घूँघट
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ढूँढाड़ी दोहा छंद~~~~~~~~बाबूलाशर्मा
. *घूँघट प्रथा*
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1...🧕
घूंधट पर्दा री प्रथा, समय काल अनुसार।
देश अजादी मिल चुकी,अब बदलाव बयार।।
2.....👨🎨
परदेशी निजराँ बचै, बिटिया बहू हमारि।
लाज शर्म बड़काँन की,घूँघट माहि सँभारि।।
3.....🕵♀
जे पढ़लिख जावै नारियाँ,प्रगतिअवसर पाय।
राजनीति अरु नौकरी, बणिज देखती जाय।।
4.....👩🌾
अब तो घूँघट छोड़कर,करो विकासी बात।
लाज शर्म आँख्यान की, घूँघट तो आघात।।
5.....👧🏻
करो नौकरी ठाठ सूँ राजनीति व्यौपार।
मर्यादा पालन करो, सदाचार व्यौहार।।
6.....👩🏻
बेटी संग में बींदणी, पढ़बा लिखबा जाय।
स्कूटी या साईकिलाँ, खुद ही लेव चलाय।।
7.....🙆♀
मोटर कार चलाण रो, खूब हुयो अभ्यास।
घूँघट मैं रहताँ कियाँ, करती सबै प्रयास।।
8.....🙋🏻
छोड़ सकै नही रीत तो,कम सूँ कम कर लेव।
सत मरयादा राखताँ, बदलो घूँघट टेव।।
9.....🤷♀
दुनिया आकाशाँ चढ़ै, चन्दा पै घर लेय।
आपाँ घूँघट काढ़ कर, काँई नतीजो देय।।
10....🤷♀🤷♀
प्रतियोगी युग चालतो, नहीं बोदाँ को सीर।
बढ़ आगै तैयार व्है, छोड़ो घूँघट पीर।।
11......🙋🏻🙋🏻
महिलाँ खूब विकास हो,शिक्षित हो बहु,सास
शरमा बाबू लाल री , सबसूँ या अरदास।।
🧕👩🏻👧🏻👩🌾🕵♀👨🎨🙆♀🤷♀
✍🙏©
बाबू लाल शर्मा "बौहरा"
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
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