पिता
🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚~~~~~~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा
. *विधाता छंद*
विधान- १२२२ १२२२ १२२२ १२२२
. 🌹 *पिता* 🌹
. ("सम्मानार्थ शब्दमाल")
. 💫🙌💫
सजीवन प्राण देता है, सहारा गेह का होते।
कहें कैसे विधाता है,पिताजी कम नहीं होते।
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मिले बल ताप ऊर्जा भी,
. सृजन पोषण सभी करता।
नहीं बातें दिवाकर की,
. पिता भी कम नही तपता।
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मिले चहुँओर से रक्षा,करे हिम ताप से छाया।
नहीं आकाश की बातें,पिताजी में यहीं माया।
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करे अपनी सदा रक्षा,वही तो शत्रु के भय से।
नहीं बातें हिमालय की,पिता मेरे हिमालय से
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बसेरा सर्व जन देता, स्वयं साधू बना रहता।
नहीं देखे कहीं पौधे,पिता बरगद बने सहता।
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करे तन जीर्ण खारा जो,
. सु दानी कर्ण सा मानो।
मरण की बात आए तो,
. पिता दशरथ मरे जानो।
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जगूँ जो भोर में जल्दी, मुझे पूरव दिखे प्यारे।
पिता ही जागते पहले,कहे क्यों भोर के तारे।
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कभी बाधा हमे आए,
. उसी से राह दिखती है।
नही ध्रुव की कहूँ बातें,
. पिता की राय मिलती है।
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कहें वो यों नही रोता, रुदन भारी नहीं रहता?
रिसे नगराज से झरने,पिता का नेत्र है झरता।
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नदी की धार बहती है,हिमालय श्वेद की धारा,
पिता के श्वेद बूंदो से,नहीं ,सागर कहीं खारा।
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झरे ज्यों नीर पर्वत से,
. सुता कर,पीत जब करने।
कभी आँखें मिलाओ तो,
. पिता के नेत्र हों झरने।
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महा जो नीर खारा है,
. पिता का श्वेद खारा है।
समन्दर है बड़े लेकिन,
. पिता कब धीर हारा है।
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कहें गोदान का हीरो, अभावो का दुलारा है।
दिखाई दे वही होरी, पिता भी तो हमारा है।
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पिता में भावना जागे,कहें हदपार कर जाता,
अँधेरीे रात यमुना में,पिता वसुदेव ही आता।
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सजीवी जाति प्राकृत से,अजूबे,मोह है पाता।
भले मौके कहीं पाए, वही धृतराष्ट्र हो जाता।
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निराली मोह की बातें,पिता जो पूत पर लाते।
सुने सुत घात,जो देखो,गुरू वे द्रोण कट जाते
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पिता सोचे सभी ऐसे,सुतों की पीर पी जाए।
हुमायू रुग्ण हो लेकिन, मरे बाबर वहीं पाए।
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अहं खण्डर कँगूरों कर,
. इमारत नींव कहलाता।
कभी जो खुद इमारत था,
. पिता दीवार बन जाता।
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विजेताई तमन्ना है, पुरुष के खून में हर दम।
भरे सुत में सदा ताकत,पिता हारेअहं बेगम।
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न देवो से डरा यारों, सदा रिपु से रहे भारा।
मगर हो पूत बेदम तो, पिता संतान से हारा।
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रखें हसरत जमाने में,महल रुतबे बनाने का।
पिता अरमान पालेंगे,विरासत छोड़ जानेका।
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पिता ने ले लिया भी तो,बड़े वरदान दे जाता,
ययाती भीष्म की बातें,जमाने,याद है आता।
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नरेशों की रही फितरत,लड़ाई घात की बातें।
सुतों हित राजतज देते,चले वनवास में जाते।
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उसे नाराज मत करना,वही तो भव नियंता है,
सितारे टूट से जाते, पिता जब क्रुद्ध होता है।
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पिता की पीठ वे काँधे,बड़े ही दम दिखाते हैं।
जनाजा पूत का ढोतेे, पिता दम टूट जाते है।
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बड़ा सीना, गरम तेवर, गरूरे दम बने रहते।
विदा बेटी कभी होती,पिघल धोरे वही बहते।
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बने माँ की वही महिमा, सुहाने गीत की बाते।
हिना की शक्ति बिंदी के,पिताजी स्रोत है पाते
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मिले शौहरत रुतबे ये,बने दौलत सभी बाते।
रखे वे धीरगुण सारे, पिता भी मातु से पाते।
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दिए जो अस्थियाँ दानी,
. दधीची नाम,था ऋषि का।
स्वर्ग के देवताओं पर,
. महा अहसान था जिसका।
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मगर सर्वस्व जो दे ते ,कऱें सम्मान उनका भी।
पिता ऐसा तपी होता,रहेअहसास इसका भी।
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विधाता छंद में देखें,सभी बाते पिता पद की।
न शर्मा लाल बाबू तू,अमानत है विरासत की।
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सादर✍.©
*बाबू लाल शर्मा* बौहरा
सिकंदरा 303326
जिला--दौसा (राजस्थान)
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