पिता
👀👀👀👀👀👀👀बाबूलालशर्मा
. 🏉 *दोहा छंद* 🏉
. 🙌 *पिता* 🙌
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. 🌹१🌹
ईश्वर को देखा नहीं, पहचाना प्रतिरूप।
दानी पिता दधीचि सा, होता ब्रह्म स्वरूप।।
. 🌹२🌹
धीरज धरती सा रखे, सागर सा गम्भीर।
पुत्र हेतु नद बाढ़ में, वासुदेव सा वीर।।
. 🌹३🌹
सुत हित बस इंसान में, प्रबल पिता का नेह।
राम गये वनवास में, दशरथ मरते गेह।।
. 🌹४🌹
बाबर का जीवन पढ़ा, सुत के हित अरमान।
रोग हुमायू का लिए, तजे पिता ने प्रान।।
🌹५🌹
उत्तर में ध्रव सा पिता, पूरब तारा भोर।
दक्षिण पितु सागर लगे, पश्चिम थमती डोर।।
. 🌹६🌹
शिक्षक जैसे ताड़ता, लगता हृदय कठोर।
तन से बोले रुक्षता, मन पितु उठे हिलोर।।
. 🌹७🌹
हिमगिरि सा सीना लिए, अड़े लड़े सुत हेतु।
सृष्टिचक्र निजवंश हित, पिता समन्दर सेतु।।
. 🌹८🌹
जीर्ण शीर्ण तन को करे,संततिहित अवसान।
रात दिवस श्रमशील हो, चाहे सुत अरमान।।
. 🌹९🌹
पाई पाई जोड़ता, संतति हो धनवान।
चाह पिता की ये सदा, लगती ज्यों वरदान।।
. 🌹१०🌹
हारे दुनिया से नहीं, करता है संघर्ष।
संतानो से हारना, चाहे पिता सहर्ष।।
. 🌹११🌹
खीजे अरु छीजे पिता, संतति के कल्याण।
रींझे संतति सफलता, भूल स्वयं निर्वाण।।
. 🌹१२🌹
मनुज पिता आशीष में, होता भारी भाव।
सेवा से मेवा मिले, मत देना तू घाव।।
. 🌹१३🌹
पितु बरगद सा आँसरा, अम्बर जैसी छान।
संतति हित वरदान है, करे नहीं अभिमान।।
. 🌹१४🌹
पाले पिता परंपरा, पालन प्रेम प्रतीत।
पुत्री,पत्नी,पुत्र प्रिय, परिवारी,पर प्रीत।।
. 🌹१५🌹
पिता पूत रिश्ते भले, निभे अभी तक मीत।
अब तो जग में हो चली, सब रिश्ताई शीत।।
. 🌹१६🌹
सुतहित मित से शत्रुता,गुरबत के स्वीकार्य।
शीश कटाया आपका, सुत हित द्रोणाचार्य।।
. 🌹१७🌹
वर्तमान के पूत तो, बनते राजापूत।
बाप बिचारा पचि मरे, एकहिं पूत कपूत।।
. 🌹१८🌹
जनम गँवाता है पिता, स्वार्थ संतति वंश।
वृद्धावस्था में सखे, सुत क्यों देता दंश।।
. 🌹१९🌹
साथ पुत्र का मिले तो, बढ़े पिता उत्साह।
सुत कपूत संयोग से, घर होता गुमराह।।
🌹२०🌹
ईश्वर के सम तात है, करना मत अपमान।
चाह पिता की बस यही, बढ़े वंश का मान।।
. 🌹२१🌹
गरिमा महिमा तात की, करूँ नमन नतशीश।
शर्मा बाबू लाल कहि, दोहे लिख इक्कीस।।
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✍✍©
बाबू लाल शर्मा "बौहरा"
सिकंदरा, दौसा,राजस्थान
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