एक ऐसा था संसार
देश मे होते थे घरद्वार
,प्रेम से रहते परिजन साथ.
उसे ही कहते थे *परिवार*
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सादर,🙏
बाबू लाल शर्मा
नि.सिकंदरा,दौसा
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