बाल़ पणै ब्याह
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"""""""""'''''"""""""""""""""""""""बाबूलालशर्मा
. *बाल पणै ब्याह*
. (ढूँढाड़ी - राजस्थानी रचना)
. दोहा-छंद,
. *गीत/लोकगीत*
बाल पणै शादी करी, भटक गया मन मीत।
पढ़बो लिखबो छूटगो, आय लपेटै रीत।।
बेगा होगा टाबराँ, सेहत गई पताल़।
आय जवानी पैल हीं, हुयो जीव जंजाल़।।
मात पिता न्यारा करै, खाओ कव्है कमाय।
भूत भविश की सोचताँ, बर्तमान भी जाय।।
दौरो होगो जीवणो, भूल गया सब गीत।
बाल पणै शादी करी, भटक गया मन मीत।।
भैण भुवा का लाड़ सब, गयै कुआ कै पींद।
चार दिनाँ को चानणों , बणै जिँदाड़ै बींद।।
म्हे डूब्या सो भौत छै, मान मँजूरी खाय।
अब सरकारी रोक वै,रोक समाज लगाय।।
रीत रीत मैं लुट गई, होती जे मन प्रीत।
बाल पणै शादी हुई, भटक गया मन मीत।।
बाल ब्याह अभिशाप छै,करो समाजी गाड़।
समय पाय शादी करो, बाल पणै नहिँ लाड़।।
सत फेरा,सातूँ वचन, कर ल्यो सत संकल्प।
बाल ब्याह नै टाल़णो,कर ल्यो काया कल्प।।
रीत पुराणी भूलियो, देख जमाना गीत।
बाल पणै शादी हुई, भटक गया मन मीत।।
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✍🙏©
बाबू लाल शर्मा "बौहरा"
सिकंदरा,दौसा,राजस्थान
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