श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
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~~~~~~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा
. 🌕 *कुण्डलिया छंद* 🌕
. 🌞 *श्रीकृष्ण जन्माष्टमी* 🌞
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छीने शासन तात का, उग्रसेन सुत कंस।
वासुदेव अरु देवकी, करे कैद निज वंश।
करे कैद निज वंश, निरंकुश कंस कसाई।
करता अत्याचार, प्रजा अरु धरा सताई।
कहे लाल कविराय, निकलते वर्ष महीने।
वासुदेव संतान, कंस जन्मत ही छीने।
. .......👀 २ 👀.....
बढ़ते अत्याचार लख, भू पर हाहाकार।
द्वापर में भगवान ने, लिया कृष्ण अवतार।
लिया कृष्ण अवतार, धरा से भार हटाने।
संत जनो हित चैन, दुष्ट मय वंश मिटाने।
कहे लाल कविराय,दुष्ट जन सिर पर चढ़ते।
होय ईश अवतार, पाप हैं जब जब बढ़ते।
. ....👀 ३ 👀.....
भादव रजनी अष्टमी, लिए ईश अवतार।
द्वापर में श्री कृष्ण बन, आए तारनहार।
आए तारनहार , रची लीला प्रभुताई।
मेटे अत्याचार, प्रीत की रीत निभाई।
कहे लाल कविराय,कृष्ण जन्में कुल यादव।
जन्म अष्टमी पर्व, मने अब घर घर भादव।
(भादव~भादौ,भादों,भाद्रपद, भादवा )
. .....👀 ४ 👀....
लेकर जन्मत कृष्ण को,चले पिता निर्द्वंद।
वर्षा यमुना बाढ़ सह, पहुँचाए घर नंद।
पहुँचाए घर नंद, लिए लौटे वे कन्या।
पहुँचे कारागार, कंस ने छीनी तनया।
कहे लाल कविराय, नेह माता का देकर।
यशुमति करे दुलार, नंद हँसते सुत लेकर।
. .....👀 ५ 👀.....
पालन हरि का कर रहे, नंद यशोदा गर्व।
मनती है जन्माष्टमी, तब से घर - घर पर्व।
तब से घर-घर पर्व, खुशी गोकुल में मनती।
शिशु को लेने गोद, होड़ नर नारी ठनती।
कहे लाल कविराय, हुआ ब्रज सारा पावन।
जग का पालनहार,करे माँ यशुमति पालन।
. ......👀 ६ 👀.......
कौरव पाण्डव युद्ध में, बने कृष्ण रथवान।
गीता के उपदेश में, देते ज्ञान महान।
देते ज्ञान महान , धर्म हित युद्ध ठनाएँ।
बने कन्हैया कृष्ण,रूप जो विविध बनाएँ।
कहे लाल कविराय,सनातन कान्हा गौरव।
रखे विदुर का मान, हराए रण में कौरव।
. .....👀 ७ 👀......
गाते गिरधर लाल की, सभी निराली नीति।
गोधन ग्वाले गोपिका, ब्रजतरु उत्तम प्रीति।
ब्रजतरु उत्तम प्रीति,सखे जलजमुना सजते।
मिटे सकल जंजाल,कालिये फन पर नचते।
कहे *लाल* कविराय, मिताई प्रीत निभाते।
कृष्ण कन्हैया लाल, समर में गीता गाते।
. .....👀 ८ 👀......
भारी वर्षा इन्द्र ने, कर दी कोपि घमंड।
सोच रहे ब्रजवासियों, लो अब भुगतो दंड।
लो अब भुगतो दंड, नही करते तुम पूजा।
आज बचाए कौन, धरा पर देखूँ दूजा।
कहे लाल कविराय, बने कान्हा गिरिधारी।
नख पर गिरिवर धारि, छत्र गोवर्धन भारी।
. . ....👀 ९ 👀......
साड़ी से इक चीर ले, बांधी कान्हा हाथ।
द्रुपद सुता के कर्ज को, याद रखे ब्रजनाथ।
याद रखे ब्रजनाथ, सखी बहिना सम माने।
सदा द्वारिका धीश, धर्म का पथ पहचाने।
कहे लाल कविराय,दुशासन नियति बिगाड़ी।
पांचाली हित लाज, कृष्ण विस्तारी साड़ी।
. .......👀१० 👀.....
मंदिर गोकुल द्वारिका, बने अनेको धाम।
गोवर्धन पथ गूँजता, राधे कृष्णा नाम।
राधे कृष्णा नाम, रटे जन देश विदेशी।
वृन्दावन सुखधाम, नारि. मीरा सम वेषी।
कहे लाल कविराय, कन्हाई शोभित सुन्दर।
घर-घर पूजित कान्ह,प्रशंसित मथुरा मंदिर।
. ......👀११ 👀......
राधे बड़ भागी हुई, यादें पुष्प सुवास।
सूर, देव, रसखान जी, मीरा अरु रैदास।
मीरा अरु रैदास, समर्पित भक्ति निभाई।
रचे बहुत से काव्य , गीत दोहा कविताई।
शर्मा बाबू लाल, छंद कुण्डलिया साधे।
दौसा जिले निवास,लिखे जय कान्हा राधे।
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✍©
*बाबू लाल शर्मा, बौहरा*
V/P सिकंदरा, जिला दौसा,
राजस्थान 303326
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