भाग्य
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~~~~~~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा
. *भाग्य*/मुकद्दर/नसीब
. दोहा छंद
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भाग्य मुकद्दर से बने, कर्म नसीबी खेल।
माधव भी न करा सके,कौरव पाण्डव मेल।।
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भाग्य लिखा वनवास जो,कौशल सीता मात।
त्रिलोकी थे राम जी, लगी न कोइ बिसात।।
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पाँच पति जग जीत थे, पांचाली के भाग।
जीवन भर जलती रही,द्रुपद सुता बिन आग।
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भाग्य बदलता कर्म से,कहता सकल जहान।
मानव अपने कर्म से, जग में बने महान।।
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कृषक धरा के भाग्य को,लिखते हल के नोंक
अपने भाग्य न लिखसके,होयन कभी अशोक
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सरकारों के भाग्य का, करे फैसला वोट।
जनगणमन के भाग्य को,जो पहुँचाते चोट।।
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खेती करे किसान जो ,भाग्य भरोसे होय।
प्रतिदिन घाटा खा रहे,कबहुँ न आपा खोय।
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गाय सभी माता कहे, आदि सनातन बोल।
हुआ भाग्य का खेल ही,आवारा रही डोल।।
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भाग्य भरोसे ही रहा, भारत देश गुलाम।
आजादी तब मिल गई, जागा जब आवाम।।
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भाग्य भरोसे ही रहे, जग मे लोग गरीब।
किसको मिलते ताज है,किसको मिले सलीब
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भाग्य और संयोग से,हरिश्चन्द्र से रंक।
धर्मराज बैराठ में, बने भाग्य से कंक।।
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भाग्य समय का फेर है,होता जो बलवान।
भील लूटले गोपिका, वही पार्थ के बान।।
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भाग्य मुकद्दर कर्म से, बन जाते संजोग।
कोई शोक विशोक में, कोई छप्पन भोग।।
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कर्म करो निष्काम तो,बन जाता है भाग्य।
सतत परिश्रम से बने,पुरुषारथ सौभाग्य।।
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भाग्य भरोसे मत रहो, करिए सतत सुकर्म।
मिले भाग्य काया मनुज,सभी निभाओ धर्म।
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बाबू लाल शर्मा"बौहरा"
सिकंदरा, दौसा,राज.
9782924479
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