बेटी शतक

👩👩👩👩👩👩👩👩👩ढूँढाड़ी भाषा में बेटी की महिमा व बेटी को आत्मज्ञान का एक प्रयास....
            👩 *बेटी शतक*  👩
                    .     --------बाबूलालशर्मा
.       👩 "अथ श्री बेटी शतक" 👩
          .           दोहा-छंद
.                           🤷‍♀
1.👩
बेटी  घर  री  लाडली, माँ बापाँ   रो   चैन।
दिनकर छाया धूप जिमि, तारा  छाई  रैन।।
2.👩
बेटी घर री  लिच्छमी , सरस्वती रो  रूप।
नव दुर्गा  रो भेष या, जमना गंग  सरूप।।
3.👩
बेटी   घर  री  देहरी ,  दादा  दादी   साथ।
प्रात नमन दोपहरिया, संध्या बाती  हाथ।।
4.👩
बेटी  घर  री  आरती, शान   मान  अरमान।
कुटम कबीला सेतु सी,धरती अर् असमान।।
5.👩
बेटी  घर  री  रोशनी, धरा   करै  उजियार।
शिक्षा री सौगात है, बणै प्रगति  हथियार।।
6.👩
बेटी  सृष्टि  प्रसारणी ,जग माया  विस्वास।
धरती  पै  इमरत रची, काया साँसो साँस।।
7.👩
बेटी  जग दातार  भी ,यही  जगत  आधार।
जग री सेतु  समन्द यै, जण मन  देवा धार।।
8.👩
बेटी,  माँ   संसार  री, धरा   अमोलक  मोल।
कर्म धर्म संस्कार सत,संस्कृति इक अनमोल।
9.👩
बेटी   खेवण  हार  है, जग  नौका  दरियाव।
शुभदायी कुल पालकी, सत्य सुमंगल भाव।।
10.👩
बेटी  प्राकृत  धार  है , प्राकृत   री  बरदान।
प्राकृत री  ही उपज है, प्राकृत री अरमान।।
11.👩
बेटी  गुण  री खान  है, त्याग मान बलिदान।
राज धर्म तन तीन रो, सत्य शुभ्र अभिमान।।
12.👩
बेटी निज रो हनन है,पर ता रो निज मान।
लघुता  री बेड़ी नही, प्रभुता रो दिव मान।।
13.👩
बेटी,  सोना  पालकी , चाँदी   री  पतवार।
दोनी कुटमाँ  तारती, जग भवसागर पार।।
14.👩
बेटी  गीता  पाठ है, रामायण  'र' कुरान।
बाईबिल री  शान  है, महाभारती  आन।।
15.👩
बेटी नदिया तीर पर, नौका  विहग विमान।
दो  पाटाँ   नै   पाट  दे, ऐसा  सेतु  महान।।
16.👩
बेटी  देश   विदेश   मैं , यादाँ अर्  अरमान।
निजतापरतामैं पलै,तजती मिथअभिमान।।
17.👩
बेटी, घर री सौम्यता, सुख  संपत रो रूप।
परिवर्तन  री लहर ज्यूँ ,करै रंकपति भूप।।
18.👩
बेटी , पत्नी मात सब, एक सत्य मय सार।
रचनाधारा  ब्रह्म  सी, शिव सी  गरलाधार।।
19.👩
बेटी सिय सी त्याग मयि, राधा रूप अरूप।
पांचाली सी जिद बड़ी, यसुदा री प्रतिरूप।।
20.👩
बेटी  जनमन  कामना, परणावन  आधार।
मात रूप  सेवा जतन, भली करै करतार।।
21.👩
बेटी  बरगद  छाँव सी, शीतल  मंद  बयार।
विंध्याचल सी थिर रहे, कलकल गंगाधार।।
22.👩
बेटी  नभ   री   बादल़ी, बरषा   बूंद  बहार।
आपा तजतीओसकण,जग री सिरजनहार।
23.👩
बेटी कुल री जामनी, कुल री  पालनहार।
सत सज्जन  संतान री, नौका तारनहार।।
24.👩
बेटी  व्रत  त्यौहार  री, सामाजिक  सद्भाव।
कुटुम पड़ोसी जोड़ती,श्रद्धा भक्ति सुभाव।।
25.👩
बेटी  तप   आराधना , श्रद्धा जप  उपवास।
दानधर्म सतकर्म फल,तनमनवच विशवास।।
26.👩
बेटी  सविता  रश्मि है, धरती  रो  सिणगार।
जन गण मन रा गीत ज्यूँ,भारतीय सत्कार।।
27.👩
बेटी  रक्षा   सूत्र   है, रोल़ी    मोल़ी    डोर।
संध्या वंदन आरती, प्रात नमन् शुभ भोर।।
28.👩
बेटी  सुर   संगीत  है ,नृत्य  गीत    गम्भीर।
सरगमसाज पुनीत शुभ,लयपरवाजसुधीर।।
29.👩
बेटी  पावस तीज है, सावण  झूला डोर।
इन्द्र धनूषी  साँझिया, भादौ  राखी डोर।।
30.👩
बेटी  षटरितु  लाड़ली, शीत घाम बरसात।
हेमंती  दिवसाँ शिशिर ,बासन्ती  परभात।।
31.👩
बेट़ी  खग  हारिल  बणै, सेवै  दोनी  ठाँव।
इक पग वै ससुराल रम, दूजै पीहर पाँव।।
32.👩
बेटी  गीता सार सी, कर्म योग  प्रतिमान।
ग्यान,धर्म मर्याद सत, रामायण सनमान।।
33.👩
बेटी  वेद, पुराण सम, सुफल मंत्र रो सार।
ममता री मूरत सुघड़, भली रची करतार।।
34.👩
बेटी  यसुदा  मात  है, कौशल्या  सो  नेम।
रानी लक्ष्मी सो निभै, जनम भौम रो प्रेम।।
35.👩
बेटी सब  न्यौछारती, देश धरम   हित मान।
पती पूत भ्राता करै, जनम जनम बलिदान।।
36.👩
बेटी  विष्णू  संगिनी, कामधेनु  सी  गाय।
सागर मंथन ऊपजी,पुण्य धरा पर आय।।
37.👩
बेटी तीरथ  धाम सब ,मंदिर  मठ ,दरगाह।
काशी काबा द्वारिका,कौशल,पुरि,नरनाह।।
38.👩
बेटी  जिण घर नीपजै, प्रेम पुन्य, सतकाम।
इण बिन जीवन है वृथा, मनोविधाता बाम।।
39.👩
बेटी  जिण घर बासती, सत्य, अहिंसा, प्रीत।
इणबिन दर नहि ऊजल़ै,भरतखण्ड युगरीत।
40.👩
बेटी, जन्म मिनख पणै, पुण्य  कर्म  रो हेतु।
लख चौरासी जीव में,सत चित आनँद सेतु।।
41.👩
बेटी भोजन भक्ति सी, परमात्मन्  रो भोग।
सत्य सनातन आरती ,पावन  शुभ संजोग।।
42.👩
बेटी,जिण शिक्षा दई , वै शिक्षक,पितुमात।
जनम  सुधारै  आपरो, दुई  घराँ  परभात।।
43.👩
बेटी  नै शिक्षित करौ, लाड प्यार, मनवार।
भवसागर नैय्या फँसै, तो जीवन  पतवार।।
44.👩
बेटी  शिक्षा ले  रही ,ग्यान  मान  संस्कार।
अपणै हकों हकूक री, इब चेतन दरकार।।
45.👩
बेटी   जन्मत  जागताँ,  सनातनी   संस्कार।
बिनसंस्कारा मिनखड़ा, फसलाँ खरपतवार।।
46.👩
बेटी, जीवन जीवणों, सद गुण  सद् आचार।
खाणपीण अर सोवणो,पशु वा मिनखाचार।।
47. 👩
बेटी  गुण  री  पोटल़ी ,मिनखा  री पहचाण।
बेगुण औगुण गुण तमों,पशु जीवन परमाण।
48.👩
बेटी मन धीरज बड़ो, सत मित मंगल काम।
इण  खोया  संसार  मैं, हुवै  विधाता  बाम।।
49.👩
बेटी,  धीरज  धारणो, जद  जामै   परिवार।
हाथ न सरसों नीपजै, बीज, धरा कुलसार।।
50.👩
बेटी,  दौरो  जीवणो, तज, आपो  अभिमान।
इक  तज  दूजै साधताँ, आन  मान अरमान।।
51.👩
बेटी,आपा  त्याग कर, बणै बीज दरखत्त।
बिन छीजै सागर नदी, किण बरषै अमृत्त।।
52.👩
बेटी  निज सूँ पर बड़ी,परता हित निज अंत।
दरखत पतझड़ रै बिना,क्याँकर रचै बसन्त।।
53.👩
बेटी  दीपक  बाति  सी , दीवाली  उजियास।
जबलगि घीरत पूरता, तबलगि देय प्रकाश।।
54.👩
बेटी जगमग  चाँदणी, शीत काल सी धूप।
सब नै नेह  दुलारती ,त्याग प्रेम प्रतिरूप।।
55.👩
बेटी   विद्यादान   है , करणी   कन्या दान।
मायड़ रो सम्मान या , बाबुल रो अरमान।।
56.👩
बेटी   रतन  अमोल  है , सृष्टि  चराचर  देख।
त्याग मान अनुराग री,बणी अलौकिक रेख।।
57.👩
बेटी  कवि  री  लेखणी, शूरातन  हथियार।
श्रेष्ठिजणाँ री लिच्छ्मी, सृष्टि धरा आधार।।
58.👩
बेटी  धुरी विकास री, कुल री खेवण हार।
देश  धर्म  मर्याद  री, साँची  पालण  हार।।
59.👩
बेटी, हाड़ी  राणि  ज्यूँ, चूड़ावत   सिणगार।
ममतज पन्नाधाय सी, इन्दिरा सी ललकार।।
60.👩
बेटी  कुमकुम आरती, चन्दन  फूलाँ  माल़।
धूप दीप नैवेद्य जल,जप तप पूजण थाल़।।
61.👩
बेटी  जीजा बाइ ज्यूँ, त्यार करै  शिवराज।
मातृ भोम हित जे बणै, छत्रपती महाराज।।
62.👩
बेटी शबरी भिल्लणी , सत,पत को उपदेश।
बेर खाय  दरशन मतै, प्रभु बन वासी  भेष।।
63.👩
बेटी अत्री  पत्नि  सी, तप  मूरत  लवलेश।
सत मारग सत कर्म रा, सीता  नै  उपदेश।।
64.👩
बेटी   सावितरी  हुई, जग   में   एक  अनूप।
पति रा जीवण रक्ष हित,अड़ी रही यमभूप।।
65.👩
बेटी  खेजड़ली  चिपक, रची  अमृता  रीत।
वन रक्षा,पशु पक्षि अर्, प्राणी प्राकृत प्रीत।।
66.👩
बेटी  रण  रजपूत  री, पद्मनियाँ  चित्तौड़।
जौहर मै  वै कूदती, राज प्राण सब छोड़।।
67.👩
बेटी  मीराँ  बाइ जी, प्रेम भक्ति   लवलीन।
राज ठिकाना देहसुख,तज वृन्दावन लीन।।
68.👩
बेटी, सुर संगीत री, लता बढ़ी  शुभ नाम।
आशा धनधन भारती, सुर संगम सरनाम।।
69.👩
बेटी  पाल बछेन्दरी , पर्वत पर  चढजाय।
रची कल्पना  चावला, अंतरिक्ष  मैं जाय।।
70.👩
बेटी सिंह सपूत जण, सांगा, वीर ,हमीर।
पृथ्वीराज  सुवीर जन, दुर्गादास  सुधीर।।
71.👩
बेटी साँची प्रीत है, भाव भक्ति विशवास।
मदर टरेसा  देश मैं, दीन दुखी  री आस।।
72.👩
बेटी प्रेरक बण रचै, सुवर्ण मयि इतिहास।
चौहान सुभद्रा जियाँ, लिखै देश री साँस।।
73.👩
बेटी  इण संसार मैं, सागर  मछली  जान।
महादेवि वर्मा जियाँ, दुख री बदली मान।।
74.👩
बेटी  रजिया सल्तनत, पहली शासक होय।
इल्तुतमिस रा नाम रो, राज काज सै जोय।।
75.👩
बेटी ,भारत कोकिला , सुर सरोजनी  शाम।
विजया लक्ष्मी पंडिता,अमरीका तक नाम।।
76.👩
बेटी  देश विदेश मैं , कंचन  कला  लुटाय।
कुम्भी सीता  सी सुता, सर्प सरी लहराय।।
77.👩
बेटी , इक  घटना  हुई , गौतम   पत्नी  सोय।
चरण परस श्री राम जी, मोक्ष अहल्या होय।।
78,👩
बेटी   पूजा  आरती , सब  कोई  रै  होय।
शिक्षित नारी भारती, रहै विकार न कोय।।
79.👩
बेटी,   गायत्री    हुई , पुष्कर    ब्रह्मा   यज्ञ।
तीरथ पुन्य सरोवराँ, भरतखण्ड नहि अज्ञ।।
80.👩
बेटी  गांधारी   बणी , शत  पूताँ  महतारि।
आँख्याँ पाती धारती, छाया निज भरतार।।
81.👩
बेटी   कर्मा नै   रची , जौहर   पैली  पीर।
मायड़  रक्षा   कारणै, बणाँ  हुमायू  बीर।।
82.👩
बेटी  नर्मद  नीर  ज्यूँ , काँकर  शंकर  होय।
शिशु नै दे दे सीखड़ी, माणस मिनखा सोय।
83.👩
बेटी, नदियां  नीर  नै , बाँधै   धीर  सपूत।
नाही  तो सागर मिलै, खारो पणो अकूत।।
84.👩
बेटी  शीत  बयार  सी, हरै थकावट घाम।
पुरवाई  रा मेह ज्यूँ, फसलाँ   दे  आराम।।
85.👩
बेटी  सकल जहान् मैं, संस्कृति  री आधार।
देश  धर्म इंसानियत, जन गण मन पतबार।।
86.👩
बेटी, हरिश्चन्द्र जियाँ, कदै न  सत्य डिगाय।
राज धर्म धन सुत सबै, सत रै पाण गँवाय।।
87.👩
बेटी गुरु पित मात री, आज्ञा  रो  आशीष।
राम लषन सीता  हनू , त्रेता युग  री सीख।।
88.👩
बेटी, तुलसीदास जी, रची कथा अनमोल।
रत्नावली री प्रेरणा, रामचरित मुख बोल।।
89.👩
बेटी,  काली दास नै , लिखे संस्कृत  ग्रन्थ।
निज पत्नी अभिलाष वै,माणस जेड़ो पंथ।।
90.👩
बेटी निज मन री व्यथा,खुद ही कर उपचार।
भीतर बाहिर झाँक मन, आपू आप विचार।।
91.👩
बेटी  ईद  दिपावली , तीज  और  गणगौर।
सबसूँ  हिलमिल  रैवणो, होली राखी डोर।।
92.👩
बेटी  हजरत  महल सी, चेनम्मा  सी होय।
देश धर्म मरजाद हित, जीवन बाती खोय।।
93.👩
बेटी ,निज दुख ताड़ना, मती बणाजे ताड़।
अपणै घर री लिच्छमी, सबका हेतू  ताड़।।
94.👩
बेटी, बिण कर्तव्य रै, मिलै कठै  अधिकार।
त्याग, कर्म,तप साधना, संघर्षण कर तार।।
95.👩
बेटी, मिथ अभिमान नै, तजो  हेतु  परिवार।
स्वाभिमान निज राखणो, तब चालै घरबार।।
96.👩
बेटी  बरगद काट मत ,  रोपै  पेड़  विदेष।
समझ विवेकी जे रखै, हानि लाभ  ले देष।।
97.👩
बेटी,निज घर खाक रो,करो आनि थाँ लाख।
चाहो तो  सौ लाख लख,चाहो तो सो लाख।।
98.👩
बेटी निज घर री विथा, करो न  विथा प्रचार।
निज दुखसुख नै झेलणो, हाँसी पर परचार।।
99.👩
बेटी निज घर राख  रो, तो  भी सुरग समान।
पर घरसुख नहि ताकणो,लंका स्वर्ण अमान।
100.👩
बेटी नित सादर रहै, सब घर सब परिजान।
झूठाँ  सुपना  भूल कर, कर्म गीत परमान्।।

👩 "इति श्री बेटी शतक" 👩.  
         _______________

सादर🙏
रचनाकार ©(ढूँढाड़ी भाषा)
बाबू लाल शर्मा "बौहरा"
वरिष्ठ अध्यापक,
नि. सिकंदरा,दौसा,राजस्थान
9782924479
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बेटी शतक:- मानक दोहा-छंद

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