कुण्डलिया दर्पण ( बुक )

: .              "आत्म विचार"

भाषा की व्याकता व सम्पन्नता उसके व्याकरण - छंद व अलंकारों से समझी जा सकती है।  इस दृष्टि से हिंदी आज विश्वभाषा के रूप में अपनी छाप व पहचान रखती है।  मुझे गर्व है कि इस मर्त्य जीवन में हिंदुस्तान में जन्म मिला,नीड़ मिला और हिंदी साहित्य सृजन सेवा का सौभाग्य मिला।  मातृभूमि और मातृभाषा की सेवा के अवसर प्राप्ति हेतु माँ भारती का आजन्म ऋणी हूँ।
.         हिन्दी साहित्य की विलक्षणता इसके अगाध छंद सागर में निहित है। छंद सागर में विविध छंदों में सबसे सरस व कठिनतम छंद श्रेणी में कुण्डलिया छंद का अपना ही महत्व है।  साहित्य पुरोधा 'कवि गिरधर' का नाम इस छंद से सुविज्ञ है।  प्रभु गिरधर के प्रेम व माँ शारदे की कृपा से ही इस सरस व जटिल छंद पर लेखनी चली, तो कवि गुरुजन व साथियों के सतत प्रोत्साहन से ही मेरी यह छंद यात्रा जारी है।
.       प्रिय परिजन एवं इष्ट मित्रों द्वारा स्वहित त्यागकर मुझे समयदान दिया तभी संभव हुआ यह पथ प्रशस्त। निशा की नीरवता ने दिया इस कठिन साधना में सहयोग, जब थकता तो तारों से बाते कर लेता छंद पथ पर बढ़ते हुए।
.          साहित्य समाज का दर्पण होता है। परन्तु छंद, साहित्य व साहित्यकार दोनो का ही दर्पण होता है।  और छंद का दर्पण देखना हो तो कुण्डलिया छंद में ही दृष्टव्य होगा।  इसीलिए इस पुस्तक का शीर्षक "कुण्डलिया दर्पण" समीचीन लगा।
.    सर्प की कुण्डली और मानव जीवन के यथार्थ का दर्पण है यह छंद कुण्डलिया, जो जहाँ से शुरु होता है, वहीं से अंत भी तय है।
.        आज मानव जीवन की गुत्थियों,मन की घुण्डियों को समझना बहुत जटिल हो रहा है, इन जटिलताओं को समझने का प्रयास इन कुण्डलियों में कर रहा हूँ।
.      हिंदी साहित्य पुरोधा ,साहित्य सारथी,साहित्य प्रेमी, साहित्य पाठक, नवोदित साहित्यकार , हिन्दी साहित्य के विद्यार्थीगण आप सभी की राय ही इस पुस्तक की सार्थकता सिद्ध और प्रसिद्ध करेंगे। 
.      "मैने तो बस कलम घिसी है, मन के भाव शारदे देती।"
दोहा और रोला छंद युग्म से बने इस जटिल छंद को सहज और सरस बनाने हेतु सरल सुबोध भाषा शब्दों के साथ कुछ प्राचीन अर्वाचीन शब्दों के सुमेल से भाव गाम्भीर्यता पाठक को आनंदित व अचंभित करेगी। भाषा में चमत्कार हेतु एक ही वर्णाधारित शब्दों से कुण्डलिया रचने का कठिन मार्ग भी कई छंदों में आपको दर्शित होगा तो सुगम्य सहज भाव युक्त छंद भी पाठक के मन को उद्देलित करेंगे। वहीं कुण्डलिया छंद व रोला छंद रचना विधान विद्यार्थियों व नवोदित रचनाकारों केलिए उपयोगी साबित होगा।
.      'राजस्थान'  भारत का सबसे बड़ा प्रदेश है, यहाँ की जीवटता, जिजीविषा, धीरता, वीरता, कठिनता  सभी का  इस वीर भूमि में जन्म लेकर और पलते बढ़ते अभ्यासी अहसास किया है, ढूँढाड़ी परिवेश - दौसा - सिकंदरा में गुजरते इस जीवन मन ने चाहा कि, ढूँढाड़ी- राजस्थानी भाषा के प्रति भी कर्तव्य का निर्वहन हो , इस हेतु सम्पूर्ण प्रदेश की सम्पूर्ण विशेषता को समेटे हुए इसी पुस्तक में पढ़िए- 
.         " बाताँ राजस्थान री" ।
मुझसे मानवीय स्वभाव वश त्रुटियाँ अवश्यंभावी हैं, साहित्य के इस संक्रमण काल में- आप सभी सम्मानीय पाठकगण की राय पर ही मेरा विश्वास और मेरी आशा  आस्था व साख आधारित है, आप ही जताएँगे कि मेरा यह प्रयास, हिंदी, साहित्य, छंद शास्त्र , विद्यार्थी, एवं आमजन हेतु सार्थक रहा। आपके प्रोत्साहन से मेरा कठिन काव्य पथ  प्रकाशित होता रहेगा।

.           • जय हिन्दी, जय जय जय भारत •

दिनांक-११ जून २०२०, गुरुवार
.                                     सादर,
.                        बाबू लाल शर्मा, बौहरा, विज्ञ
.                        सिकंदरा, दौसा, राजस्थान


   : *कुण्डलिया छंद विधान*  
--              -  बाबू लाल शर्मा, बौहरा, विज्ञ'
.            
सुन्दर दोहा  लीजिए, सुन्दर भाव विवेक।
तेरह ग्यारह मात्रिका, चरण देखिए  नेक।
चरण देखिए नेक, चरण अंतिम दोहे का।
रोला  छन्दारंभ , चरण  पहला रोले का।
पहला  दोहा  शब्द, अंत रोले  के  अन्दर।
भरें भाव  भरपूर, बने  कुण्डलिया सुन्दर।
.                         .....बाबू लाल शर्मा

प्रथम दो पंक्ति दोहा (१३,११ )
दोहे के प्रथम व तीसरे चरण में १३,१३ मात्राएँ अंत में २१२ या१११

दोहे के दूसरे व चौथे चरण में  ११,११ मात्राएं व अन्त में तुकान्त में एक गुरु एक लघु।

चार चरण रोला के
२४ मात्रा प्रत्येक में
११,१३ 
यति ११ पर

दोहे का  अंतिम चरण, रोला प्रथम  सुलेख।
शब्द प्रथम चौकल वही, रोला अंतिम देख।।
- - - - - - - - - 
अर्थात....

 पहला दोहा,

फिर पहले दोहे के अंतिम चरण को लेते हुए रोला(अंत में गुरु,गुरु)

फिर रोला।।

प्रथम व अंतिम शब्द समान हो।
अर्थात जहाँ से शुरू वहीं से समापन हो, सर्प की कुण्डली की तरह फन एवं पूँछ एक साथ।

*रोला*:-११,१३ मात्रा से लिखा गया छंद:-
११,मात्रिक प्रथम व तृतीय चरण (विषम चरण) का अंत गुरु लघु (२ १) से हो

१३ मात्रिक द्वितीय व चतुर्थ चरण (सम चरण) का अंत  २ २  या २ १ १ से हो।
.............................बाबूलालशर्मा
उदाहरण - - 
जगती  की शोभा सदा, जीवन  पानी  पेड़।
प्राणवायु  मिलती सखे, वृक्ष रोपि पथ मेड़।
वृक्ष रोपि पथ मेड़,जगह जो भी मिल जावे।
श्यामा  पर  ये पेड़, मेह  घन श्याम  बुलावे।
शर्मा  बाबू  'लाल', धरा  मनभावन लगती।
पर्यावरण  सुधार, बने स्वर्गिक जग जगती।
 ,   इस तरह चौकल शब्द से ही शुरुआत करें।

विषम परिस्थितियों में इस तरह भी लिख सकते हैं-
.            *करवा चौथ*
.           कुण्डलिया छंद
.          
चौथ  व्रती  बन  पूजती, चंदा  चौथ  चकोर।
आज सुहागिन सब करे, यह उपवास कठोर।
यह   उपवास  कठोर , पूजती   चंदा  प्यारा।
पिया  जिए  सौ साल, अमर संयोग  हमारा।
कहे लाल कविराय, वारती  जती  सती बन।
अमर रहे  तू चाँद, पूजती   चौथ  व्रती  बन।
.          
नारि सुहागिन कर रही,पूजा जप तप ध्यान।
पति की लम्बी आयु हो, खूब बढ़े जग मान।
खूब  बढ़े  जग मान, करे  उपवास  तुम्हारा।
मात  चौथ  सुन  अर्ज , रहे  संजोग  हमारा।
कर सोलह सिंगार, निभाये प्रीत  यहाँ  दिन।
पति हित सारे काज, करे ये  नारि सुहागिन।

बाबू लाल शर्मा

                     *कुण्डलिया छंद*
.                (विवेकानंद जी को शब्दांजलि)
.                        °°°°°°°°°°°°°°
.                                 १
सविता से  आभा  लिए, धरा चंद्र बहु पिण्ड!
ज्ञान मान अरु दान से, रवि सम मनुज प्रचंड!
रवि सम  मनुज   प्रचंड , विवेकानंद  प्रणेता!
विश्व  विजेत  समान, धर्म  के  मर्म   विजेता!
कहे  सनातन धर्म, शिकागो  जाकर कमिता!
स्वामी  संत विवेक, युवा हित में ज्यों सविता!
.                       २
आती नित्य  विभावरी, नूतन  नित्य  विभात!
संत मनुज गति धर्मपथ,ध्रुव सम विभा प्रपात!
ध्रवु  सम  विभा  प्रपात,  संतवर  वे   वैरागी!
पूजित    महा   विभूति, विवेकानंद  सुभागी!
शर्मा   बाबू    लाल , वंदना   भली    सुहाती!
सिंधु  शिला अभिलेख, देखने  दुनिया आती!
.             
बाबू लाल शर्मा,

कुण्डलिया
.                      नीति
जग में  जय  या  हार  का, होता  अन्तर्द्वन्द।
इनसे  जो  ऊपर  उठा , उसे  कहो   निर्द्वन्द।
उसे  कहो निर्द्वन्द, विजय जो  मन पर  पावे।
विजय कहें ये मान, जीत अवगुण को जावे।
कहे लाल कविराय, पड़े   बाधा  यह मग में।
करते  युद्ध विनाश  ,बने घातक इस जग में।

 .    विजय हल्दीघाटी

जीता चेतक प्राण तज,विजय प्रतापी आन। 
विजित अकबरी सैन्य थी,हार गया था मान।
हार गया था मान, मुगलिया  मद  सत्ता  का।
भूले  लोहा  याद, भला  जय मल पत्ता  का।
कहे लाल  कविराय , वंश मुगलों  का  रीता।
राणा आन  महान, शान  से अब भी  जीता।
.               
बाबू लाल शर्मा 

 कुण्डलिया छंद
.                 पुष्प
.                      
इतराता है,पुष्प क्यों, चार पहर की वास।
खुशबू  सम्पद बीतते, कोई न डाले घास।
कोई न डाले घास, रखें सब मतलब यारी।
बिना स्वार्थ के पुष्प, लगे रिश्ते सब भारी।
कहे लाल कविराय, सभी में यौवन आता।
यौवन ,संपद ,रूप,  मीत नाहक इतराता।

      . सुमन, चमन, अमन,
होवे फुल्ल प्रसून भी, कहें  सुमन अरु फूल।
पुष्प कुसुम  है मंजरी, पुहुप नाम मत भूल।
पुहुप नाम मत भूल, सहोदर शूल  सुमन  का।
एक  प्रेम  प्रतिरूप, दूसरा  मित्र   चमन  का।
मधुकर  हिम्मत मीत, फूल कंटक मिल सोवे।
चाह  अमन आबाद, सभी  के  मन  में  होवे।
.                  
बाबू लाल शर्मा "बौहरा"

             *कुण्डलियाँ*
.          ( विरहा)
पहने   चूड़ी   पाटले , विरहा   मुँदरी  हार।
वेणी में सुरभित कुसुम, तके पंथ  भरतार।
तके  पंथ भरतार, मिलन के स्वप्न  सँजोये।
बीत रहे दिन माह, याद कर जो पल खोये।
शर्मा  बाबू  लाल , बिसारे   मँहगे   गहने।
पायल में प्रिय भाव, हाथ बस कंगन पहने।
२ ,           
लाया अलि  ऋतुराज अब, पछुआ शुष्क समीर!
प्राकृत रीति  प्रतीत जग, चुभे  मदन  मन   तीर!
चुभे  मदन   मन   तीर,  लता  तरु  वन  बौराए!
चाहत   प्रीत  सजीव, मदन  तन  मन  दहकाए!
कहे "लाल" कविराय, विहग पशु जन भरमाया!
मृग आलिंगन  बद्ध, मिलन  ऋतु फागुन लाया!
.                    
कन्या  चिंतन कर रही, वन देवी प्रतिरूप!
गात वसन शारद लगे, बेटी  सौम्य अनूप!
बेटी  सौम्य  अनूप, अप्सरा  लगे  उदासी!
करे मात पितु याद, घड़ा रीता मन प्यासी!
शर्मा  बाबू  लाल, मात  बड़ भागी  धन्या!
रीत सनातन  प्रीत, पढ़े  आश्रम में कन्या!
.                    
बाबू लाल शर्मा बौहरा


    कुण्डलिया छंद - शतक
.                  १. *वेणी*
मिलती  संगम में  सरित, कहें  त्रिवेणी धाम!
तीन  भाग  कर  गूँथ लें, कुंतल  वेणी  बाम!
कुंतल   वेणी   बाम, सजाए   नारि  सयानी!
नागिन  सी  लहराय, देख  मन चले जवानी!
कहे लाल  कविराय, नारि  इठलाती  चलती!
कटि पर वेणी साज, धरा पर सरिता मिलती!

.               २.  *कुमकुम*
माता   पूजित  भारती , अपना  हिन्दुस्तान!
समर क्षेत्र पूजित सभी, उनको तीरथ मान!
उनको तीरथ  मान, देश हित शीश चढ़ाया!
धरा रंग  कर लाल, मात  का  मान बढ़ाया!
शर्मा  बाबू लाल , भाल पर तिलक लगाता!
रजकण कुमकुम मान, पूजता भारत माता!

.                 ३ *पायल*
बजती पायल  स्वप्न में, प्रेमी  हुए विभोर।
कायर  समझे  भूतनी, डर  से  काँपे  चोर।
डर से  काँपे  चोर, पिया  भी करवट  लेते।
जगे  वियोगी सोच , मनो  मन  गाली  देते।
शर्मा बाबू लाल, यशोदा  हरि हरि भजती।
हँसे  नन्द  गोपाल, ठुमकते पायल बजती। 

.               ४- *कंगन*
पहने   चूड़ी   पाटले , कंगन   मुँदरी  हार।
हिना  हथेली  में  रचा, तके  पंथ   भरतार।
तके  पंथ भरतार, मिलन के स्वप्न  सँजोये।
बीत रहे दिन माह, याद कर जो पल खोये।
शर्मा  बाबू  लाल ,  चाह कब मँहगे   गहने।
याद पिया की साथ, हाथ बस कंगन पहने।   
          
.                ५-  *काजल*
भाता  भारत  मात को , रक्षा  हित  बलिदान।
बिँदिया काजल नारि को, सदा सुहाग निशान।
सदा  सुहाग   निशान, रहे  होठों  पर   लाली।
कुमकुम  से  भर  माँग, सजे  नारी  मतवाली।
शर्मा   बाबू   लाल , मान   हर   नारी   माता।
भारत माता  सहित, मात का यश गुण भाता!

.                   ६- *गजरा*
धरती दुल्हन सी सजी, हरित पीत परिधान।
शबनम चमके  भोर में, भारत  भूमि महान।
भारत भूमि महान, ताज हिम का जो पहने।
पर्वत खनिज पठार, सरित वन सरवर गहने। 
कहे लाल  कविराय, नारि  गजरे से सजती। 
हिम से  निकले धार, नीर से सजती  धरती!

.                 ७- *बिन्दी*
नारी भारत की भली, जब हो बिन्दी भाल।
विविध रंग की  ये बने, सुंदर सजती लाल।
सुन्दर सजती लाल, शान सम्मान सिखाए।
शान  भारती मात, शहादत   पंथ  दिखाए।
शर्मा  बाबू लाल, अंक  की  छवि विस्तारी।
बढ़ता   मान  अकूत, लगाए  बिन्दी  नारी!

.                 ८. *डोली*
डोली  तेरे  भाग्य से, चिढ़े  साज शृंगार।
दुल्हन  ही बैठे सदा, उत्तम  रखे विचार।
उत्तम  रखे  विचार, संत  जैसे बड़भागी।
डोली दुल्हन संग, रहो तुम सदा सुहागी।
शर्मा बाबू लाल , सुता  की भरना झोली।
उत्तम वर के साथ, विदा  बेटी की डोली।

,                      ९ *चूड़ी*
नारी  पर  हँसते  कहे, चूड़ी   वाले   हाथ।
जाने क्यों जन भूलते, विपदा में तिय साथ।
विपदा में तिय साथ, लड़ी थी वह मर्दानी।
लक्ष्मी  पद्मा   मान,  गुमानी   हाड़ी  रानी।
शर्मा  बाबू   लाल,  नारियाँ   बने   दुधारी।
कर्तव्यों   के   बंध, पहनती   चूड़ी   नारी।   

.                १० *झुमका*
झुमका लटके कान में, बौर आम ज्यों डाल।
गहनों  के  परिवेश  में, झुमके  रहे  कमाल।
झुमके रहे कमाल, गीत कवि जिन पर गाता।
कभी बीच बाजार, कहीं झुमका गिर जाता।
कहे लाल  कविराय, नृत्य  में  जैसे  ठुमका।
नारी  के  शृंगार, अजब  है  गहना  झुमका!

.                  ११ *आँचल*
धानी  चूनर  भारती, आँचल  भरा ममत्व।
परिपाटी बलिदान की, विविध वर्ग भ्रातृत्व।
विविध वर्ग  भ्रातत्व, एकता अपनी  थाती।
आँचल भरे  दुलार, हवा  जब लोरी  गाती।
शर्मा  बाबू  लाल, करें  हम  क्यों  नादानी।
माँ का  आँचल स्वच्छ ,रहे यह चूनर धानी।

.                १२ *कजरा*
कजरा से  सजते नयन, रहे  सुरक्षित दृष्टि।
बुरी नजर को टालता, अनुपम कजरा सृष्टि।
अनुपम  कजरा सृष्टि, साँवरे  में गुण भारी।
चढ़े  न दूजा  रंग, कृष्ण  आँखे   कजरारी।
शर्मा  बाबू  लाल, बँधे   जूड़े   पर  गजरा।
सुंदर  सब  शृंगार, लगे  नयनों  में  कजरा।

.                    १३ *जीवन*
मानव  दुर्लभ देह है, वृथा  न  जीवन जान।
लख चौरासी योनियाँ, जीवन मनुज समान।
जीवन  मनुज समान, देव  स्वर्गों  के  तरसे।
रमी  अप्सरा  भूमि, कई  थी   लम्बे  अरसे।
शर्मा  बाबू  लाल, धर्म  जीवन  का  आनव।
कर उपकारी कर्म, मनुज बन जाओ मानव।
(आनव~मानवोचित)

-                     १४. *उपवन*
सीता जग माता बनी, जन्मी  हल की  नोक।
घर से वन उपवन गई, विपदा  संग  अशोक।
विपदा संग अशोक, वाटिका  सिया वियोगी।
भटके वन वन राम, किया छल रावण जोगी।
शर्मा   बाबू  लाल, बया  बिन  उपवन  रीता।
वन  उपवन  मय राम, पंचवट  रमती  सीता।

.                  १५. *कविता*
कविता  काव्य  कवित्त  के, करते   कर्म  कठोर।
कविजन केका कोकिला, कलित कलम की कोर।
कलित कलम की कोर, करे  कंटकपथ  कोमल।
कर्म  करे   कल्याण,  कंठिनी   काली   कोयल।
कहता कवि  करजोड़, करूँ  कविताई  कमिता।
काँपे   काल   कराल, कहो  कम  कैसे  कविता।
  (कमिता ~कामना)

.                  १६. *ममता*
ममता   मूरत   मानिये, मन्नत  मन  मनुहार।
महिमा मय  मनभावना, मात     मंगलाचार।
मात     मंगलाचार,  मायका    मामा  मामी।
प्यार  प्रेम  प्रतिरूप , पंथ  पीहर  प्रतिगामी।
कहता कवि करबद्ध, सिद्ध संतो सी समता।
जंगम  जगती  जान, महत्ता  माँ की ममता।

.                 १७. *बाबुल*
बेटी  घर  में  जन्म ले, मान  भाग  वरदान।
माँ को गर्व गुमान हो, बाबुल के कुल शान।
बाबुल के  कुल  शान, बनेगी बेटी पढ़ कर।
उभय वंश  अरमान, पालती  बेटी बढ़ कर।
कहे  लाल  कविराय, मरे   खेटी   आखेटी।
बाबुल   कुल  समृद्ध, चाह रखती हर  बेटी।
(खेटी ~ चरित्रहीन)

.                    १८  *भैया*
भैया  बलदाऊ  बड़े, छोटे  कृष्ण कुमार।
हँसते  खेले  चौक  में, करते  नंद दुलार।
करते  नंद दुलार, अंक  में  वे  भर  लेते।
ले  कंधे  बैठाय, कभी   वे   ताली   देते।
शर्मा  बाबू   लाल, मंद   मुस्काए     मैया।
हो  सबके सौभाग्य, रहें मिल  ऐसे भैया।

.                    १९. *बहना*
बंधन  रिश्तों  के निभे, रीत  प्रीत  अरमान।
प्यारी  बहना  चंद्र की, भारत  भूमि महान।
भारत भूमि महान, गंग  नद यमुना  बहना।
बहना गंध समीर, भाव बहना  कवि गहना।
कहे लाल कविराय, न बहना काजल चंदन।
पावन  प्रीत  प्रतीक, रक्ष बहना शुभ बंधन।

.                 २०. *सखियाँ*
सखियाँ दुखिया हो रही, सहती कृष्ण वियोग।
उद्धव  भँवरा  बन रहा,  ज्ञान   बाँटता   योग।
ज्ञान  बाँटता  योग, पन्थ   निर्गुण    समझाए।
सुनकर  गोपी  ज्ञान, भ्रमर  का हृदय  लुभाए।
शर्मा  बाबू  लाल, देख अलि  झरती अँखियाँ।
हारा  उद्धव  ज्ञान, प्रेम  पथ  जीती   सखियाँ!   
             
.                २१. *कुुनबा*
बातें  बीती  वक्त  भी, प्रेम  प्रीत  प्राचीन।
था कुनबा सब साथ थे, एकल अर्वाचीन।
एकल   अर्वाचीन,  हुए   परिवारी   सारे।
कुनबे अब इतिहास , पराये  पितर हमारे।
शर्मा  बाबू लाल , घात  प्रतिधात  चलाते।
रोते  बूढ़े  आज, सोच   कुनबे  की  बाते।

.                २२. *पीहर*
पालन प्रीति  परम्परा, पीहर  प्रिय परिवार।
प्रेम पत्रिका  पा पगे, प्रियतम  पथ पतवार।
प्रियतम  पथ पतवार, प्राण  प्यारे  परदेशी।
परिपालन  परिवार, प्रथा   पालूँ   परिवेशी।
प्रकटे  परिजन प्यार, पालते  प्रण पंचानन।
परमेश्वर  प्रतिपाल, पृथा पीहर पथ पालन!

.                    २३. *पनघट*
झीलें बापी  कूप  सर, सरिताओं  के  घाट!
आतुर  नयन  निहारते, पनिहारी  की  बाट!
पनिहारी  की बाट, मिलें  कुछ  बातें  करते!
रीत प्रीत  मनुहार, शिकायत  मन की धरते!
कहे लाल कविराय, स्रोत जल बचे न गीले!
कचरा  पटके  लोग, भरे  पनघट सब झीलें!

.                २४.   *सैनिक*
सैनिक  रक्षक  देश  के,  हैं  जैसे   भगवान!
रखें  तिरंगा  मान  को,  मरे  शहादत   शान!
मरे शहादत शान, चाह  बस  कफन  तिरंगा!
भारत रहे  अखण्ड, बहे  जल  यमुना  गंगा!
कहे लाल कविराय, प्राण दे जनहित दैनिक!
मात  भारती  पूत, नमन  है  तुमको  सैनिक!    
 
.                    २५. *कोयल*
कोयल  काली  कंठिनी, कागा  कीर  कमान!
कुरजाँ,  केकी   कामिनी, करे  कंठ कलगान!
करे  कंठ  कलगान, किसान  कपोत   उड़ाते!
कोयल का  मधु गान, तदपि सब काग बुलाते!
कहे लाल कविराय, भली अलि लगती कोपल!
चाहे  दुख  में  काग, खुशी  मन भाए  कोयल!

.                 २६- *अम्बर*
अवनी अम्बर कब मिले, आन अमर अहसास!
धरती अब  ये  आकुला, आषाढ़ी बस  आस!
आषाढ़ी   बस   आस, करें   खेती  तो   कैसे!
महँगाई   की   मार,  कहाँ   से    लाएंँ    पैसे!
कहे  लाल  कविराय, सूखती  भू  की धमनी!
अम्बर  करे  निहाल, हरित  तब होगी अवनी!

.                  २७. *अविरल*
अविरल  गंगा धार है, अविचल हिमगिरि शान!
अविकल बहती नर्मदा,कल कल नद पहचान!
कल कल नद पहचान, बहे अविरल  सरिताएँ!
चली  पिया  के  पंथ,  बनी  नदियाँ   बनिताएँ!
शर्मा  बाबू  लाल, देख   सागर  जल. हलचल!
जल पथ यातायात, सिंधु सरि चलते अविरल!

.             २८  *सागर*
जलनिधि तू वारिधि जलधि, जलागार वारीश!
सिंधु  अब्धि अंबुधि  उदधि, पारावार   नदीश!
पारावार    नदीश ,   समन्दर    तुम   रत्नाकर!
नीरागार     समुद्र , पंकनिधि   अर्णव    सागर!
नीरधि   रत्नागार, नीरनिधि. कंपति  बननिधि!
मत्स्यागार पयोधि, नमन तोयधि  हे जलनिधि! 

.            २९- *अनुपम*
अनुपम संस्कृति है यहाँ, अनुपम अपना देश!
विविध  धर्म  अरु  जातियाँ, रहे संग परिवेश!
रहे   संग   परिवेश,  भिन्न  जलवायु   प्रदेशी!
बोली विविध प्रकार, चाह बस हिन्द  स्वदेशी!
कहे लाल कविराय, त्याग मय धरती निरुपम!
रीत  प्रीत  व्यवहार, तिरंगा    भारत  अनुपम!

.            ३०-  *धड़कन*
धड़कन  भारतवर्ष  की, दिल्ली कहें सुजान!
हृदय  देश  का  है यही, संसद शासन  शान!
संसद  शासन  शान, राजधानी  यह  दिल्ली!
राज तंत्र  से  अद्य, रही  शासन की  किल्ली!
शर्मा  बाबू  लाल , सदा  सत्ता  मय थिरकन!
दिल्ली अपनी शान, रहेगी दिल की धड़कन!

 .              ३१  *वीणा*
वीणा में  स्वर  है  नहीं, होती  निश्चल  मौन!
होता  वादक  मौन  है, स्वर  देता  है  कौन!
स्वर देता है  कौन, कहाँ से ध्वनि आ जाती!
अहो  शारदा  मात,  कंठ  वीणा  में  आती!
कहे लाल कविराय, सरे लय गीत अम्हीणा!
कसें  संतुलित तार, गीत लय बजती वीणा!
(अम्हीणा~हमारा)

.                   ३२. *नैतिक*
शिक्षा  ऐसी  दीजिये, नैतिक   रहे  विचार!
आन मान  अरमान के, सीखें  सद आचार!
सीखें  सद आचार, भले  संस्कार  सिखावें!
मान  ज्ञान विज्ञान, देश की  शक्ति दिखावें!
शर्मा  बाबू  लाल, चाह  सदगुण की भिक्षा!
उत्तम बने स्वभाव, देश हित नैतिक शिक्षा!

.             ३३    *विजयी*
हल्दीघाटी  युद्ध  में , उभय पक्ष वश मान!
मान मुगलिया सैन्य वर, मान प्रतापी शान!
मान  प्रतापी शान, निभाई   चेतक  कीका!
कीका का सम्मान , मान का पड़ता फीका!
फीका हुआ गुलाब, लाल थी चन्दन माटी!
माटी  विजयी  गर्व,  गुमानी    हल्दीघाटी!
(कीका~महाराणा प्रताप)

.                ३४   *भारत*
मेरा  देश  महान है, विविध बने मिल एक!
धर्म  पंथ  निरपेक्षता, संविधान  जन  नेक!
संविधान  जन  नेक, मूल अधिकार बतावे!
देश  हितैषी  कर्म , सभी  कर्तव्य  निभावे!
शर्मा  बाबू  लाल, स्वर्ण  खग  करे  बसेरा!
गाते  कृषक  जवान, सुहाना   भारत  मेरा!

.                   ३५  *छाया*
छाया अम्बर की मिले , शैय्या धरती मात!
पवन  सुनाये   लोरियाँ, प्राकृत  दे सौगात!
प्राकृत  दे  सौगात, करे तरु शीतल  छाया!
छाया  कुहरा  शीत, मदन  बासंती  भाया!
शर्मा  बाबू  लाल , गीत  छाया  जो  गाया!
छाया  छायावाद, मनुज  चाहे  घर  छाया!

.                ३६  *निर्मल*
निर्मल  तन  मन  वचन  हो, जैसे गंगा  नीर!
पवन निर्मला भूमि हो, सागर नद  सर  तीर!
सागर नद सर तीर, भाव भाषा मय कविता!
निर्मल  शासन लोक, रोशनी  चंदा  सविता!
शर्मा  बाबू  लाल, खेत  सर  रहे  न निर्जल!
सृष्टि  धरा  ब्रह्मांड, रहे  जनमानस  निर्मल!

•.               ३७  *विनती*
विधना  विपदा वारि  वन, वायु  वंश वारीश!
वृक्ष वटी  वसुधा वचन, विनती  वर  वागीश!
विनती  वर वागीस, वरुण  वन वन्य विहारी!
वृहद विप्लवी विघ्न, विनय वंदन  व्यवहारी!
वंदउँ विमल विकास, वाद  विज्ञानी विजना!
वरदायी  विश्वास, वरण  वर विनती विधना!

.                  ३८. *भावुक*
भावे  भजनी  भावना, भोर भास  भगवान!
भले भलाई भाग्य भल,भावुक भाव भवान!
भावुक  भाव  भवान, भजूँ  भोले भण्डारी!
भरे  भाव  भिनसार, भाष  भाषा  भ्रमहारी!
भय भागे भयभीत, भ्रमित भँवरा  भरमावे!
भगवन्ती   भरतार, भगवती   भोला   भावे!

.               ३९  *धरती*
सविता के परिवार में, ग्रह  नक्षत्र  अनेक!
प्राण पवन जल धारती, माता धरती एक!
माता  धरती   एक, उपग्रह   चंदा   भ्राता!
तारे  करते  छाँव, दिवाकर  जीवन  दाता!
शर्मा बाबू लाल, थके कवि कहते कविता!
धरती  मात समान, धरा घूमें  परि सविता!

.               ४०   *मानव*
मानव जीवन भाग्य से, वसुधा पर अनमोल!
दुर्लभ  देवों  को  लगे, जीवन महत सतोल!
जीवन महत सतोल, कर्म कर पर उपकारी!
त्याग  देह  का नेह, देशहित जन  हितकारी!
शर्मा   बाबू   लाल ,  बनो   कर्तव्यी  आनव!
मानवता  के  हेतु, मनुज  बन जाओ मानव!

.                  ४१. *गागर*
गागर में  सागर  भरे, कविजन  बड़े  प्रवीण!
पढ़ पढ़ होता बावरा, मन मानस मति क्षीण!
मन मानस  मति क्षीण, भाव में बहता जाए!
ऋषि अगस्त्य  मानिंद, सिंधु रस पीना भाए!
शर्मा  बाबू  लाल, बिन्दु सम प्रियवर  सागर!
 मिट्टी  पात्र  समान , चाह मन भर लूँ गागर!

•.                ४२. *सरिता*
सरिता  ये धमनी शिरा, मान  भारती  शान!
गंगा   यमुना   नर्मदा, चम्बल  सोन  समान!
चम्बल सोन समान, सरित  धरती सरसाती!
बने नहर  बहु  बन्ध, फसल धानी लहराती!
शर्मा  बाबू  लाल, सजी  सँवरी सम बनिता!
चली सिंधु प्रिय पंथ, उमड़ती बहती सरिता!

•.               ४३  *गहरा*
मानस   मानुष   प्रीत  से,  करे  सृष्टि  संचार!
सागर  से   गहरा   वही,  ढाई   अक्षर  प्यार!
ढाई   अक्षर   प्यार,  युगों  से  बहे  धरा  पर!
थके लेखनी काव्य, लिखे कवि छंद बनाकर!
शर्मा  बाबू  लाल, मिले  मन  अय  से पारस!
सच ही गहरा प्यार, निभाओ तन मन मानस!
(अय - लोह)
.                ४४  *आँगन*
तुलसी चौरा  देहरी, आँगन  चौक  निवास!
राम 'राम बोला' तभी, वह नवजात सुभास!
वह नवजात सुभास, दंत द्वय  मुख में धारे!
जन्म भुक्ति नक्षत्र, मात पितु  सोच विचारे!
शर्मा  बाबू  लाल, अमर  हो  मरती हुलसी!
सूने आँगन  तात, बाल मन  भटके तुलसी!

•.               ४५  *आधा*
आधा तन नर का  हुआ, आधा नारी गात!
महादेव  ने  सृष्टि हित, उपजाए  मनुजात!
उपजाए मनुजात, कहे मनु अरु शतरूपा!
करने  कर्म अनूप, नही  थे  मद छल यूपा!
शर्मा  बाबू  लाल, सृष्टि हित   टालें  बाधा!
कर्म और अधिकार, बाँटकर आधा आधा!
(यूपा ~ द्यूत)

•.                  ४६    *यात्रा*
 यात्रा  करते   जन बहुत, जाते  देश विदेश!
धर्म ज्ञान हित भी करे, भ्रमण सभी परिवेश!
भ्रमण  सभी  परिवेश, शहर  हो या  देहाती!
दर्शन   मंदिर    धाम, आरती   गाई   जाती!
शर्मा    बाबू   लाल,  देख   नेपाल   सुमात्रा!
भ्रमण मौज आनंद, सफल सबकी हो यात्रा!

•.                 ‌‌ ४७  *कोना*
कोना  धरती  का  नहीं, फिर भी  कहते लोग!
देश  राज्य  का  भी कहे, कोना  भाष कुयोग!
कोना  भाष  कुयोग, कोण  को  कहते ज्ञानी!
न्यून,अधिक समकोण,कहें गणितज्ञ विधानी!
शर्मा   बाबू   लाल, जरूरी   शुभ  यह  होना!
भींत  भींत  समकोण, कक्ष  भवनों  में कोना!

.                   ४८    *मेला*
मेला मन के मेल  का, रीति प्रीति का पंत!
सखी  सहेली  साथ  में, मीत सनेही  कंत!
मीत  सनेही  कंत, मिले मन की बतियाएँ!
खेलें  खाएँ  खूब, हँसे  शिशु संग  झुलाएँ!
शर्मा  बाबू   लाल,  देख  जन  रेला  ठेला!
परिजन  पुरजन संग,चलें  देखें सब मेला!
(पंत~पथ  ,  कंत~पति)

•.               ४९   *धागा*
उलझा धागा  प्रेम का, रिश्ते लुटते स्वार्थ!
ताने बाने  के सखे, बदल गये  निहितार्थ!
बदल गये  निहितार्थ, बना धागे से  मंझा!
काटे  पंख पतंग, लड़े  उड़ मानस  झंझा!
शर्मा  बाबू  लाल, नेह  का  धागा सुलझा!
जाति धर्म संस्कार, बंधनो में  जो उलझा!

•.              ५०  *बिखरी*
बिखरी  छटा पतंग  की, कटी अधर में डोर!
कटी लुटी फिर फट गई,विधना लेख कठोर!
विधना  लेख  कठोर , वृद्धजन  कटी  पतंगे!
खपे  आयु  पर्यन्त,  रहन  अब  रही  उमंगे!
शर्मा   बाबू  लाल, जिंदगी  जिनसे  निखरी!
कटी  पतंग  बुजर्ग, उमंगे   बिखरी  बिखरी!
(रहन ~ गिरवी)

•.                ५१. *गलती*
गलती  हो  यदि  वैद्य से, दबती  बात मशान!
अधिवक्ता  की  न्याय में, भले  बिगाड़े  मान!
भले  बिगाड़े  मान, वणिक  बस  घाटा खाए!
यौवन बालक शिल्प , क्षम्य वह भी हो जाए!
शर्मा   बाबू  लाल, भूप   की  दीर्घ  सुलगती!
शिक्षक कवि साहित्य, पड़े भारी भव गलती!

•.                ५२  *बदला*
बदला लिया कलिंग ने, किया मगध का ह्रास!
दोनो तरफ विनाश बस, पढिए जन इतिहास!
पढ़िये जन इतिहास, सत्य जो सीख सिखाए!
भूत  भावि   संबंध,  शोध  नव  पंथ  दिखाए!
शर्मा   बाबू   लाल, करो  मत  मानस  गँदला!
लेते    देते   हानि , सखे   दुख दायक बदला!

•.                 ५३  *दुनिया*
दुनिया मतलब की  हुई, स्वार्थ  भरा संसार!
धर्म सनातन की सखे, बिकती सीख उधार!
बिकती सीख  उधार, पंथ  दादुर सम  बोले!
पढ़  अंग्रेजी   बोल, नये  युग  उड़े  हिँडोले!
शर्मा  बाबू  लाल, भूलते  गज  वह  गुनिया!
एकल अब  परिवार, भीड़ में एकल दुनिया!

•.              ५४ *तपती*
तपती असि धनु वीरता, मरुथल  राजस्थान!
सहज पतंगाकार सम, किले  महल पहचान!
किले महल  पहचान, आन इतिहास बखाने!
आतुर युवा किशोर, देश हित शक्ति दिखाने!
शर्मा   बाबू   लाल, बाजरी   सरसों   पकती!
आन बान अरु शान, जवानी जन की तपती!

•.                  ५५ *मेरा*
मेरा मेरा  सब  करे, मैं  का भाव कुभाव!
ममता माया  मोह  मैं, कारण  द्वेष दुराव!
कारण द्वेष दुराव, अहं का भाव विनाशी!
हम का बोल  उवाच, हमारे हों  विश्वासी!
शर्मा  बाबू लाल, समझ नित नया सवेरा!
मनुज  हितैषी  मान, त्याग भव तेरा मेरा!

•.              ५६  *सबका*
सबका पानी आसमां, सिंधु सरित परिवेश!
पृथ्वी पवन प्रकाश पर, पलता  प्रेम प्रदेश!
पलता प्रेम प्रदेश, देश हित जीवन अपना!
पर  उपकारी  भाव, भारती   सेवा  सपना!
शर्मा बाबू लाल, माल्य के हम सब मनका!
अपना  भारत देश, तिरंगा  अपना सबका!

•.                ५७  *आगे*
आगे   उड़े   पतंग   तो,  पीछे   रहती  डोर!
कठपुतली सी नाचती, मन के वश दृग कोर!
मन के वश दृग कोर , रहे मन वश तृष्णा के!
इच्छा  तृष्णा  मोह, कृष्ण  वश में कृष्णा के!
शर्मा  बाबू  लाल, बँधे   सब  प्रभु  के   धागे!
लगते सब असहाय, मनुज  विधना के आगे!

•.                ५८. *मौसम*
आते मौसम की तरह,सुख दुख जीवन संग!
गर्मी   या  बरसात  हो, शीत   कपाएँ   अंग!
शीत  कपाएँ   अंग, पवन   पुरवाई   चलती!
कभी बसंत बयार, आश जन मन में पलती!
शर्मा  बाबू   लाल, विपद  मिट  हर्ष  सुहाते!
बदले  जीवन   राग, रंग  सम  मौसम  आते!

•.              ५९. *जाना*
जाना तो तय हो गया, जब  जन्मा  इंसान।
दुर्लभ  मानुष देह यह, रख अच्छे अरमान।
रख  अच्छे अरमान, भारती  से  वर  माँगो।
बुरे   कर्म  परिहार, द्वेष  सब  खूँटी   टाँगो।
शर्मा   बाबू  लाल,  गीत  वीरों   के   गाना।
जन्म मिला जिस हेतु, काम पूरे कर जाना।

•.               ६० *करना*
करना केवल कर्म नर,मत कर फल की आस।
भले  कर्म  होते  फलित, मान   ईश  विस्वास।
मान   ईश   विश्वास,  कर्म   करना   उपकारी।
देश  धरा  आकाश,  पवन   पानी   हितकारी।
शर्मा   बाबू   लाल,  तिरंगे   हित   ही   मरना।
मृत्यु  शास्वती  सत्य, अमर  भारत माँ करना।

•.               ६१ *दीपक*
जलता पहले तो स्वयं, पीछे  तिमिर पतंग।
देता   दीपक  रोशनी, घृत  बाती  के  संग।
घृत बाती के संग, जले नित जन उपकारी।
करें प्राण उत्सर्ग, लोक हित बन तम हारी।
शर्मा  बाबू  लाल, स्वप्न  नित नूतन पलता।
चाहे तम का अंत, नित्य ही दीपक जलता।

•.                 ६२ *पूजा*
करना पूजा  ज्ञान  की, मानस मान सुजान।
राष्ट्र गान  से  वन्दना, संसद  वतन  विधान।
संसद वतन विधान, पूज निज भारत माता।
सरिता सागर भानु, धरा शशि प्राकृत नाता।
शर्मा  बाबू  लाल, शीश  चंदन  रज  धरना।
गुण मानवता  सत्य, न्याय की पूजा करना।

•.                 ६३ *थाली*
थाली जिसमें खा रहे, करे उसी में छेद।
करे परिश्रम  बावरे, वृथा  बहाए  स्वेद।
वृथा बहाए  स्वेद, ताकते  राम  भरोसे।
घर  की  मुर्गी  दाल, पराये भात परोसे।
शर्मा, बाबू लाल, चाल चलते मतवाली।
घी, बूरे की मौज, लगे औरों की थाली।

 .                   ६४  *बाती*
बाती घी या  तेल से, रखती  मानस मेल।
पहले जलती है  स्वयं, पीछे घृत या तेल।
पीछे घृत या  तेल, निभाती  प्रीत मिताई।
दूध नीर सा  मेल, प्रीत  की  रीति  दुहाई।
शर्मा, बाबू  लाल, जले तब  रात सुहाती।
रहे  दीप  का नाम, तेल घी जलती बाती।

•.                 ६५ *आशा*
चातक  सी  आशा  रखो, मत तुम त्यागो धीर।
स्वाति बिंदु सम लक्ष्य भी, निश्चित मान प्रवीर।
निश्चित   मान  प्रवीर, पिपासा  धारण   करले।
करो  परिश्रम  कर्म, जोश  तन मन  में  भरले।
शर्मा   बाबू   लाल, भूल मन   नाम   निराशा।
जाग्रत   सपने  देख, कर्म  कर  पूरित  आशा।

•.                 ६६ *उड़ना*
उड़ना देख  विहंग का, मन में  रहा विचार।
मन  ऊँचा  इनसे  उड़े,  मनुज  देह लाचार।
मनुज  देह  लाचार, चाह  है  नभ में जाना।
सूरज  तारे  चंद्र, पहुँच  कर कविता  गाना।
शर्मा  बाबू  लाल, नेह  बल  सबसे जुड़ना।
धरती पर  हो पाँव, नयन  मन ऊँचे उड़ना।

•.                  ६७ *खिलना*
खिलना  चाहे  हर  कली, बनना सुंदर  फूल।
तोड़ो मत उसको सखे, भ्रमर  बनो अनुकूल।
भ्रमर बनो अनुकूल, सोच  उद्धव सी रखना।
देना उत्तम ज्ञान, दर्द  कुछ  मन का  चखना।
शर्मा  बाबू  लाल, चाह  मन  सबसे  मिलना।
संपद विपद समान, फूल जैसे नित खिलना।

•.                 ६८ *होली*
होली  होनी  थी  हुई, पर्व   मने   हर साल।
बेटी बनती  होलिका, मरती  मौत  अकाल।
मरती मौत अकाल, कहे सब सुता बचाओ।
सच्चे  कितने लोग, सत्यता  जान  बताओ।
शर्मा   बाबू  लाल, जले   मत  बेटी  भोली।
खेल   रंग   संघर्ष, बचो   बनने   से  होली।

•.                 ६९ *साजन*
साजन  सीमा  पर  चले, तकती  विरहा  राह।
देश प्रथम अपने लिए, कहूँ  न तन मन आह।
कहूँ  न  तन मन आह, यही बस मेरी  चाहत।
पहले   रखना   देश,  हमारा  प्यारा    भारत।
करो  न  मेरा  मोह,  बचे  भारत  का  सावन।
विजित बने जब देश, तभी घर आना साजन।

•.                 ७०  *सजना*
सजना है  मुझको सखी, अनुपम कर  शृंगार।
अमर  सुहागिन  मै  बनूँ, शत्रु दलन  अंगार।
शत्रु  दलन  अंगार, देश  हित मुझे सजाओ।
सीमा पर अरि घात , युद्ध के साज बजाओ।
शर्मा बाबू लाल, सजन मुश्किल मम बचना।
लक्ष्मी  बाई  याद, उन्हीं  की   जैसे  सजना।

•.                 ७१ *डोरी*
डोरी   रेशम  सूत  की, बनती  रही  सदैव।
जैसी जिसकी  भावना,  हो उपयोग तथैव।
हो  उपयोग  तथैव, प्रीत के  बंध  सुहावन।
बुनते फंदा जाल, करे कुछ काज अपावन।
शर्मा  बाबू  लाल, अन्न  हित  बनती  बोरी।
भले  भलाई  बंध, नेह   मय  राखी  डोरी।

•.                 ७२ *बोली*
बोली  मीठी   बोलना, कहते  संत सुजान।
यही करे अंतर मनुज, कोयल कागा  मान।
कोयल कागा मान, मनुज सच मीठा बोले।
झूठ  बोल  परिवेश, हलाहल  मत तू घोले।
शर्मा  बाबू  लाल, दवा  की बनकर  गोली।
करती  भव  उपचार, घाव  भी देती बोली। 

•.                  ७३ *पाना*
पाना  है  निर्वाण  मन, कर  जीवन निर्वाह।
सत्य शुभ्र कर्तव्य कर, छोड़  व्यर्थ परवाह।
छोड़ व्यर्थ परवाह, सँभालें जो मिल पाया।
और  और  कर  टेर, कर्म  का मर्म गँवाया।
शर्मा बाबू लाल, रिक्त  कर  सबको  जाना।
दैव  दुर्लभम्  देह, बचा  अब क्या है पाना।

•.             ७४  *खोना*
खोना  मत  जीवन  वृथा, संगी  सच्चे  मीत।
माँ,  भाषा  भू  भाग के, वतन गुमानी  गीत।
वतन गुमानी  गीत, प्राक  इतिहासी महिमा।
आन बान अरु शान, हिन्द हिन्दी की गरिमा।
शर्मा   बाबू  लाल, दाग  मन  मानस  धोना।
मान   धरोहर   देश, नहीं   आजादी  खोना।

•.                  ७५ *यादें*
यादें हैं इतिहास की, रखिये याद सुजान।
खट्टी मीठी बात सब, गौरव  मान गुमान।
गौरव  मान गुमान, उन्हे हम रखें सँभालें।
करलें गलती याद, बचें उनसे  प्रण पालें।
शर्मा बाबू लाल, सोच  फिर अटल इरादे।
करें देश हित कर्म, रहें  अपनी  भी यादें।

•.                 ७६ *छोटी*
छोटी सी गुड़िया मिली, जिसे जन्म सौगात।
भाग्यवान वह है पिता, धन्य धन्य वह मात।
धन्य धन्य वह मात, पालने  शक्ति झुलाती।
सब  परिवार  प्रसन्न, सुने  बोली  तुतलाती।
शर्मा  बाबू  लाल, सुता सुन्दर  नख - चोटी।
कुदरत का वरदान, सृष्टि धुर गुड़िया छोटी।

•.                   ७७ *मीठी*
मीठी  बोली  बोलिये, कोयल  जैसे  मित्र।
सत्य मान अपनत्व से, उत्तम  बना चरित्र।
उत्तम बना  चरित्र, भाव  उपकारी  मानव।
कर्कश बोले काग, कर्म  भाषा ज्यों दानव।
शर्मा बाबू लाल, प्रेम  रस  पिस कर पीठी।
बने  दाल पकवान, जिंदगी  मानस  मीठी।

•.                 ७८  *बातें*
बातें  कहती   ज्ञान  की,  दादी  नानी  मात।
किस्से और कहानियाँ, अनुपम मन सौगात।
अनुपम मन  सौगात, याद वे अब भी आती।
भूली  बिसरी बात, सहज  इतिहास  बताती।
शर्मा  बाबू  लाल, कठिन  कटती  जब  रातें।
करलें  बचपन  याद, पुरातन  युग की  बातें।

•.               ७९ *चमका*
चमका  मेरा  भाग्य  जब, पाई  कलम सुगंध!
करे हृदय कोटिश नमन, कहे 'लाल' यह बंध!
कहे  'लाल' यह बंध, शौक  बस था कविताई!
लगे   प्रेत   सम   छंद, मिले  संजय सम भाई!
अनिता   मंदिलवार, विदूषी   पावन  भभका!
सपन फलित विज्ञात, पटल का यश यूँ चमका!

•.                 ८० *गीता*
गीता अनुपम  ग्रंथ है, कर्म  ज्ञान  प्रतिमान!
सार्थ करे जो पार्थ का, कहे कृष्ण भगवान!
कहे कृष्ण भगवान, महा ऋषि  व्यास लिखाये!
अष्टादश  अध्याय, सात सौ  श्लोक समाये!
शर्मा  बाबू लाल, समय  को  किसने जीता!
काल कर्म  अधिकार, धर्म  पथ दर्शी गीता!

•.                   ८१ *माना*
माना मानुष तन मिला, बल मन भाषा भाव!
मानवता  हित  कर्म  में, रखिये मीत लगाव!
रखिये मीत लगाव, मान  यह  जीवन नश्वर!
प्राकृत ही बस सत्य, नियंत्रक  हैं जगदीश्वर!
शर्मा   बाबू  लाल, गोल  पृथ्वी  यह  जाना!
जहाँ मिला सद् ज्ञान, उसी को परखा माना!

•.               ८२ *कहना*
कहना  बस मेरा यही, सुन नव कवि प्रिय मीत!
शिल्प कथ्य  भाषा सहित, रखें  भाव  सुपुनीत!
रखें  भाव  सुपुनीत, छंद  लिखना  कुण्डलियाँ!
सृजन धरोहर काव्य, उठे क्यों कभी अँगुलियाँ!
शर्मा   बाबू  लाल, समीक्षा  निज  हित  सहना!
अनुपम   लिखना   छंद, प्रभावी  बातें  कहना!

•.                   ८३ *सहना*
सहना सुख का भी कठिन, उपजे मान घमंड!
गर्व  किये  सुख  कब  रहे, हो संतति  उद्दण्ड!
हो   संतति   उद्दण्ड ,चैन   सुख  सारे   खोते!
हो अशांत  आक्रोश, बीज खुद दुख  के बोते!
शर्मा   बाबू   लाल, मीत  दुख  संगत   रहना!
कृपा ईश की मान, मिले जो दुख सुख सहना!

•.                 ८४  *वंदन*
वंदन करें किसान का, जय जय वीर जवान!
नमन श्रमिक मजदूर फिर, देश धरा विज्ञान!
देश धरा विज्ञान, लोक शिक्षक कवि सरिता!
सागर  पर्वत  पेड़, पिता  माता  की कमिता!
शर्मा   बाबू  लाल , पूज  शिव - गौरी  नंदन!
गाय  गगन खग नीर, वात  पावक का वंदन!

•.                  ८५ *आसन*
आसन   को   करते   नमन,  रही  पुरातन   रीत!
पाए   जो   आशीष  वह,  होता  कब   भयभीत!
होता   कब   भयभीत, पद्म  आसन  माँ   शारद!
सुर नर मुनि जन ईश, असुर सज्जन ऋषि नारद!
कहे    लाल   कविराय,  करें    वंदन   चतुरानन!
करलें   जीवन  धन्य, नमन  गुरु  शारद  आसन!

•.                 ८६  *आतुर*
आतुर जल सरिता बहें, चाहत  मिले  नदीश!
देश हितैषी कर्म कर, मनुज मिलन जगदीश!
मनुज मिलन  जगदीश, स्वर्ग के  बने सितारे!
धरा  रहे   यश  मान,  गान  बजने   इकतारे!
शर्मा   बाबू  लाल ,  दीप  से   बन  दीपांकुर!
चाहत  मान  शहीद, तिरंगा  लिपटन  आतुर!

•.                   ८७ *आभा*
आभा सविता की सतत, प्राकृत विविध प्रमाण!
जड़ चेतन  सागर मनुज, जीव जन्तु तरु  प्राण!
जीव   जन्तु   तरु   प्राण,  बसंती  ऋतु  बौराए!
भँवरे   तितली  कीट, गीत  पिक  विरह  बढाए!
शर्मा   बाबू   लाल,  डाल   तरु   सजते  गाभा!
पछुआ  सुखद  बयार, बढ़े जन मन की आभा!
(गाभा ~ नव कलियाँ)

•.                ८८ *चितवन*
चंचल चर चितवन चषक, चण्डी चुम्बक चाप!
चपला चूषक चप चिलम,चित्त चुभन चुपचाप!
चित्त  चुभन  चुपचाप, चाह    चंडक   चतुराई!
चमन   चहकते  चंद,  चतुर्दिश  चष   चमचाई!
चाबुक  चण्ड चरित्र, चाल  चतुरानन चल चल!
चारु  चमकमय  चित्र, चुनें  चॅम  चंदन  चंचल!
(चंडक~चंद्र,चॅम~मित्र, चष~दृश्य शक्ति, चप~चूने का घोल)

•.                 ८९ *मोहक*
मोहक मनमोहन मधुर, गिरिधर छवि गोपाल।
राधा  ग्वालिन  साथ  में, सजे  कन्हैया  लाल।
सजे  कन्हैया   लाल, बाँसुरी   मीठी   बजती।
पियें  हलाहल  मौन, भाव  मन  मीरा भजती।
शर्मा  बाबू  लाल, कृष्ण  की  छवि के दोहक।
मोर  मुकुट   शृंगार, श्याम  दृग सूरत  मोहक।

•.                  ९० *शीतल*
शीतल मंद समीर  जल, वन  हो  अभयारण्य।
चीता बाघ सियार कपि, देख  मनुज मन धन्य।
देख   मनुज  मन  धन्य, लोमड़ी  भालू  हाथी।
नीलकंठ पिक मोर,सहज खग मृग मय साथी।
विविध  वृक्ष  गउ  नील, तेंदुए  हिरनी  चीतल।
मानव के हित मान, वन्य वन तरु जल शीतल।

•.                 ९१  *जीता*
जीता  चेतक, प्राण तज, विजय प्रतापी आन।
विजित अकबरी सैन्य थी, हार गया  वह मान।
हार  गया  वह मान, मुगलिया  मद  सत्ता  का।
भूले क्यों गत युद्ध, खड़ग जय मल पत्ता  का।
हल्दी घाटी "लाल", मुगल कुल कब का  रीता।
राणा   वन्श  महान, शान  से  अब  भी जीता।

•.                  ९२ *हारा*
हारा  जो  हिम्मत  नहीं, जीता  उसने  युद्ध।
त्याग  तपस्या  साथ  ही, बने  धैर्य से  बुद्ध।
बने  धैर्य  से  बुद्ध, तथागत  जन  दुखहारी।
किया प्राप्त बुद्धत्व,जीत कर भाव विकारी।
शर्मा  बाबू  लाल, हार  मत,  मिले किनारा।
पढ़ो  विगत संघर्ष, धीर जन  कभी न हारा।  

•.                   ९३  *नारी*
नारी है  सबला सदा, मानो सत्य सुजान।
जीवन दाता  सृष्टि में, नारी अरु भगवान।
नारी अरु भगवान, सृष्टि भू इनसे चलती।
पले  गर्भ  नौ माह, पोषती पालन करती।
शर्मा  बाबू  लाल, तजें मन भाव विकारी।
करना  इनका  मान, नेह का सागर नारी।

•.                ९४  *साहस*
साहस से मिलती विजय, बिन साहस तय हार।
गज  को  शेर  पछाड़  दे, व्यर्थ  सहे तन  भार।
व्यर्थ सहे  तन भार, बिना हिम्मत  कब कीमत।
हिम्मत का  यश  मान, यही है सच्चा अभिमत।
शर्मा  बाबू  लाल,  पड़े  क्यों  नर  सम  बाहस।
करो लोक हित  कर्म, बुद्धि  बल अपने साहस।
(बाहस,वाहस~अजगर)

•.                 ९५  *नटखट*
नटखट   नटवर कर पहल, डग मग पद  धर संग।
रज कण कण गदगद नमन, पद पद सट कर अंग।
पद पद सट कर अंग, सतत  चल चल भव नटवर।
यशुमति गदगद नंद, कलम तब जन मन कविवर।
कहत सहज कविसंत,लिखत बचपन यह झटपट।
उड़ पल पल मन भृंग, शरण तव गिरधर नटखट।

•.             ९६ *अंकुश*
अंकुश  से  हाथी  सधे, मनुज  असुर  वर  देव।
सब जग भव भय स्वार्थवश,करे कर्म स्वयमेव।
करे  कर्म   स्वयमेव,  श्राप   वरदान   विधानी।
गीता  ग्रंथ  अपार, लिखे  जन  काव्य  कहानी।
शर्मा   बाबू   लाल,  बने  शिव  शंकर   भ्रंकुश।
भस्मासुर  का  अंत, सृष्टि  जनहित  में  अंकुश।
(भ्रंकुश:- स्त्री वेष में नाचने वाला पुरुष)

•.                   ९७  *चंदन*
चंदन  तरुवर  गंध  से, परिचित सभी सुजान।
घिस घिस लगे ललाट पर, शीतल चंद्र समान।
शीतल   चंद्र   समान, पेड़  पर  सर्प  लिपटते।
महँगी  बिकती  काष्ठ,  चोर  इसलिए  झपटते।
करे   लाल  कविराय, धाय  पन्ना    को  वंदन।
निभा राज  भू  धर्म, कटाया  निज सुत  चंदन।

•.                 ९८ *थोड़ा*
थोड़ा  दम  भरता  तुरग, करता नाला पार।
मनु बाई  सम  अश्व तव, होता  यश संचार।
होता  यश  संचार,  बची  होती    वह  रानी।
होते  तभी  स्वतंत्र, बदलती  कथा  कहानी।
अड़ा  न  होता सोच, अमर  तू  होता घोड़ा।
कर चेतक को याद, अश्व भरता  दम थोड़ा।

•.                   ९९  *पूरा*
पूरा  होता   ज्ञान   कब,  होता  ज्ञान  अनंत।
कौन हुआ सर्वग्य जन, अब तक धरा दिगंत।
अब तक धरा दिगंत, ज्ञान  का छोर न पाया।
बढ़ता रहता नित्य, मनुज मस्तक  की माया।
शर्मा   बाबू   लाल,  अभी   है  ज्ञान  अधूरा।
सतत करें कवि कर्म, ध्यान  दें तन मन पूरा।

•.              १००   *सपना*
सपना  था  यह  सच  हुआ, शतक  वीर  सम्मान।
कुण्डलिया लिख लिख हुए, कविजन सभी महान।
कविजन  सभी   महान,  मिले  गुरु  सब  पारंगत।
कुण्डलिया   मन  भाव,  छंद शाला    के    संगत।
शर्मा    बाबू   लाल,  समीक्षक   बन  कर  तपना।
लिख शतकाधिक छंद, फलित हम सबका सपना।
•.                    
बाबू लाल शर्मा,बौहरा

कुण्डलिया
.                      नीति
जग में  जय  या  हार  का, होता  अन्तर्द्वन्द।
इनसे  जो  ऊपर  उठा , उसे  कहो   निर्द्वन्द।
उसे  कहो निर्द्वन्द, विजय जो  मन पर  पावे।
विजय कहें ये मान, जीत अवगुण को जावे।
कहे लाल कविराय, पड़े   बाधा  यह मग में।
करते  युद्ध विनाश ,  बने घातक इस जग में।

.               
बाबू लाल शर्मा "

    कुण्डलिया छंद
.              संवेदना
.              १
होती है संवेदना, कवि  पशु  पंछी  वृक्ष।
मानव मानस हो रहे, स्वारथ पक्ष विपक्ष।
स्वारथ पक्ष विपक्ष, शून्य  संवेदक  बनते।
जाति धर्म के वाद, बंधु आपस में तनते।
भूल रहे संस्कार, रहे खो संस्कृति मोती।
हो खुशहाल समाज, तभी संवेदना होती।
.                 २
बढ़ती  है  संवेदना, राज  धर्म के साथ।
व्यक्ति वर्ग समाज सभी, रखें मनुजता माथ।
रखें मनुजता माथ, मान मानव  मन होवेें।
मिल के हो संघर्ष, शक्ति  आतंकी  खोवें।
समझें मन की बात, अराजकतायें घटती।
सत्ता  साथ  समाज, तभी संवेदना बढ़ती।
.              
बाबू लाल शर्मा, "बौहरा"

   आजादी
.         कुण्डलिया-छंद
.                1
आजादी महँगी मिली, नमन पन्द्रह अगस्त।
राज फिरंगी देश था, जन गण मन था त्रस्त।
जनगण मन था त्रस्त, महा, बलिदान दिये थे।
भारत  माँ को काट, भुजा दो टूक  किए थे।
"लाल" लहू्  कर भेद, बीज  बोये  बरबादी।
वतन  रहे  आबाद ,  रहे  अपनी  आजादी।
.                2
जनमत उत्तम विश्व में, भारत  का है आज।
जागरूक  होकर  रहो, बना रहे  माँ  ताज।
बना  रहे  माँ  ताज, शहीदी  कभी  न भूलें।
गोली ,कैद, अनाम, भले  फाँसी  पर  झूले।
"लाल"सभी आबाद, देश शासन का अभिमत।
रहे  तिरंगा  शान, अमर यह अपना जनमत।
.                3
आजादी  सबकी भली , पशु पक्षी इंसान।
सूर्य चन्द्र जब तक रहें, दमके हिन्दुस्तान।
दमके  हिन्दुस्तान, धर्म  सब  पंथ  समाने।
नही जाति  के  भेद, कर्म  से मनु  पहचाने।
कहे लाल कविराय, रहे यश मय आबादी।
मिलकर करें प्रयास, बचे सबकी आजादी।
.                 4
आजादी  का  पर्व  है, छाई  खुशी  अपार।
जनगणमन उत्साह है,निज जनतंत्र प्रसार।
निज जनतंत्र प्रसार,विश्व में गुरु भारत हो।
सोन  चिरैया  मान, हमारे  हर  कारज  हो।
कहे लाल कविराय, शत्रु की  कर बरबादी।
रख शहीद सम्मान, बचाएँ  निज आजादी।
.                5
माह अगस्त पन्द्रह तिथि, सन सैंतालिस याद।
अपना प्रिय भारत वतन, तभी हुआ आजाद।
तभी   हुआ  आजाद, तिरंगा  तब  लहराया।
चले   गये   अंग्रेज ,  भारती  जन   हरषाया।
"लाल" किले पर लोक, मोद खुशियाँ में समस्त।
घर घर  उत्सव मान, वर्ष प्रति माह अगस्त।
.                6
आजादी  हित  प्राण भी, दीन्हे  वीर  गँवाय।
यादें उनकी आज भी,, नयन अश्रु छलकाय।
नयन अश्रु छलकाय, शहीदी  लख कुर्बानी।
खातिर अपने देश , लुटाई चढ़त  जवानी।
"लाल" लहू का भोग,  भारती माँ  आराधी।
कोटिश नमन शहीद,जान दी हित आजादी।
.                 
RJ-1100/2018
बाबू लाल शर्मा "बौहरा"

       कुण्डलिया-छंद
.              हत भागी
.                 1
वरषा ने  है रोक दी, सबकी  ही  रफ्तार।
काले  हो  गये बाजरे, कड़ब हुई  बेकार।
कड़ब हुई  बेकार, फसल है  पानी पानी।
कैसी होती पीर, सुनो यह जुबाँ किसानी।
कहे लाल कविराय, पीर में भी मन हरषा।
भली  करेंगे  राम, बरसले तू अब  वरषा।
.                    2
बे  मौसम  का  बरसना, या  सूखे  की  मार।
तेरे   आगे   रामजी,  हुये   कृषक    लाचार।
हुये  कृषक  लाचार, डूब आशा  दर  आशा।
खेती  उजड़े  साख, घोर है  हुई निराशा।
कहे लाल कविराय, विनय करजोरि करें हम।
वर्षा  हो  या  ताप, शीत मत  हो  बे  मौसम।
.                      3
होता  है हर साल ही ,कुदरत  का यह  वार।
राम   रखें  तो  राज  का, सहना  अत्याचार।
सहना   अत्याचार,  नाम  अन  दाता  धारी।
धरती पुत्र  किसान, सदा ही  किस्मत हारी।
कहे लाल कविराय, फसल भी सस्ती खोता।
जय  किसान  बेहाल, सदा हत भागी होता।
.                 4
कर्जे   साहूकार   के , बैंको  के  भी  ब्याज।
भरे  फीस  फिर पुत्र की, और  घरेलू काज।
और   घरेलू   काज , बेटियाँ    शादी  वाली।
मात  पिता  की  दवा , करायें  जेबें   खाली।
कहे  लाल  कविराय , राज  के   भरने  हर्जे।
जय किसान बस घोष, भूख अरु बढ़ते कर्जे।
.                 5
खर्चे खाद व बीज के, और  मशीनें  जोत।
फसल साख में ही सदा, लागत खर्चे होत।
लागत खर्चे होत, फसल अरु पशुधन हारे।
काटे  भूख  किसान, रहे गुरबत  के  मारे।
कहे लाल कविराय, शेष  बिजली के पर्चे।
कैसे  भरे  किसान, रात  दिन  होते  खर्चे।
.                 
बाबू लाल शर्मा "बौहरा

रीत प्रीत मनुहार
.       कुण्डलिया छंद
.                  *1* 
हरियाली  हर  हार में, पावस  की  मनुहार।
प्रिये मिलन उपहार है,  झूलन  का त्यौहार।
झूलन  का त्यौहार, सखी सब  संगत झूले।
पिय हिय की बतराय, मोद मन ही मन फूले।
कहे लाल कविराय, झुलत हिय में वनमाली।
सखियाँ समझें और,बसे हरिमन हरियाली।
.              *2* 
सावन की शुभ तीज है,आ पहुँचे भरतार।
मन चाही मन  की  हुई ,रीत प्रीत मनुहार।
रीत  प्रीत मनुहार, लहरिया साजन लाए।
चूड़े  अजब  सिँगार, सिँजारे  घेवर  आए।
कहे लाल कविराय, चाह नित ऐसी पावन।
शिव गौरी श्रृंगार, कान्ह राधे  ज्यों सावन।
.               *3* 
भादौ,राखी आ रही, पिय सनेह बढ़ि अाय।
रीत प्रीत मनुहार करि,  पीहर प्रिया न जाय।
पीहर प्रिया न जाय, खुशामद सब ही करते।
राखी  देओ  भेज, तर्क  सब  अपने  धरते।
लाल लहरियो लाय,  लडावे  राधा  माधव।
घर  बाहर  मत  जाय, बधूटी  वर्षा  भादव।
.               *4* 
पावस मेल मिलाप की , पशु  पक्षी इन्सान।
प्रिये मिलन की आस में,पाले जनि अरमान।
पाले  जनि अरमान , जीव नर हो या मादा।
लता चढ़े तरु जाय, सभी जनि तज मर्यादा।
लाल   गुलाबी  रंग , पके फल गौरी तामस।
रीत  प्रीत  मनुहार , मनालो अपने  पावस। 
 .            
बाबू लाल शर्मा "

.          कुण्डलिया छंद
.                सबला
.                   🌼
अबला  नारी  को कहे, होता है अपमान।
बल पौरुष की खान ये, सबको दे वरदान।
सबको दे  वरदान, ईश  भी  यह जन्माए।
महा  बली  विद्वान, धीर   नारी  के  जाए।
देश रीति इतिहास,बदलती धरती सबला।
करें आत्म पहचान, नहीं  ये होती अबला।
.                  🌼
होती पीड़ा  प्रसव में, छूट सके  भी प्रान।
जानि  गर्भ धारण करे, नारी सबल महान।
नारी सबल  महान, लहू से  संतति  सींचे।
खान पान सब देय, श्वाँस जो अपने खींचे।
सूखे में शिशु सोय, समझ गीले  में सोती।
ममता सागर नारि, तभी ये सबला  होती।
.                  🌼
सबला ममता के लिए, त्याग सके निज प्रान।
देश धर्म  मर्याद हित, ले भी सकती जान।
ले भी सकती जान, जान इतिहास रचाती।
पढ़लो  पन्ना धाय, और जौहर  जज्बाती।
देती  लेती जान, जान क्यों कहते अबला।
सृष्टि धरा सम्मान, नारि प्राकृत सी सबला।
.                 🌼
करती  पालन है  सदा, रखे  गर्भ  नौ माह।
रखे वंश पति नाम को, ऐसी  सबला  वाह।
ऐसी सबला  वाह, पितर परिवार  भुलाती।
आदर  प्यार  दुलार, बनी  दातार   लुटाती।
शर्मा  बाबू लाल, नमन  सबला सँग धरती।
भक्ति शक्ति कर्तव्य, धरा या सबला करती।

बाबू लाल शर्मा
.
   ढूँढाड़ी-कुण्डलिया- छंद
.               शराब
.                  1
हाँसी,खाँसी खो दिया, कितरा ही परिवार।
साँसी  बात  शराब  री, डूब गया घर बार।
डूब   गया  घर  बार, गरीबी घर  मैं  छाई।
दारू  का हो शौक, मिलै कब  घर में पाई।
कहे लाल कविराय, यही  कंठा  री फाँसी।
कर शराब को त्याग, करै ली दुनिया हाँसी। 
.                 2
दारू  दुख दारिद्रता,  दुश्मन  भी  दुस्वार।
सगे सनेही मीत जण, करे  नही अतवार।
करे  नही  अतवार, भरोसो घर को कोनी।
माया  अरु  ईमान, डूबताँ   इनका  दोनी।
कहे लाल कविराय, मद्य  कै जूते  मारूँ।
पीलो गम सरकार,  पियो मत भाई दारू।
.                   3
नशो नाश को मूल़ है, और शान  प्रतिकूल।
मानुष जीवन आतमा, याँ कै नहि अनुकूल।
याँ कै नहि अनुकूल, बढ़ावै  या  अपराधी।
करै सबइ बरबाद, चले जब नशै री आँधी।
कहै लाल कविराय, बिगाड़ै  सबै अदरशो।
राख मान ईमान, मती कर कदै  नर नशो।
.          
बाबू लाल शर्मा "बौहरा"

        कुण्डलिया-छंद
.                        नेता
               १    
लोकतंत्र   में  उग  रहे, नेता  खरपतवार।
राज काज से खेंचते, ज्यों फसलों के सार।
ज्यों फसलों के सार ,चाटते  दीमक जैसे।
कर   समाज   में   फूट, सेंकते रोटी  वैसे।
कहे लाल कविराय, भ्रष्ट सब किया जमाना।
चरे  रोजड़े  खेत, चरे   ये बने अराना।
.                २  
आजादी  के  बाद  से, नेता  नहीं  महान।
अबके  नेता  लोपते, रोज  रोज  ईमान।
रोज रोज  ईमान, बेचते इज्जत खाते।
नित ही खाएँ घूँस, उदर इनके न अघाते।
कहे लाल कविराय, करें ये नित बरबादी।
उजले बगुले वेष, बचाते निज आजादी।
.               
बाबू लाल शर्मा "बौहरा

    . . वर्षा/बिरखा
.             कुण्डलिया छंद
.                *1* 
बिरखा  से जीवन रचे, प्राकृत और सजीव।
सबके अपने हित सधे,पशु पक्षी सब जीव।
पशु  पक्षी सब जीव ,मीत सब कोई चाहे।
ढोर  मवेशी  वन्य , सुगम  विचरे  चरवाहे।
कहे लाल कविराय, गये भर सरवर परिखा।
सबके सिरजे काज,संजीवनि होती बिरखा।
.               *2* 
वर्षा ऋतु के आगमन, खुशियाँ बढ़े हजार।
कृषकों की आशा बँधे, चहल पहल बाजार।
चहल पहल बाजार, तीज आती फिर राखी।
खुशियां आस किसान, पर्यटन की बैसाखी।
कहे लाल कविराय, सभी है जन मन हर्षा।
हरियल चूनर  धार, धरा जब आवै वर्षा। 
.                  *3* 
बिरखा करती  बादली, लगती है अनमोल।
बिनपानी जन घन उड़े, कोइ न समझे मोल।
कोइ न  समझे मोल, सदा  गाली ही सुनते।
वर्षा  हो या  मीत, किसी  के काम न सरते।
कहे  लाल कविराय, भलाई करले  मिनखां।
गाते गुण  सब लोग, बादली करती बिरखा।
.                 *4* 
सावन भटकी बादली, मानस आयु किशोर।
जीवन इनके व्यर्थ हैं,  वृथा मचावे शोर।
वृथा  मचावे  शोर , नहीं  दोनो उपयोगी।
सन बदले में दोष , बादली  मानस  रोगी।
कहे लाल कविराय, दोउ सुनलो मन भावन।
आओ लौट सुपंथ, भटक मत प्यारे सावन।
.                 *5* 
सावन  भटके  बींदणी, झूले हैं चहुँ ओर।
चार  दिनों के बाद में, कहाँ मिलेगी  ठौर।
कहाँ  मिलेगी  ठौर, दूर घर वर  सब भूले।
पड़  झूलों  के फेर, वृथा तन मन में फूले।
कहे लाल कविराय, यादकर घरवर पावन।
अपने रखो सँभाल ,बींदणी चलते  सावन।
.                *6* 
बरसाती देखी  घटा ,बरसे सावन  नैन।
पिछले ही सावन मिले, तबसे मिले न चैन।
तबसे मिले न चैन, बैन नहि मुख से उचरे।
मन पंछी की भाँति, रैन दिन नभ में विचरे।
कहे लाल कविराय, देख भर आती छाती।
हिय मे उठे बवाल, घटा देखे बरसाती।

RJ_1100/2018
बाब लाल शर्मा "बौहरा"
        गोबरधन
.              कुण्डलिया-छंद        
गोवर्धन पूजा करे, सब मिलकर के आज।
गोधन,पशुधन,के लिए, खेत किसानी काज।
खेत  किसानी  काज, कृष्ण गोवर्धन धारे।
करी  सुरक्षा   मेह ,इन्द्र  जब  बरसे  भारे।
सैनिक खेत  किसान, हमे प्यारा हो गोधन।
पशुधन   को  दें  मान, करें पूजा  गोवर्धन।
बनते बाटी चूरमा ,  गोबरधन   त्यौहार।
बने  सवाया भोज है, सधे सभी  व्यवहार।
सधे सभी व्यवहार,भोग अनकुट का खाते।
मिले बाँट जो खाय, परमपद को वे पाते।
राजा  हो  या  रंक, कभी न खिँचते तनते।
दीन  गरीबी  बैर, बंधु सम नाते बनते।
गोधन के रंगत लगा, कीजे खूब सिँगार।
चारा  पानी  दीजिए, करिये प्यार  दुलार।
करिए  प्यार  दुलार, रीढ़ है यही  हमारी।
पशुधन के सम्मान, टिकी है  खेती सारी।
है दातार किसान, मनालो सँग गोवर्धन।
दूध  दही  की  धार, बहेगी  पूजे  गोधन।
खुशियां  हो हर  वर्ग को, ऐसा है  त्योहार।
बचती बहुत मिठाइयाँ, बचा  पटाखे  चार।
बचा  पटाखे  चार, बाँट  कर   ऐसे  खेलें।
मिटे  विषमता  बैर, लगे खुशियों  के मेले।
शर्मा  बाबू लाल ,  सहे क्यों पीड़ा दुखिया।
सृजिए ऐसे साज, ईश जन को हो खुशियां।
पर्व कृषक का आज है, कृष्ण संग गोपाल।
सारे  भारतवर्ष  में , धरा  पूत   महि   पाल।
धरा पूत  महि पाल, मिले  गोधन  को  चारा।
धानी  चूनर धार, धरा  खुश  पशु धन सारा।
खूब मने  त्यौहार, नहीं  हो पर्व  कसक का।
खुशियाँ मिले अपार,मने यों पर्व कृषक का।

बाबू लाल 

कुण्डलिया
.            सुन्दरता
सुन्दर अपना देश है, सुन्दर जग  में  शान।
वन्य खेत गिरि मेखला, सरिता सिंधु महान।
सरिता सिंधु महान, समय  ये हैं मन भावन।
पेड़,गाय,जल,आग, इन्हे मानें  हम पावन।
कहे लाल  कविराय,  बरसते  यहाँ  पुरंदर।
सुन्दर सोच विचार, बोल भाषा सब सुन्दर।
.        २         
वंदन  सुन्दर  हो  रहा, सुन्दर शुभ परिवेश।
सुन्दर फल फूलों सजे,सुन्दर जिसका वेश।
सुन्दर जिसका वेश, कहें हम भारत माता।
चरण पखारे सिंधु, लगे ज्यों  वंदन गाता।
कहे लाल कविराय, करें हम भी अभिनंदन।
सुन्दर  साज  सँवार, करें  भारत  माँ वंदन।
.                 ३
मन की  सुन्दरता भली, तन को  देखे भूल।
सिया स्वर्ण मृग  देख के, भूली ज्ञान समूल।
भूली  ज्ञान  समूल, लोभ  मन  में  गहराया।
जागा नहीं विवेक,  अनोखी निशचर  माया।
कहे लाल कविराय, छले सुन्दरता  तन की।
सुन्दरता सत भाव, प्रीत गुण होती मन की।
 .                ४
कंचन वर्णी  गात हो, गुण मर्याद  विहीन।
सुन्दरता  कैसे कहूँ, रीत प्रीत  मति  हीन।
रीत प्रीत मति हीन, गर्व जो तन पर करते।
सुन्दरता वह मान, मान हित सबके मरते।
कहे लाल  कविराय, शहीदी  गाथा मंचन।
सुन्दरता  मत मान, छलावा काया  कंचन।

©बाबू लाल शर्मा "

 कुण्डलिया छंद
.          रंग बसंती संत
.                . १
मधुकर  बासंती  हुए, भरमाए  निज  पंथ।
सगुण निर्गुणी  बहस में, लौटे  प्रीत सुपंथ।
लौटे   प्रीत  सुपंथ, हरित परवेज चमकते।
गोपी विरहा  संत, भ्रमर दिन रैन खटकते।
कहे लाल कविराय, सजे फागुन यों मनहर।
कली गोपियों बीच, बने  उपदेशी  मधुकर।
.                     २
भँवरा  कलियों  से करे, निर्गुण  पंथी  बात।
कली गोपियों सी सुने, भ्रमर कान्ह  सौगात।
भ्रमर  कान्ह  सौगात, स्वयं का ज्ञान सुनाता। 
देख गोपियन प्रेम, कली,अलि कृष्ण सुहाता।
कहे लाल कविराय, भ्रमर का जीवन सँवरा।
रंग   बसन्ती  सन्त,  फिरे  मँडराता  भँवरा।

.        ©बाबू लाल शर्मा "बौहरा"

                  नारी
.               ( कुण्डलिया-छंद )
.                         १
नारी जग को धारती, धरती का प्रतिरूप।
पावन निर्मल है सजल , गंगा यमुन स्वरूप।
गंगा  यमुन स्वरूप, सभी को जीवन देती।
होती चतुर सुजान, भाव सब ही सह लेती।
कहे लाल कविराय, मनुज की है महतारी।
बेटी .बहू  समान , समझ  लो  दैवी  नारी।
.                         २
नारी को लक्ष्मी कहे  ,घर दर पालनहार।
भव सागर परिवार की, तरनी तारन हार।
तरनी तारन हार, ध्यान   से घर संजोती।
पीहर अरु ससुराल ,समझ संवादी होती।
कहे लाल कविराय, यही है अचरज भारी।
रहे साथ परिवार, सहेजो सब घर नारी।
.                         ३
शक्ति रूप नारी रही, और शक्ति की स्रोत।
नारी के  सम्मान पर, घर खुशहाली  होत।
घर खुशहाली  होत, देवता  भी आ जाते।
सब ग्रंथो क सार, धीर जन इन्हे बताते।
कहे लाल कविराय, जोरि कर हूँ आभारी।
ममता  नेह  दुलार, शक्ति उपकारी, नारी।
.                         ४
नारी, माता पुत्र की, भगिनि सुता या नार।
प्रेम समर्पण त्याग की, बहु खण्डी मीनार।
बहु खण्डी मीनार, खण्ड हर  नेह सजाती।
नेह निभाए खूब, स्वयं  को अहम तजाती।
कहत लाल कविराय ,नेह की नदी  हमारी।
इनका हो  सम्मान, यही हक  चाहत नारी।
.                        ५
रानी  झाँसी पद्मिनी ,रजिया  जैसी होय।
देश धर्म  मर्याद हित ,जीवन  बाती  बोय।
जीवन  बाती  बोय, उगे  बलिदानी खेती।
श्रमी शक्ति दे खाद ,बने ये फसल  अगेती।
कहे लाल कविराय, जरूरत इसकी खासी।
हर नारी बन जाय, आज फिर रानी झाँसी।

बाबू लाल शर्मा "

कुण्डलिया छंद
.             
                मुगल दरबार
राणा  हर  संदेश   को, लौटाते  हर  बार।
आन बान मेवाड़ क्यों, झुके मुगल दरबार।
झुके मुगल दरबार, मान तज बन दरबारी।
पा मनसब जागीर, चले रिश्तों की बारी।
शर्मा बाबू लाल, झुके कब  वे  भी राणा।
एकलिंग    दीवान,  वही   मेवाड़ी   राणा।

                राम दरबार
सीता रामानुज सभी, सजे राम दरबार।
हनुमत  बैठे  चौकसी, दर्शन  बारम्बार।
दर्शन  बारम्बार ,नयन ये  नहीं  अघाते।
शुद्ध रहे मन भाव, तभी हरि दर्शन पाते।
शर्मा बाबू लाल, समय कष्टों का  बीता।
दिव्य दर्श दरबार, नमन हे श्रद्धा सीता।

              क्रिसमस दरबार
आएँ शांता दिन बड़े, ले सबको उपहार।
सजते क्रिसमस पर्व को, ईसा के दरबार।
ईसा के  दरबार, सँदेशे  मिलते  हम को।
करो ज्ञान का मान, धरा से मेटो तम को।
कहे लाल कविराय, कर्म सौगात सजाएँ।
नई ईस्वी साल, भाव  अच्छे  मन  आएँ। 
,                कौरव दरबार
मध्य  सभा  में  द्रोपदी, द्यूत   सने   दरबार।
भीष्म विदुर  मन मौन थे, दुर्योधन  बदकार।
दुर्योधन   बदकार,  धूर्त  शकुनी  के   पासे।
पाण्डव  सर्वस  हार, सभा  में   रहे  उदासे।
कहे  लाल  कविराय, कर्ण    चाहे  भरपाई।
खिंचे  द्रोपदी  चीर, याद  कान्हा की आई।

            दिल्ली दरबार
मिटते  आतंकी  नहीं, बच जाते  हर  बार।
सेना  भी  आधीन  है, दिल्ली  के  दरबार।
दिल्ली के  दरबार, सभी भोगे  सुख सत्ता।
सेना को अधिकार, मिले फिर हिले न पत्ता।
कहे लाल कविराय, तभी अपराधी पिटते।
यदि चाहे  दरबार, सभी  आतंकी  मिटते।

बाबू लाल शर्मा "

कुण्डलिया छंद
.                  1 धीरज
धीरज  धर्म  व   हौंसला, इनके   राखे  जीत।
त्याग   नेह   ममता   रखे, उनसे  पाले  प्रीत।
उनसे  पाले  प्रीत, स्वार्थ अपने   सब  त्यागो।
रहिए   कर्म   प्रधान, नहीं  उद्यम   से  भागो।
कहता हूँ करजोरि, खिलो ज्यों जल में नीरज।
रखना  प्रीत प्रतीत, हौंसला धर्म  व धीरज।
.                     2 
पावन मन भावन रखे, मीत  और परिवार।
देश धरा  का  मान रख, जीवन के आधार।
जीवन   के   आधार, पड़ोसी   भाई  प्यारे।
परिजन, रिश्तेदार, रखो  सब  नेह  दुलारे।
कहे लाल कविराय, नित्य हो जैसे सावन।
पंथ कुपथ पहचान, रखें अपना मन पावन।
.              
बाबू लाल शर्मा "

कुण्डलिया
.                मातृभूमि
.                      *1*

वंदन माता भूमि को, करता हूँ कर जोरि।
जन्म  धरे  खेले  बढ़े, मातृभूमि  प्रिय  मोरि।
मातृभूमि  प्रिय  मोरि, कर्म की भूमि यही है।
जननी व जन्म भूमि, स्वर्ग  से  उच्च रही है।
कहे लाल कविराय, मुझे रज लगती चंदन।
कर अभिनंदन नित्य, मात का करना वंदन।
.                      *2*
माँ धरती हित जन्म है, इसके हित हो मौत।
बलिवेदी  पर मातु के ,जलती  रहे सु जोत।
जलती रहे सु जोत,शीश नितनव चढ़ते हों।
दुश्मन को दें मात, कदम नित नव बढ़ते हों।
कहे लाल कविराय, महा  भू पीड़ा हरती।
जीना  मरना हेतु, अमर  हो यह माँ धरती।

बाबू लाल शर्मा "बौहरा"

                 नवरात्रि
कुंडलिया
.                 1

नारी  शक्ति  उपासना, जग जननी  है  मात।
भक्ति शक्ति  का स्रोत है, शारदीय नवरात।
शारदीय नवरात,  वन्दना  कर  नवराता।
सिद्ध  बने शुभ काम, भाव भक्तों को भाता।
कहता कवि करजोरि, कृपा माता की भारी।
सबको ही हो लाभ, शक्ति दाता है नारी।
.                 2
माता  की  सेवा  करो , नवरात्रा   के  काल।
सुख सुविधाएँ भी मिले, धन दौलत खुशहाल।
धन  दौलत खुशहाल, फलेगी  पूरी  आशा।
ऐसी  मांगो  शक्ति, मिटे मन  प्राण  पिपासा।
कहे लाल कविराय, पूज    कन्या  नवराता।
बेटी  का  हो  मान , मनेंगी  तब   ही  माता।
.                 
बाबू लाल शर्मा "बौहरा"

कुण्डलिया छंद 
..    फागुन
होली  फागुन में  मचे, प्राकृत  रंग सुरंग।
मादक मौसम हो रहे, फड़के विरहा अंग।
फड़के विरहा अंग, करे यादें प्रियतम की।
रोज उड़ावे काग, पिया सँग करनी मनकी।
शर्मा  बाबू  लाल, मिले फागुन  हमजोली।
रंग  भंग   मय  चंग, मनावें फागुन  होली।

.........बाबू लाल 

कुण्डलिया छंद
.             उद्धव    
भँवरे  उद्धव  निर्गुणी, देते  क्या  उपदेश।
देश  वेष  गोपाल  का, बासन्ती  परिवेश।
बासन्ती  परिवेश, सगुण है  प्रीत  सनेही।
अली कली हरि नेह, बसे मन सुन निर्मोही।
शर्मा  बाबू  लाल, भजे हरि जीवन  सँवरे।
भ्रमित न कर मन मीत, करें हरि दर्शन भँवरे।
.                  
ज्ञानी  बन  उद्धव  गये, ज्ञान  बाँटने भृंग।
प्रेम  सनेही  गोपियाँ, चढ़े  न  उद्धव  रंग।
चढ़े न उद्धव रंग, मधुप गुंजार  पराजित।
हृदय गोपियन प्रेम, रहे है कृष्ण विराजित।
कहे लाल कविराय, पराजय ऊधो  मानी।
बासंती  ऋतु  प्रीत, टिके क्या  कोई  ज्ञानी।

बाबू लाल शर्मा "बौहरा"

 कुण्डलिया
.       ऋतु बासंती प्रीत
.                   🌹
आता है ऋतुराज जब, चले प्रीत की रीत।
तरुवर पत्ते दान से, निभे  धरा-तरु  प्रीत।
निभे धरा-तरु प्रीत, विहग चहके मनहरषे।
रीत  प्रीत  मनुहार, घटा बन उमड़े  बरसे।
शर्मा  बाबू लाल, सभी को  मदन सुहाता।
जीव जगत मदमस्त, बसंती मौसम आता।
.                 🌹
भँवरा तो  पागल  हुआ, देख  गुलाबी फूल।
कोयल तितली बावरी, चाह प्रीत, सब भूल।
चाह प्रीत,सब भूल, नारि नर सब मन महके।
चाहे पुष्प पराग, काम हित खग मृग बहके।
शर्मा  बाबू  लाल, मदन हित हर मन  सँवरा।
विरह-मिलन के गीत, सुने सब गाता भँवरा।
.                 🌹
चाहे भँवरा पुष्परस, मधुमक्खी  मकरंद।
सबकी अपनी चाह है, हे बादल मतिमंद।
हे बादल मतिमंद, बरस मत खारे सागर।
रीत प्रीत की ढूँढ, धरा मरु खाली गागर।
बासंती मन  लाल, भरो मत विरहा  आहें।
कर मधुकर सी प्रीत, चकोरी  चंदा  चाहे।

बाबू लाल शर्मा, "बौहरा"

कुण्डलिया छंद
.                 पुष्प
.                      
इतराता है,पुष्प क्यों, चार पहर की वास।
खुशबू  सम्पद बीतते, कोई न डाले घास।
कोई न डाले घास, रखें सब मतलब यारी।
बिना स्वार्थ के पुष्प, लगे रिश्ते सब भारी।
कहे लाल कविराय, सभी में यौवन आता।
यौवन ,संपद ,रूप,  मीत नाहक इतराता।
.           🌹
होवे फुल्ल प्रसून भी, कहें  सुमन अरु फूल।
पुष्प कुसुम  है मंजरी, पुहुप नाम मति भूल।
पुहुप नाम मति भूल, सहोदर शूल सुमन का।
एक मीत सा लगे, दूसरा  अरि  तन मन का।
मधुकर  हिम्मत मीत,फूल कंटक मिल सोवे।
दोनो  का  उपयोग , भिन्न   दुनिया  में  होवे।
.                 
बाबू लाल शर्मा "बौहरा"

कुण्डलिया 
                 अधिकार       
भारतवर्ष विधान में, दिए मूल अधिकार।
मानवता  हक में  रहे, लोकतंत्र  सरकार।
लोकतंत्र  सरकार, लोक से निर्मित होती।
भूलो मत  कर्तव्य, कर्म  ही सच्चे  मोती।
कहे लाल कविराय, अकर्मी पाते  गारत।
मिले खूब अधिकार, सुरक्षा अपने भारत।
.                  👀
दाता ने हमको दिया, जीवन का अधिकार।
बुरी आदतें  छोड़ दें, अपने  को  मत मार।
अपने को मत मार, समझ ले कृत मानव के।
पर पीड़ा  का पंथ, कहाते मग  दानव  के।
कहे लाल कविराय, करे सब भला विधाता।
निभे  सतत  कर्तव्य, कर्मफल  देंगे  दाता।
.               
बाबू लाल शर्मा "

 ढूँढाड़ी-राजस्थानी  कुण्डलिया छंद
.                  धूप
गरमी तपतो तावड़ो, सूरज जग रो भूप।
ढूँढाड़ी  धरती  चहै , अब सरदी  री  धूप।
अब सरदी री धूप  ,लगै सब जीवाँ प्यारी।
कदै धूप कद छाँव, कुदरती लीला न्यारी।
कहै लाल कविराय, राखणी मन मैं नरमी। 
भली शीत मैं धूप,  छाँव मै  बीतै  गरमी।
.                 👀
मरुधर  गरमी में तपै ,शी  मै मीठी  धूप।
सावण ,भादौ मेह नी , तौ भी लगै  सरूप।
तौ भी लगै सरूप, खेजड़ी  पेड़  रुपाल़ो।
बाजरिया  रा  रोट, राबड़ी  बाँध  धमालो।
कहे लाल कविराय, रोहिड़ा फूलाँ मधुकर।
धीर वीर निपजाय,  प्रतापी धरती मरुधर।
.           
बाबू लाल शर्मा "

कुण्डलिया छंद
.              उद्धव
.                   
भँवरे  उद्धव  निर्गुणी, देते  क्या  उपदेश।
देश  वेष  गोपाल  का, बासन्ती  परिवेश।
बासन्ती  परिवेश, सगुण है  प्रीत  सनेही।
अली कली हरि नेह, बसे मन सुन निर्मोही।
शर्मा  बाबू  लाल, भजे हरि जीवन  सँवरे।
मत भरमा मन मीत, करें हरि दर्शन भँवरे।
.             
बाबू लाल शर्मा

 कुण्डलिया छंद
.           
.   नीति
जग में  जय  या  हार  का, होता  अन्तर्द्वन्द।
इनसे  जो  ऊपर  उठा , उसे  कहो   निर्द्वन्द।
उसे  कहो निर्द्वन्द, विजय जो  मन पर  पावे।
विजय कहें ये मान, जीत अवगुण को जावे।
कहे लाल कविराय, पड़े   बाधा  यह मग में।
करते  युद्ध विनाश,  बने घातक इस जग में।

 .            हल्दीघाटी

जीता चेतक प्राण तज,विजय प्रतापी आन। 
विजित अकबरी सैन्य थी, हार गया था मान।
हार गया था मान, मुगलिया  मद  सत्ता  का।
भूले  लोहा  याद, भला  जय मल पत्ता  का।
कहे लाल  कविराय , वंश मुगलों  का  रीता।
राणा आन  महान, शान  से अब भी  जीता।
.           
बाबू लाल शर्मा "बौहरा"

      भोल़ी जनता
 ढूँढाड़ी-भाषा कुण्डलिया

चातर अर चालाक छै, नेता  नागर  नाग।
सीधे सादे सादगी, जनता जगती  जाग।
जनता जगती जाग, बबेरो बोल बणायो।
आयो  दौर चुणाव, घणेरो ढोल बजायो।
कहे लाल कविराय, वोट पटकावै चाकर।।
जनता भोळी गाय, घणाई नेता चातर।
.        
दळ बदळी नेता करै,छळ बळ धन की मार।
जनता  जोरी  सूँ  लड़ै ,इणमै  कोनी   सार।
इणमैं  कोनी   सार , बिना  पेंदी  का  लोटा।
इनकूँ  दो  ढुळकाय , समर्थन  करदो  नोटा।
कहे लाल कविराय, फले जद  काटे कदळी।
उनकूँ सबक सिखाय,करै ये जो दल बदळी।
.          
भोळी जनता लुट रई, नेताँ, दलळ हुशियार।
बुगला भगती जोर की,मन मैं छै अय्यार।
मन मैं छै अय्यार, सगा छै धन का कोरा।
कठै हुया आजाद, बण्या ये ही अब गोरा।
बचै लाल मुसकाय,चलै जब लाठी गोळी।
ये तो बच भग जाय,मरै या जनता भोळी।

बाबू लाल शर्मा "बौहरा

कुण्डलिया-

.            1.सावन
सावन आवन कह गये, धनके लोभ विदेश।
प्रीत रीत भूले  सभी , तन मन रहे  कलेश।
तन मन रहे कलेश, रात दिन नींद न आवे।
लग जाए कहिँ  नैन , रैन  में सपन सतावे।
"लाल" पपीहा मोर, शब्द दादुर मन भावन।
प्यासी चातक देख, निहारूँ आवन सावन।

.        2. पावस
पावस  सावन मास मे , शिव जी के उपवास।
सखी सहेली मिल करे, साजन नित उपहास।
 साजन नित उपहास, पिया परदेश बसे हैं।
नई  नई  नित नार , राह  भर  तंज कसे है।
कहे लाल कविराय, बिजुरिया तन सुलगावन।
नित बरसे ये नैन , झड़ी ज्यों पावस सावन।
 
.          3. बिरखा
बरसे  बिरखा सावनी, फसल  सजे संगीत।
दादुर पपिहा  मोर अहि, खोजे अपने मीत।
खोजे  अपने  मीत, नचे गावे वन डोले।
शिव पूजा नर नार , हरे  हर बम बम बोले।
कहे लाल कविराय, चुनर धानी  जो  सरसे।
शिव से है अरदास , नित्य ही बिरखा बरसे।

.       4. सावन वर्षा
बरसा सावन रात भर , उफने बंध तलाव।
खेत लबालब हो  रहे, नदियाँ चलती  नाव।
नदियां  चलती  नाव , राग पनिहारी  गावे।
कागज की  है नाव, बालपन नीर बहावे।
कहे लाल सुन बाल, खेलकर के मन हरषा।
नेह स्नेह व दुलार , प्रीत कर सावन बरसा।

.        5. विरह बधूटी
विरह  बधूटी सावनी , रूठे मत हर बार।
बार बार बेरुख करे, टूट जाय घर बार।
टूट  जाय  घर  बार , कई  ईमान  हारते।
शेष  महेश  सुरेश, नहीं  विश्वास  धारते।
कहे'लाल'कविराय, आस खुशहाली टूटी।
बचा रहे निज मान ,पावनी विरह बधूटी।

         भाईदूज
.                 ( कुण्डलिया छंद )
.                       👀
चलती रीति सनातनी, पलती प्रीत विशेष!
भाई बहिना दूज पर,  रीत  प्रीत  परिवेश!
रीत प्रीत  परिवेश, हमारी  संस्कृति न्यारी!
करे तिलक इस दूज, बंधु को बहिनें प्यारी!
शर्मा  बाबू लाल, सुहानी  संस्कृति पलती!
राखी  भैया  दूज, रीति  भारत  में चलती!
.                         👀
मीरा  जैसी  हो  बहिन, ऐसा  हो  अरमान!
बहिन चाहती है  सदा, भ्राता  कृष्ण समान!
भ्राता कृष्ण समान, रखे सुख दुख में समता!
मात पिता सम प्यार, रखे जो सच्ची ममता!
शर्मा  बाबू  लाल,  बहिन  सब  चाहे   बीरा!
मिलते सब सौभाग्य, सभी को बहिना  मीरा!
(बीरा~भाई)
.                       👀
भैया , भैया   दूज   पर, ले  भौजाई   संग!
मेरे  घर  आजाइयो, चाहत   मनो   विहंग!
चाहत  मनो विहंग, याद  पीहर  की आती!
कर बचपन की याद, आज भर आई छाती!
शर्मा  बाबू  लाल, बहिन  अरु  गैया, मैया!
रख  तीनों  का  मान, दूज पर  प्यारे भैया!
.             
.                      रजाई
.                           *१*
सर्दी  में  प्रिय  संग  से, मत कर  गर्व  गुमान!
अरी  रजाई   बावरी, भावि  विरह   पहचान!
भावि विरह पहचान, विलग है तुझको रहना!
कहे  न  पूछे  हाल, विरह  की पीड़ा  सहना!
शर्मा   बाबू   लाल,  समझ   दुनिया   बेदर्दी!
प्रीत  स्वार्थ  की  मान, रजाई प्रिय वश सर्दी!
.                         *२*
बारह में  से  नौ  गये, नेह  प्रीत प्रतिकूल।
तीन माह  प्रिय संग  में, रही  रजाई भूल।
रही  रजाई  भूल, यहीं  बस जग सच्चाई।
कष्ट विपद संघर्ष, चार दिन बस तरुणाई।
होते पूरा  स्वार्थ, बने  फिर नौ दो ग्यारह।
समझ  रजाई  सोच, वर्ष में पूनम  बारह।

बाबू लाल शर्मा,बौहरा


कुण्डलियाँ 
               श्रम करना
करना है कर्तव्य श्रम,
मत कर फल की आस।
भले कर्म होते फलित, 
मान ईश विस्वास।
मान ईश विश्वास,
 कर्म करना उपकारी।
देश धरा आकाश,
 पवन पानी हितकारी।
शर्मा बाबू लाल, 
तिरंगे हित ही मरना।
मृत्यु शास्वती सत्य, 
अमर भारत माँ करना।

बाबू लाल शर्मा,बौहरा


 ढूढाड़ी-राजस्थानी कुण्डलिया छंद
.     बाताँ राजस्थान री
.               👀
धोरां  री धरती अठै, चांदी  सो असमान।
पाग अंगरखा  केशरी, वीराँ रो  अरमान।
वीराँ   रो  अरमान, ऊँट री  शान  सवारी।
रेगिस्तान जहाज, ऊँट अब पशु सरकारी।
कहै लाल कविराय, पर्यटक  आवै  गोरां।
देवां  रै  मन चाव, जनमताँ  धरती  धोरां।
👀
खाटो  सोगर   सांगरी, कैर  काचरी  साग।
छाछ राबड़ी खीचड़ी, मरुधर मिनखाँ भाग।
मरुधर  मिनखाँ   भाग, चूरमा  सागै  बाटी।
दाल  खीर गुड़ खाँड, चाय चालै  परिपाटी।
कहै लाल कविराय, नामची  सँगमर  भाटो।
आन  बान   ईमान, मान  रो  इमरत  खाटो।
👀
धरती  धोराँ  री अठै, रणवीराँ  री  खान।
इतिहासी गाथा घणी, रजवाड़ी  सम्मान।
रजवाड़ी सम्मान, किला महलाँ री बाताँ।
जौहर अर  बलिदान, रेत रा टीबा  गाता।
कहे लाल कविराय, सुनहली रेत पसरती।
आडावल री आड़, ढोकताँ मगराँ धरती।
👀
निपजै मक्का  बाजरी, सरसों गेहूँ धान।
भेड़ ऊँट गौ बकरियाँ, करषाँ रा अरमान।
करषाँ रा अरमान, खेजड़ी ज्यूँ  अमराई।
सिर साँटै  भी रूँख, बचाया इमरत बाई।
कहै लाल कविराय, माघ सी वाणी उपजै।
मारवाड़ रा धीर, वीर मरुधर  मैं  निपजै।
👀
मेवाड़ी  अरमान  री, मारवाड़  री  आन।
मरुधर माटी वीरताँ, कितराँ कराँ बखान।
कितराँ कराँ बखान, धरा या सदा सपूती।
रणवीराँ री धाक, बजी दिल्ली तक तूँती।
कहे लाल कविराय, बात पन्ना री  जाड़ी।
चेतक  राणा  मान, नमन मगराँ  मेवाड़ी।
👀
देवा  रा   दर   देवरा,  लोक  देवता   थान।
खनिज अजायब धारती, धरती राजस्थान।
धरती  राजस्थान,  फिरंगी  मान्यो   लोहा।
घटी मुगलिया शान, बिहारी सतसइ दोहा।
कहै लाल कविराय, कृष्ण  मीरा  री सेवा।
मरुधर  जनमै  आय, लालसा करताँ देवा।
👀
मरुधर में नित नीपजै, मायड़ जाया पूत।
बरदायी सा चंद कवि, पृथ्वीराज  सपूत।
पृथ्वीराज सपूत, हठी हम्मीर गजब का।
दुर्गादास सुधीर, निभाये धर्म अजब का।
कहे लाल कविराय, ईश ही होवै हलथर।
राणा सांगा वीर, जुझारू  जावै  मरुधर।
👀
हजरत  है  दरगाह  मैं, छाई  खूब  सुवास।
अजयमेरु गढ बीठली, पुष्कर ब्रह्मा  वास।
पुष्कर   ब्रह्मा   वास, बैल  नागौरी   गायाँ।
जैपर शहर गुलाब, गजब  ढूँढा  री  माया।
कहै लाल कविराय, भरतपुर  नामी कसरत।
लोहागढ़ दे  मात, फिरंगी  मुगलइ हजरत।
👀
जिद्दी  हाड़ौती   बड़ी, वाँगड़  बाँसै   मेह।
बीकाणै   जोधावणै   , ढोला  मारू   नेह।
ढोला  मारू नेह, कथा  चालै  ब्रज  ताँणी।
मेवाती  सरनाम, लटक  आवै   हरियाणी।
कहे लाल कविराय, संत भी  पावै  सिद्धी।
आन बान की बात, मिनख हो जावै जिद्दी।
👀
बप्पा  रावल  री  जमीं, चौहानी  वै  ठाट।
राठौड़ी   ऐंठाँ   घणी, शेखावत,  तँवराट।
शेखावत, तँवराट, नरूका और  कछावा।
जाट राज परिवार, दिये दिल्ली तक धावा।
गुर्जर  मीणा  वैश्य, ब्राहमन,माली  ठप्पा।
सात   समाजी  नेह, निभावैं  दादा  बप्पा।
👀
बागा, साफा  पाग री, ऊँची राखण  रीत।
नेह प्रीत मनुहार मैं, भली निभावण मीत।
भली निभावण मीत, मूँछ री बाँक गुमानी।
सादा  जीवन  वेश, बोल   बोलै   मर्दानी।
कहे लाल  कविराय, नमन संतन् रै पागाँ।
अलबेला नर नारि, मोर कोयलड़ी  बागां।
👀
नामी गढ़ चितौड़  रो, कुंभलगढ़ सनमान।
लोहा गढ़  जालोर  गढ़, तारागढ़  महरान।
तारा गढ  महरान, किला  छै घणाइ  लूँठा।
हवा महल सा महल,डीग रा महल अनूठा।
कहे लाल कविराय, खेजड़ी पग पग जामी।
मंदिर झीलाँ महल, हवेली गढ़ सर नामी।
👀
आबू  दिलवाड़ै चढै, ऊपर मंदिर  चील।
पचपदरै डिडवाणियै, खारी साँभर झील।
खारी साँभर झील, उदयपुर झीलाँ नगरी।
बैराठी  अवशेष, आहड़  काली  बंग  री।
कहे लाल कविराय, करै दुश्मन  नै काबू।
राजपूत  उत्पत्ति, चार  पर्वत  यग आबू।
👀
बात  कहानी सभ्यता, देख नोह बागोर।
पुष्कर संग अरावली, दौसा  गढ़ राजौर।
दौसा   गढ़ राजौर, ओसियाँ  आभानेरी।
पाटण, भाण्डारेज, विराट  द्रौपदी   चेरी।
कहै लाल कविराय, भानगढ़ रात रुहानी।
सरस्वती मरु रेत, सिन्धु की बात कहानी।
👀
कोटा  मेला  दशहरा, मेला  और  अनेक।
लक्खी रामापीर सा, भिन्न जिलै सब एक।
भिन्न जिलै सब एक, घणा चरवाहा जंगल।
हेला ख्याल  सुगीत, प्रीत रा सुड्डा  दंगल।
कहै लाल  कविराय, पुजै बालाजी  घोटा।
शिक्षा  क्षेत्र  अनूप, नामची पत्थर  कोटा।
👀
नदियाँ बरसाती घणी, कम ही  बरसै मेह।
चम्बल, माही सोम रो, बहवै  सरस सनेह।
बहवै  सरस  सनेह, घणैई   बांध  बनाया।
टाँका  नाड़ी  खोद, बावड़ी  कूप  खुदाया।
कहे लाल कविराय, बीत गी जीवट सदियाँ।
नहर बणै वरदान, जुड़ै जब सावट नदियाँ।
👀
बाताँ राजस्थान री, और लिखे  इण हाल।
जैड़ी उपजी सो  लिखी, शर्मा बाबू लाल।
शर्मा  बाबू  लाल, जिला  दौसा  मैं  रहवै।
सिकन्दरो छै गाँव, छंद कुण्डलिया कहवै।
राजस्थानी   मान, विदेशी   पंछी   आता।
ढूँढाड़ी  सम्मान, कथी  मायड़  री  बाताँ।

© बाबू लाल शर्मा "बौहरा"

कुण्डलिया
       धरती
.                    
जगती की शोभा सदा, जीवन पानी पेड़।
प्राणवायु मिलती सखे, वृक्ष रोप पथ मेड़।
वृक्ष रोप पथ मेड़, जगह जो भी मिल जावे।
श्यामा पर ये पेड़, मेह  घन श्याम बुलावे।
कहे लाल कविराय, धरा मनभावन लगती।
पर्यावरण सुधार, बने स्वर्गिक जग जगती।

बाबूलालशर्मा,

कुण्डलिया
.         सावन
सावन मन भावन लगे, भक्ति शक्ति  संगीत।
सत्यम शिवम् विराजते, पावन सावन प्रीत।।
पावन  सावन  प्रीत, चढ़े झूले  पर सखियाँ।
तकती है मनमीत, बरसती  सावन अँखियाँ।।
शर्मा  बाबू  लाल, नहीं  हो  भाव  अपावन।
भक्ति  प्रीत संजोग, लुभाए   पावन सावन।।
👀
हर हर बम बम गूँजता, नभ में बिजली मेह।
वधु , कन्याएँ  झूलती, झूले   तीज  सनेह।।
झूले  तीज  सनेह , सजे  मेंहदी  व  कंगन।
इन्द्र धनुष  के  रंग, मने  फिर  रक्षा बंधन।।
शर्मा  बाबू  लाल , बँटें  तब घेवर  घर  घर।
राधा कान्हा संग, सुने  बोले  शिव हर हर।।

बाबू लाल शर्मा,"बौहरा"

कुण्डलिया
.              सुषमा
सुषमा हिंद स्वराज की, मिले स्वर्ग कश्मीर।
नाज वतन  करता रहा,  जनता  नेता  मीर।
जनता  नेता  मीर, स्वर्ग के  पथ को तकते।
गाते  सब गुणगान,  मानवी आज न थकते।
कहें लाल कविराय, स्वर्ग  की न्यारी उपमा।
वतन भाग्य  दुर्भाग्य,  गई भी  आई सुषमा।

बाबू लाल शर्मा, बौहरा

कुण्डलिया छंद
.                   दीप पर्व
.                     
माटी  का  दीपक लिया, नई  रुई  की बात।
तेल डाल दीपक जला,आज अमावस रात।
आज अमावस रात, हार तम सें  क्यों माने।
अपनी दीपक शक्ति, आज प्राकृत भी जाने।
कहे लाल कविराय, रात तम की बहु काटी।
दीवाली  पर  आज, जला इक  दीपक माटी।
.                    👀
दीवाली  शुभ पर्व  पर, करना  मनुज प्रयास।
अँधियारे  को  भेद  कर, फैलाना  उजियास।
फैलाना  उजियास, भरोसे  पर  क्या  रहना।
परहित जलना सीख, यही दीपक का कहना।
कहे लाल कविराय, रीति  अपनी  मतवाली।
करते   तम   से  होड़, भारती  हर  दीवाली।
.                
बाबू लाल शर्मा, बौहरा

कुण्डलिया छंद
.                    तिरंगा

भारत वतन  महान है, विश्व गुरू  पहचान।
लोकतंत्र  सबसे  बड़ा, सोन  चिरैया  मान।
सोन  चिरैया  मान, बहे  नद  पावन  गंगा।
जन गण मन अरमान, रहे बस शान तिरंगा।
कहे "लाल" कविराय, बचे यह धरा अमानत।
वतन शान  कश्मीर, तिरंगा अपना  भारत।
  .                 👀
आजादी, महँगी  मिली, हुए लाल  कुर्बान।
राज फिरंगी देश में, जन गण मन अपमान।
जन गण मन अपमान, रहे  अंग्रेजी  चंगा।
बलिदानों की बाढ़, लिये  हर हाथ  तिरंगा।
कहे लाल कविराय, हुई  जागृत  आबादी।
छिड़ी तिरंगे तान, मिली तब यह आजादी।

© बाबू लाल शर्मा, बौहरा

कुण्डलिया छंद
.          श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
.                    १
छीने  शासन  तात का, उग्रसेन सुत कंस।
वासुदेव अरु  देवकी, करे कैद  निज वंश।
करे  कैद निज वंश, निरंकुश कंस कसाई।
करता अत्याचार, प्रजा  अरु  धरा सताई।
कहे लाल कविराय, निकलते  वर्ष  महीने।
वासुदेव  संतान, कंस  जन्मत   ही   छीने।
.                २
बढ़ते  अत्याचार  लख, भू पर  हाहाकार।
द्वापर  में भगवान ने, लिया कृष्ण अवतार।
लिया कृष्ण अवतार, धरा  से  भार  हटाने।
संत  जनो  हित चैन, दुष्ट मय वंश  मिटाने।
कहे लाल कविराय, दुष्ट जन सिर पर चढ़ते।
 होय ईश अवतार, पाप हैं जब  जब बढ़ते।  
.                    ३
भादव  रजनी  अष्टमी, लिए   ईश अवतार।
द्वापर  में   श्री कृष्ण  बन, आए  तारनहार।
आए    तारनहार , रची    लीला   प्रभुताई।
मेटे   अत्याचार,  प्रीत   की   रीत   निभाई।
कहे लाल कविराय, कृष्ण जन्में कुल यादव।
जन्म अष्टमी  पर्व, मने अब घर  घर भादव।
(भादव~भादौ,भादों,भाद्रपद, भादवा )
.                ४
लेकर जन्मत कृष्ण को, चले पिता निर्द्वंद।
वर्षा  यमुना  बाढ़  सह, पहुँचाए  घर नंद।
पहुँचाए   घर  नंद, लिए  लौटे  वे  कन्या।
पहुँचे   कारागार, कंस  ने  छीनी   तनया।
कहे लाल  कविराय, नेह माता  का देकर।
यशुमति करे दुलार, नंद हँसते सुत लेकर।
.               ५ 
पालन  हरि का  कर रहे, नंद यशोदा  गर्व।
मनती है जन्माष्टमी, तब से  घर - घर  पर्व।
तब से घर-घर पर्व, खुशी गोकुल में मनती।
शिशु को लेने  गोद, होड़  नर नारी  ठनती।
कहे लाल कविराय, हुआ ब्रज सारा पावन।
जग का पालनहार, करे माँ यशुमति पालन।
.                 ६
कौरव पाण्डव युद्ध में, बने कृष्ण रथवान।
गीता  के   उपदेश  में,  देते  ज्ञान   महान।
देते  ज्ञान  महान , धर्म  हित  युद्ध  ठनाएँ।
बने कन्हैया कृष्ण, रूप जो विविध बनाएँ।
कहे लाल कविराय, सनातन कान्हा गौरव।
रखे  विदुर का मान, हराए  रण में  कौरव। 
.                ७ 
गाते गिरधर  लाल की, सभी निराली नीति।
गोधन ग्वाले गोपिका, ब्रजतरु उत्तम प्रीति।
ब्रजतरु उत्तम प्रीति, सखे जलजमुना सजते।
मिटे सकल जंजाल, कालिये फन  पर नचते।
कहे  लाल  कविराय, मिताई  प्रीत  निभाते।
कृष्ण कन्हैया  लाल, समर  में  गीता  गाते।
.                ८
भारी  वर्षा  इन्द्र  ने, कर दी  कोपि  घमंड।
सोच रहे ब्रजवासियों, लो अब भुगतो दंड।
लो अब भुगतो  दंड, नही करते तुम  पूजा।
आज  बचाए  कौन, धरा  पर   देखूँ  दूजा।
कहे लाल कविराय, बने कान्हा  गिरिधारी।
नख  पर गिरिवर धारि, छत्र गोवर्धन भारी।
.             ९ 
साड़ी  से  इक  चीर ले, बाँधी   कान्हा  हाथ।
द्रुपद सुता  के कर्ज को, याद  रखे  ब्रजनाथ।
याद  रखे  ब्रजनाथ, सखी बहिना सम  माने।
सदा  द्वारिका  धीश, धर्म का  पथ  पहचाने।
कहे लाल कविराय, दुशासन नियति बिगाड़ी।
 पांचाली  हित लाज, कृष्ण  विस्तारी साड़ी।
.                १०
मंदिर  गोकुल  द्वारिका, बने अनेको  धाम।
गोवर्धन  पथ  गूँजता, राधे   कृष्णा   नाम।
राधे  कृष्णा  नाम, रटे  जन  देश   विदेशी।
वृन्दावन  सुखधाम, नारि. मीरा  सम  वेषी।
कहे लाल कविराय, कन्हाई शोभित सुन्दर।
घर-घर पूजित कान्ह, प्रशंसित मथुरा मंदिर।
.           ११
राधे  बड़ भागी  हुई, यादें  पुष्प  सुवास।
सूर, देव, रसखान  जी, मीरा अरु  रैदास।
मीरा अरु  रैदास, समर्पित भक्ति  निभाई।
रचे बहुत से काव्य , गीत  दोहा कविताई।
शर्मा  बाबू  लाल, छंद  कुण्डलिया  साधे।
दौसा जिले निवास, लिखे जय कान्हा राधे।
.         
बाबू लाल शर्मा, बौहरा

कुण्डलिया छंद
.                  *शरद* 
.              *१* 
सर्दी  का  संकेत  हैं, शरद  पूर्णिमा  चंद्र।
कहें  विदाई मेह को, फिर आना  हे  इन्द्र।
फिर आना हे  इंद्र, रबी का मौसम आया।
बोएँ फसल किसान, खेत मानो हरषाया।
शर्मा  बाबू   लाल, देख   मौसम   बेदर्दी।
सहें ठंड की  मार, जरूरत  भी  है  सर्दी।
.              *२* 
मौसम सर्दी का हुआ, ठिठुरन  लागे पैर।
बूढ़े  और  गरीब  से, रखती   सर्दी  बैर।
रखती सर्दी  बैर, सभी  को खूब सताती।
जो होते कमजोर, उन्हे ये आँख दिखाती।
कहे  लाल कविराय, यही तो ऋतु बेदर्दी।
चाहे वृद्ध गरीब, आय  क्यों मौसम सर्दी।
.              *३* 
गजक पकौड़े रेवड़ी, मूँगफली अरु चाय।
ऊनी  कपड़े  पास हो, सर्दी मन को भाय।
सर्दी  मन  को  भाय, रजाई कम्बल  होवे।
ऐसी   बंद   मकान, लगा  के हीटर  सोवे।
कँपे  गरीबी  हाड़, लगे  यों  शीत  हथौड़े।
रोटी नहीं नसीब, कहाँ फिर गजक पकौड़े।
.              *४* 
ढोर  मवेशी  काँपते, कूकर बिल्ली मोर।
बेघर, बूढ़े  दीन  जन, घिरे  कोहरे  भोर।
घिरे  कोहरे  भोर, रेल बस टकरा जाती।
दिन में  रहे अँधेर, गरीबी तब  घबराती।
सभी जीव बेहाल, निर्दयी शरद कल़ेशी।
जिनके नहीं मकान, मरे जन ढोर मवेशी।
.              *५* 
युवा धनी की मौज है, क्या कर लेगा शीत।
मेवा  लड्डू  खाय  ले, मिले  रजाई  मीत।
मिले रजाई  मीत, गर्म कपड़े  सिल जाते।
मिले रोज पकवान , बदन को खूब पकाते।
कहे लाल कविराय, खाय गाजर का हलुवा।
शीत स्वयं कँप जाय ,मना लेते मौज युवा।
.               
बाबू लाल शर्मा "बौहरा"

कुण्डलिया
.            मतदान-अधिकार
.                 
भारत के  सँविधान में, दिए मूल अधिकार।
मानवता   हक  में  रहे, लोकतन्त्र सरकार।
लोकतंत्र  सरकार, लोक  से निर्मित  होती।
भूलो  मत  कर्तव्य, कर्म  ही   सच्चे  मोती।
कहे  लाल कविराय, अकर्मी  पाते   गारत।
मिला वोट अधिकार, बनाओ अपना भारत।
.                  👀
दाता ने  हमको  दिया, जीवन  का अधिकार।
जागरूक   मतदान   से,  लोकतंत्र   साकार।
लोकतंत्र साकार, समझ अब मत की कीमत।
सोच समझ मतदान दिखाओ अपनी हिम्मत।
कहे लाल कविराय, करे  सब  भला विधाता।
निभा सतत  कर्तव्य, होय  जागृत  मतदाता।
.                  
बाबू लाल शर्मा "बौहरा"

कुण्डलिया छंद
.           साधु
ऐसे सच्चे  साधु जन, जैसे सूप स्वभाव।
यह तो बीती  बात है, शेष बचा पहनाव।
शेष बचा पहनाव, तिलक छापे ही खाली।
जियें विलासी ठाठ, सुनें तो बात निराली।
कहे   लाल  कविराय, जुटाते  भारी पैसे। 
सुरा  सुन्दरी  शान, बने   स्वादू अब ऐसे।
.             👀
टोले  साधु  सनेह जन, चेले   चेली  संग।
कार गाड़ियाँ काफिला, सुरा सुन्दरी भंग।
सुरा  सुन्दरी  भंग, विलासी भाव अनोखे।
दौलत  के  हैं  दास, ज्ञान  ये  बाँटे  चोखे।
बुरे कर्म तन  लाल, धर्म धन के बम गोले।
नाम  कथा  सत्संग, माल ठगते  ये टोले।

बाबू लाल शर्मा, बौहरा

(कुण्डलिया छंद )
.                  सरदार पटेल
.                    1
वल्लभ  भाई  थे यहाँ, भारत के  सरदार।
एकीकरण स्वदेश कर, बना नई सरकार।
बना  नई   सरकार, हटा  देशी   रजवाड़े।
भारत  के  हर  क्षेत्र, तिरंगे   झण्डे  गाड़े।
कहे लाल  कविराय, देश  से प्रीत निभाई।
भारत माँ  का  पूत, सनेही  वल्लभ भाई।
.                      2
आजादी   के  दौर  में , नेता   हुए  हजार।
वल्लभ , नेहरु  जी   रहे, दोनो  दावे  दार।
दोनो  दावे  दार , देश  हित सहज गुमानी।
नेहरु  बने प्रधान , साथ वल्लभ  से ज्ञानी।
गृह  मंत्रालय देख, वतन की शान बढ़ा दी।
भारत किया अखण्ड, रखी सच्ची आजादी।
.                    3
देशी राजा विलय कर, बना दिया नव देश।
वल्लभ  बंधु   पटेल जी , ऐसे  थे  दर वेष।
ऐसे  थे  दरवेष, अखण्डित  भारत  कीना।
उनका  था  संकल्प, देश हित मरना जीना।
कहे लाल कविराय, करे  कब होड़ विदेशी।
मिला लिए निज देश, सभी वे  राजा देशी।

बाबू लाल शर्मा "बौहरा"

बाल कुण्डलिया
.                    १.खेल शिक्षा
आओ खेलें मिल सभी, सीखे बाकी जोड़।
जोड़ तोड़  कर दौड़ में, नहीं लगानी होड़।
नहीं  लगानी  होड़, कूद  लम्बी  या  ऊँची।
करना है अभ्यास, सफलता  मिले समूची।
गुणा भाग लें सीख, खेल में गिनती गाओ।
खेलें   बनें   शरीर, ज्ञान  भी  पाएँ  आओ।

.                 २.खेल शिक्षा
खेले बच्चे घूमकर, छुक छुक दौड़े रेल!
हाथी  घोड़ा  पालकी, खूब बढ़ाए मेल!
खूब  बढ़ाए  मेल, खेल  लें गुल्ली डंडा!
सतोलिया  के बाद, पिलावें  पानी ठंडा!
शर्मा  बाबू  लाल, चले  फिर  घूमें  मेले!
चकरी झूले झूल, कचौरी खा फिर खेले! 

बाबू लाल शर्मा,बौहरा

                  हिन्दी भाषा
.                 १
हिन्दी  हिन्दुस्तान  की, भाषा  मात  समान।
देवनागरी लिपि लिखें, सत साहित्य सुजान।
सत साहित्य सुजान, सभी की है अभिलाषा।
मातृभाष   सम्मान , हमारी  अपनी   भाषा।
सजे भाल पर   लाल, भारती  माँ  के बिन्दी।
भारत  देश  महान, बने   जनभाषा   हिन्दी।
.                २
भाषा संस्कृत  मात से, हिन्दी शब्द प्रकाश।
जन्म हस्तिनापुर हुआ, फैला  खूब प्रभास।
फैला  खूब   प्रभास,  उत्तरी   भारत   सारे।
तद्भव  तत्सम  शब्द, बने   नवशब्द  हमारे।
कहे लाल कविराय, तभी से जन अभिलाषा।
देवनागरी    मान,  बसे   मन  हिन्दी  भाषा। 
.                 ३
भाषा शब्दों का बना, बृहद  कोष  अनमोल।
छंद व्याकरण के बने, व्यापक नियम सतोल।
व्यापक नियम सतोल, सही उच्चारण मिलते।
लिखें पढ़ें अरु बोल, बने अक्षर ज्यों खिलते।
कहे  लाल  कविराय, मिलेगी सच  परिभाषा।
हर   भाषा   से   श्रेष्ठ, हमारी  हिन्दी  भाषा। 
.                 ४
भारत भू  भाषा भली, हिन्दी  हिंद हमेश।
सुंदर लिपि से सज रहे, गाँव नगर परिवेश।
गाँव नगर परिवेश, निजी हो या  सरकारी।
हिन्दी हित  हर कर्म, राग अपनी  दरबारी।
कहे  लाल   कविराय, विरोधी  होंगें गारत।
कर हिन्दी का मान, श्रेष्ठ तब होगा भारत।
.                 ६
 हिन्दी  सारे  देश  की,  एकीकृत  अरमान।
प्रादेशिक  भाषा  भले, प्रादेशिक  पहचान।
प्रादेशिक पहचान, सभ्यता संस्कृति वाहक।
उनका अपना मान, विवादी  बकते  नाहक।
शर्मा  बाबू    लाल , सजे  गहनों  पर बिन्दी।
प्रादेशिक  हर  भाष, देश की  भाषा हिन्दी।
.                 ७
वाणी देवोंं की कहें, संस्कृत संस्कृति शान।
तासु सुता हिन्दी अमित, भाषा हिंदुस्तान।
भाषा  हिंदुस्तान, वर्ण  स्वर  व्यंजन प्यारे।
छंद मात्रिका ज्ञान, राग रस लय भी न्यारे।
गयेे शरण में   लाल, मातु पद वीणा पाणी।
रचे अनेकों ग्रंथ, मुखर कवियों की वाणी।
.                 ८
दोहा   चौपाई    रचे,  छंद   सवैया    गीत।
सजल रुबाई भी हुए, अब हिन्दी मय मीत।
अब हिन्दी मय मीत, प्रवासी जन मन धारे।
कविताई  का  भाव, भरें  ये कवि जन सारे।
हो  जाता है  लाल,  तपे  जब  सोना  लोहा।
तुलसी रहिमन  शोध, बिहारी कबिरा दोहा।
.            
बाबू लाल शर्मा,"

कुण्डलिया
होली बाद - कान्हा - राधा
.                   १
राधा से कान्हा कहे, अब होली  के बाद।
अब भी अपने देश में, होली  है  आबाद।
होली  है आबाद, रिवाजें     बहके बदले।
प्रीत नेह व्यवहार,लगे मन मानस  गदले।
शर्मा  बाबू लाल, गऊ क्यों लगती बाधा।
तरु कदम्ब की छाँव,कहे मुस्काती राधा।
.                      *२* 
राधा मुस्काती कहे, सुन  लो गोपी नाथ।
कहाँ गई वे गोपियाँ,ग्वाल गाय का साथ।
गाय ग्वाल का साथ, रहे न मीत  मिताई।
जन मानवता भूल, हितैषी  प्रीत  जताई।
शर्मा बाबू लाल,मनुज मन ही बस बाधा।
होली रह गई याद,कहानी कान्हा - राधा।
.                      
*बाबू लाल शर्मा,"बौहरा"

 कुण्डलिया
.               करवा चौथ
.      १       
चौथ  व्रती  बन  पूजती, चंदा  चौथ  चकोर।
आज सुहागिन सब करें,यह उपवास कठोर।
यह   उपवास  कठोर , पूजती   चंदा  प्यारा।
पिया जिए सौ साल, अमर अहिवात हमारा।
कहे लाल कविराय, वारती  जती  सती बन।
अमर रहे  तू चाँद, पूजती   चौथ  व्रती  बन।
.          २  
नारि सुहागिन कर रही, पूजा जप तप ध्यान।
पति की लम्बी आयु हो, खूब बढ़े जग मान।
खूब  बढ़े  जग मान, करे  उपवास  तुम्हारा।
मात  चौथ  सुन  अर्ज , रहे  संजोग  हमारा।
कर सोलह सिंगार, निभाये प्रीत  यहाँ  दिन।
पति हित सारे काज, करे ये  नारि सुहागिन।
.          ३
चंदा  साक्षी  बन  रहो, पावन   प्रेम   प्रसंग।
मै पति की प्रणपालिनी, आजीवन प्रियसंग।
आजीवन  प्रिय संग, निभे  प्रण प्रेम हमारा।
जीवन  हो  आदर्श, करूँ व्रत  सदा तुम्हारा।
कहे लाल कविराय, भाव हो  कभी  न मंदा।
मात   पार्वती   पूज, पूजती   तुमको   चंदा। 
.४
गौरा शिव के साथ  है, गंग धार शिव केश।
चंद्र छटा  शिव शीश पर, हे  राकेश  महेश।
हे   राकेश   महेश, आपकी  प्रिया  मनाऊँ।
गौरी सम  अहिवात, कामना मन  में  पाऊँ।
कहे लाल कविराय, चौथ  व्रत करें निहौरा।
पूजन  करवा  चौथ, भावना   पूरित  गौरा।
.             ५
जामाता  गिरिराज  के, गंग  बहिन  भरतार।
विघ्न विनाशक के पिता, जनपालक करतार।
जन  पालक  करतार, सुहागी   गौरी  माता।
सत्य अमर अहिवात, मुझे भी मिले विधाता।
कहे  लाल कविराय, चौथ  करवा  व्रत दाता।
आज चंद्र की साक्ष्य, सुनों गिरि के जामाता

बाबू लाल शर्मा,बौहरा

कुण्डलिया
,                    बेटी
चली  अकेली  पंथ  मे, डरती   बेटी  आज।
कोई  पीछा  कर रहा, जैसे  खग  का  बाज़।
जैसे खग का बाज, दुष्ट जालिम व्यभिचारी।
सुता रहे भयभीत, समझ जन भाव विकारी।
शर्मा   बाबू   लाल,  करें   पीछा  नर   खेटी।
करती   पश्चाताप,  जन्म   क्यूँ   पाया  बेटी।
.        २           
कहते  सब  वरदान  प्रभु , बेटी  जन्मे  गेह।
पर लौकिक व्यवहार में, भार सुता की देह।
भार सुता  की  देह, गिद्ध  पग पग मँडराएँ।
देख  अकेली  देह,  फब्तियाँ  गीत  सुनाएँ।
शर्मा  बाबू  लाल,  ठौर  सब   कामी  रहते।
पीछा  करते  हाथ,  कहीं  पर  ताने  कहते।

बाबू लाल शर्मा बौहरा

कुण्डलिया छंद

शुक नीड़
.                      १
बुनता  नर  शुक नीड़ नव, संतति मोह अपार!
प्राकृत  ईश    प्रदत्त  गुण, करते   वंश  प्रसार!
करते  वंश  प्रसार,  शुकी  शुक भव  नर नारी!
करें   नीड़  निर्माण,  मोह  वश   वन्य  विहारी!
शर्मा   बाबू  लाल,   देख  प्राकृत  गुण  सुनता!
निभे सभी कर्तव्य, नीड़ निज शिशुहित बुनता!
.                     २
तोता  लटका  नीड़  से,  करता  नव   निर्माण।
सृष्टि नियम संतति चले, बचे अण्ड शिशु प्राण।
बचे  अण्ड  शिशु प्राण,  कीर  नर नीड़ बनाए।
मौसम   मार   प्रहार,   शत्रु   से  जान   बचाए।
शर्मा  बाबू  लाल,   मनुज  मन  भी यह  होता।
करे   मग्न   कर्तव्य,  नीड़   बुनता  यह  तोता।

बाबू लाल शर्मा बौहरा

कुण्डलिया

,                         मृग केलि
लाया अलि  ऋतुराज अब, पछुआ शुष्क समीर!
प्राकृत रीति  प्रतीत जग, चुभे  मदन  मन   तीर!
चुभे  मदन   मन   तीर,  लता  तरु  वन  बौराए!
चाहत   प्रीत  सजीव, मदन  तन  मन  दहकाए!
कहे "लाल" कविराय, विहग पशु जन भरमाया!
मृग आलिंगन  बद्ध, मिलन  ऋतु फागुन लाया!
.                   
बाबू लाल शर्मा,

कुण्डलिया
,                      बालिका श्रम
खोया बचपन खोजती,निभा रही निजकर्म।
लालटेन  से  बालिका,  राह   ढूँढ कर  मर्म।
राह  ढूँढ कर मर्म, मीत निज धर्म  निभाती।
विकट अँधेरी रात, यही  सत पंथ दिखाती।
शर्मा   बाबू   लाल, धान   खेतों  में   बोया।
रखवाली   में   रैन, चैन  बालापन   खोया।
.
बाबू लाल शर्मा बौहरा

 कुण्डलियाँ छंद

.          अर्णव कलश
स्थापन दिन शुभकामना, अर्णव कलश समूह!
बनी   छंद   शाला   सुगम,  सीखें  छंद  दुरूह!
सीखें   छंद  दुरूह,  सरल  सब  हो  कठिनाई!
अनिता जी  द्वय  साथ, जन्म के दिवस बधाई!
शर्मा    बाबू   लाल,  कर्म   पावन   अध्यापन!
अर्णव  अनिता दोउ, मान शुभ जीवन स्थापन!

बाबू लाल शर्मा,

कुण्डलियाँ  -         शिक्षा

शिक्षा  ऐसी  दीजिये, नैतिक   रहे  विचार!
आन मान  अरमान के, सीखें  सद आचार!
सीखें  सद आचार, भले  संस्कार  सिखावें!
मान  ज्ञान विज्ञान, देश की  शक्ति दिखावें!
शर्मा  बाबू  लाल, चाह  सदगुण की भिक्षा!
उत्तम बने स्वभाव, देश हित नैतिक शिक्षा!

बाबू लाल शर्मा,बौहरा

कुण्डलिया छंद
.             (विजयादशमी)
.              
विजया दशमी  पर्व   है, त्रेता  युग  से  रीत।
रावण   रूपी  गर्व  पर, हुई राम  की  जीत।
हुई  राम  की  जीत, सत्य  मर्याद   विजेता।
मिटे  बुराई    द्वेष, मानवी   संस्कृति   त्रेता।
कहे   लाल  कविराय,मान हर तनया लक्ष्मी।
सियाहरण परिणाम, जानिये विजयादशमी।

बाबू लाल शर्मा, बौहरा
[
कुण्डलिया

,                   सहज
चम्बल तट, कोटा  नगर, हाड़ौती  परिवेश।
शिक्षा  पाथर   काव्य  में,  जाने  पूरा  देश।
जाने   पूरा  देश,  सहज   कविताई  करते।
काव्य पटल हित साध,जोश ये नूतन भरते।
कहे लाल कविराय, सृजे नित दोहे अब्बल।
जनहित में  रघुनाथ, बहे  जैसे सरि चम्बल।
.

कुण्डलिया

 जन्मदिवस
              १
दादा  पोता  साथ  मे, खूब   निभाएँ  नेह।
नील कमल है खिल रहा, रमा ईश के गेह।
रमा ईश  के गेह, आज  खुशियाँ  सौगाते।
जन्मदिवस ये साथ, सभी के आज मनाते।
कहे  लाल कविराय, पौत्र से करके  वादा।
रहे मीत से साथ, हँसे  यों  कह  के  दादा।
.          २
आओ संगी मान ले, जन्मदिवस अरमान।
मैं तुमको  आशीष  दूँ, तुम  देना  सम्मान।
तुम  देना  सम्मान, बड़ो  को  तो  पाओगे।
अपने  पोते   साथ, यहीं  केक  सजाओगे।
कहे लाल कविराय, आज पकवान बनाओ।
साथ खेलते खेल, आज हम  दोनो आओ।

बाबू लाल शर्मा "बौहरा"

कुण्डलिया छंद
,                       मातृभाषा
हिन्दी के सम्मान हित, कार्य करे दिन रात।
मातृभाष, परिवार  है, साहित  को सौगात।
साहित को सौगात, सभी के सृजन  प्रकाशे।
नवसृजकों  हितमान, सभी की कलम विकासे।
कहे लाल कविराय , भाल  साहित्यिक  बिन्दी।
अर्पण धीर  महान, समर्पित  जीवन  हिन्दी।
.                     👀
करते सृजन प्रकाश ये, हिन्दी  अंतरजाल।
अर्पण जी छापे सभी, छंद गीत स्वर ताल।
छंद गीत स्वर ताल, विधाएँ सब हिन्दी की।
सीखो और सिखाय, मातृभाषा बिन्दी की।
शर्मा  बाबू लाल, हृदय  धर कविता  रचते।
अर्पण जी के संग, सृजन हिन्दी हित करते।
.                
बाबू लाल शर्मा "बौहरा

 कुण्डलिया छंद
.                वोट
.               *1* 
डाले फोटो,वीडियो , करें  चुनावी  बात।
सामाजिक उद्देश्य की, देते क्या सौगात।
देते  क्या सौगात, चुनावी  चौसर बिछते।
चार दिना की बात, फेर बस  नेता हँसते।
करे स्वयं उपकार, पेट खुद का वो पाले।
नहीं समाजी बात, वोट क्यों उनको डालें।
 .             *2* 
भाई  नागों  के  बनेे, साँपनाथ  श्रीमान।
सब दल दलदल हो गए, सर्प वंश हैरान।
सर्प वंश हैरान, साँप सब डर  कर भागे।
जाने कहाँ फरार, साँप बिल धरती त्यागे।
मणि धारी ये लोग ,करें बस खूब कमाई।
सोच समझ मतदान, करो सब प्यारे भाई।
.               *3* 
खर्चे  होते  हैं वहाँ, होते जहाँ  चुनाव।
वोट पड़े के बाद मे, कोई न पूछे भाव।
कोई न पूछे  भाव, नदारद  होंते  नेता।
रोते बाद  चुनाव, न कोई हमको  देता।
काम पड़े अनजान, फिरेंगे उड़ते पर्चे।
चार दिने व्यवहार, लगेंगे फिर तो खर्चे।
.              
बाबू लाल शर्मा

 कुण्डलिया छंद
.              आमंत्रण
  साथी चलना  हैं सभी, टोहाना  में  संग।
  नया  आसमाँ  में उड़े, नये  उड़ानी  रंग।
  नए उड़ानी  रंग, रचें  फिर  नई  कहानी।
  हरियाणी  हरियाल, लोग  दीखें  ईमानी।
  शर्मा,बाबू लाल, चले गुप्ता जी मिलना।
  मीनाक्षी जी साथ, सभी को साथी चलना।


ढूंढाड़ी भाषा :--
वतन पै शहीद हुया भाई री मूरत पर उणरी बहण राखी बांधण आवै जद रो
 दरस:-- कुण्डलिया-छंद

.            राखी बंधाई
.                   *1* 
फौजाँ मै भरती  हुयो, धरा पूत को पूत।
सीमा पै  रक्षा  करै, भारत   वीर  सपूत।
भारत वीर  सपूत ,बहन राखी  बुलवाई।
मै राखी घर आउँ,बहुत यादाँ अब आई।
कहे लाल कविराय, चाव होणी  जे होजा।
रीत  चलै टकराव ,लड़ै  सीमा पै फौजाँ।
.               *2* 
बीरो जी बुलाइ मनै, आज्यो बहन जरूर।
जान  गँवादी  बीर  जी , सहादती  दस्तूर।
सहादती  दस्तूर , लौटि घर  लिपट तिरंगै।
प्रतिमा लागी  चौक , हुये परिजान बिरंगै।
'लाल' पोमचो ओढ़ ल्याइ राखी जड़ हीरो।
हिवड़ो फाट्यो जाय, हुयो क्यूँ मूरत बीरो।
.                 *3* 
भाई  थारी  याद में , भूली  सब  सौगात।
राखी  बाँधण  चाव है ,बीराँ   थारै  हाथ।
बीरा  थारै   हाथ,  बाँधती   राखी म्हारी।
भारत माँ का पूत, गरब अब मूरत थारी।
भर मिल लेंऊँ  बाथ, बँधालै राखी ल्याई।
अगली राखी आउँ, देखबाँ  सूरत  भाई।
.                 *4* 
कुरबानी दे  देश  पै , रखै  तिरंगै   शान।
अपणो भी करतब बणै,रहै शहीदी मान।
रहै  शहीदी मान, व ई परिवार  सँभाला।
पूत गया परलोक, देश  री धरा रुखाला।
कहै लाल कविराय,शहीदी बात जुबानी।
राखो  उन रो मान, शीश जे दे कुरबानी।
.                   *5*
बीरा   री  मैं भैण हूँ, राखूँ  धीरज धार।
भाई  थारी याद  मैं ,राखी  बाँधू  च्यार।
राखी बांधू च्यार, देश हित मान बढाऊँ।
सेना,गंगा गाय , पेड़ हित नेह  लगाऊँ।
कहे लाल कविराय, राम सा भाई हीरा।
मौको आवै जाण, शहीदी पाऊँ बीरा।

बाबू लाल शर्मा "बौहरा"

             अटल
.                 *1* 
कहते मानू हार   क्यों,  नहि   ठानूंगा  रार।
ऐसी  कविता  देश  में, गाते   अटल  हमार।
गाते  अटल  हमार, हिन्द की हिन्दी  बोली।
कर्गिल करी कमाल, हिन्द की बोली गोली।
'लाल' चीन को देख, अटल जी थे  कब थमते।
अटल इरादे नेक ,हिन्द की जय जय कहते।
.                  *2* 
अटल धरा से उठ गये, खूब जिए सतकाम।
नाम गगन महि अटल है, भूले नहीं अवाम।
भूले  नहीं  अवाम, पितामह  धरा  प्रतिज्ञा।
राजनीति  में  देन, काव्य में  हिन्दी  प्रज्ञा।
कहे लाल कविराय, नाम वह आकाश पटल।
भारत भू  का पूत, नामवर हो  गए  अटल।
.            
बाबू लाल शर्मा "बौहरा"

कुण्डलिया 
 ,                रवि/सूरज
दर्शन रवि के हो रहे, प्रात काल चित चोर।
किरणें पेड़ो से छने, खगकुल कलरव भोर।
खगकुल कलरव भोर,धरा पर दृश्य निराले।
जीव जगे जड़ पेड़, खिले सब देख उजाले।
कहे लाल कविराय, मल्ल करते तन मर्दन।
करते उगते भानु, नमन ज्यों कृष्ण सु दर्शन।

२   ढूँढाड़ी-राजस्थानी

पूरब सूरजड़ो दिखै, ज्यूँ सोनै रो टूक।
पंछी,पथ पौधे जगै,तारक छिपै उलूक।
तारक छिपै उलूक, चोर  निसचर मन प्रानी।
करताँ रै शुभ काज, प्रात मै दानी मानी।
कहै लाल कविराय,धरा पै छटा अपूरब।
करै योग संजोग,ढोकताँ मिनखाँ पूरब।

बाबू लाल शर्मा "बोहरा"

ढूँढाड़ी- --कुण्डलिया छंद

.              जाड़ो
.             
जाड़ो पड़ गो जोर को, थर थर  काँपै गात।
पाल़ो पड़तो फसल पै, होय जियाँ हिमपात।
होय जियाँ हिमपात, ओस रात्यूँ  या टपकै।
म्हारै  मरुधर  माँय, गाय  सूनी   ही  भटकै।
गाड़ोलिया  लुहार, शरण उनकै बस  गाड़ो।
सहै,  घाम  बरसात, बिगाड़ै   काँई   जाड़ो।
.            👀
जाड़ा तू है खोड़लो, दुशमन गुरबत ढोर।
माकड़ कीट पखेरवाँ, विरहा  बूढ़ै  चोर।
बिरहा  बूढ़ै चोर, शीत मैं  थर थर काँपै।
होय साँस को रोग, जियाँ ये विरहा हाँपै।
खाँसू  ल्यावै  ढोर, रजाई  बकरी,,पाड़ा।
किय्याँ करै मजूँर, पड़ै जद जोराँ जाड़ा।
.             👀
पाणत फसलाँ मै करै,धरती पूत किसान।
रात रात  रुल़ता फिरै, वै  भी  छै  इंसान।
वै  भी  छै  इंसान, आज  गुरबत के मारै।
भूख  नंग  महादेव , भरै   वै  पेट  हमारै।
शर्मा बाबू लाल, देय अब कुण नै लानत।
मंत्री,नेता दोय, एक दिन करल्यो पाणत।
.             👀
चारो  पटको  माछल़ी, पंछी   चींटी  ढोर।
वस्त्र दान करताँ कहो, प्रात सबै शुभ भोर।
प्रात सबै शुभ भोर, लगै फिर जाड़ो थोड़ो।
गुड़ बाँटो अरु खाय, खींचड़ो  होवै घोड़ो।
सबल़ाँ ताप अलाव, डरो क्यूँ जाड़ै  यारो।
सबकी   करो  सहाय, बणैलो  भाई चारो।
.            
बाबू लाल शर्मा,"बौहरा"

      
ढूंढाड़ी--कुण्डलिया - छंद
,                  बेटी
.                *1*
बेटी जनमी  जिण घराँ, कुदरत रो वरदान।
पढ़ा लिखा अर् मान द्यो, पाछै  कन्यादान।
पाछै कन्या दान, करूं मै मन अभिनंदन।
ईश्वर रा  वरदान,जन्म री खुशियाँ चंदन।
कहे लाल कविराय,सुता सूँ मत कर हेठी।
दोनी कुल़ री  बात, आन  यह होती बेटी।
.            *2*
बेटी हो  बड़ भाग सूँ, समझै  धीर प्रमान।
अज्ञानी   समझै  नहीं , छाँव  रहै  अज्ञान।
छाँव   रहै  अज्ञान, पूत  कूँ  धरले   माथै।
अंत समय  पीछाण, रहैलो कुण रै  साथै।
कहे लाल कविराय, डरप मत खाली पेटी।
बेटी  नै सतकार ,गरब कर अपणी  बेटी।
बाबू लाल शर्मा "बौहरा

 *कुण्डलिनी छंद*

कुण्डलिनी छंद-विधान- एक दोहा और एक रोला मिलकर बनता है, दोहे का प्रथम शब्द छंद का अंतिम शब्द होना चाहिए। 
अर्थात कुण्डलिया छंद का प्रथम रोला छंद निकाल लिया जाए तो कुण्डलिनी छंद बन जाता है--बाबू लाल शर्मा, बौहरा, "विज्ञ'

.                      राजा
राजा   रजवाड़े   सभी , राजतंत्र  अंग्रेज!
शाह सल्तनत रानियाँ, हुए आज निस्तेज!
हुए आज निस्तेज, हटे था समय तकाजा!
जीवित सभी निशान, शान से रहते राजा!
,                       राजा
राजा  लड़ते  थे  सदा, रही  फूट   में  लूट!
लाभ  उठाते   गैर  थे, नीति  विदेशी  कूट!
नीति  विदेशी   कूट, बजाते  अपना बाजा!
 टला नहीं दुर्भाग्य, लड़े अब भी नव राजा!

,                        भँवरे
भँवरे  भामा  भामिनी, भंग भजन  भगवान!
भाव  भलाई  भावना, भावुक  भले  भवान!
भावुक भले भवान, यथा मति जीवन सँवरे!
भाग्य  भरोसे  भास, भ्रमें  मत मानस भँवरे!
.                   
बाबू लाल शर्मा



 *रोला छंद विधान*--बाबू लाल शर्मा, बौहरा, "विज्ञ"
रोला छंद २४ मात्रिक छंद होता है। विषम चरणों में ११ मात्रा और चरणांत २१ से होता है।
सम चरणों में १३ मात्रा और चरणांत २२ से होता है। समचरणांत में २२ का विकल्प:-११२,२११,११११भी मान्य है। दो,दो सम चरणों में समतुकांत हो।
*उदाहरण*....          
.              🇮🇳 *तिरंगा* 🇮🇳
मातृ भूमि का ताज, आज कश्मीर हमारा।
२१   २१   २   २१,   २१    २२१   १२२
स्वागत  को  तैयार, तिरंगा  फहरे  प्यारा।
२११      २    २२१,   १२२  ११२   २२
केशर घाटी फूल, झील अरु कूल किनारा।
२११  २२   २१,    २१  ११    २१   १२२
जन गन मंगल  गान, करेगा  भारत सारा।
११   ११  २११  २१,   १२२    २११   २२
.                   👀👀👀
देता  यह  पैगाम , तिरंगा  आज  वतन  का।
२२    ११   २२१,  १२२   २१      १११  २
रहना सब मिल साथ, भरोसा रखें चमन का।
११२  ११   ११   २१   १२२   १२  १११  २
उपवन का हर फूल,कली हर जन अपना हो।
११११ २   ११  २१, १२  ११  ११  ११२  २
भारत रहे अखण्ड, सत्य शिव यह सपना हो।
२११  १२   १२१  , २१    ११   ११  ११२  २
.                   👀👀👀
इस प्रकार अभ्यास कीजिए। लय बाधा न रहे,इसलिए गाइए, गुनगुनाइये। लय बाधा मिटाइए छंद सही बनेगा। शुभकामनाएँ
✍©
बाबू लाल शर्मा, बौहरा,विज्ञ',  सिकंदरा, दौसा, राजस्थान
.                     
.           
.रोला छंद        🇮🇳 *तिरंगा* 🇮🇳

मातृभूमि का ताज, आज कश्मीर हमारा।
स्वागत  को  तैयार, तिरंगा  फहरे  प्यारा।
केशर घाटी फूल, झील अरु कूल किनारा।
जन गन मंगल  गान, करेगा  भारत सारा।

.                   👀👀👀

देता  यह  पैगाम , तिरंगा  आज  वतन  का।
रहना सब मिल साथ, भरोसा रखें चमन का।
उपवन का हर फूल,कली हर जन अपना हो।
भारत रहे अखण्ड, सत्य शिव यह सपना हो।

.              
.                    (रोला छंद)
.         🦅  *चंद्र,  इन्द्र ....हम*  🦅
.                 🌕...🤴....🌍 
.                   ✨✨✨
चंद्र  इंद्र  नभ  देव, सदा शुभ  पूज्य  हमारे।
हम  पर  रहो प्रसन्न, रखो आशीष  तुम्हारे।
लेकिन मन के भाव, लेखनी सच्चे लिखती।
देव दनुज नर सत्य, कमी बेशी जो दिखती।
.                   ✨✨✨
क्षमा सहित  द्वय देव, पुरानी  बात  सुनाऊँ।
लिखता  रोला  छंद, भाव कुछ  नये बताऊँ।
शर्मा  बाबू  लाल, सुनी  वह   तुम्हे  सुनाता।
बीत गया युग काल, याद फिर से आजाता।
.                   ✨✨✨
ऋषि गौतम की पत्नि, अहल्या सुन्दर नारी।
मोहित होकर इन्द्र, स्वयं की नियति बिगारी।
आये   गौतम  वास, चन्द्र  को   संगी  लेकर।
हुए  कलंकित  दोउ, सती  को  धोखा देकर।
.                   ✨✨✨
भोले  मातुल  चंद्र, इन्द्र के वश  में  आकर।
मुर्गा बन  दी बाँग, प्रभाती, आश्रम जाकर।
अपराधी  थे  इन्द्र, चंद्र  तुम बने  सहायक।  
ढोते  भार  कलंक, मीत जब हो नालायक।
.                   ✨✨✨
ऋषि गौतम  दे  शाप, संत  थे  वे  तपकारी।
बने  कलंकित  चन्द्र,  इंद्र  सहस्त्र  भगधारी।
पाहन हो अभिशप्त,अहल्या विधि स्वीकारी।
त्रेता  युग जब  राम, करेंगे   भव  अविकारी।
.                   ✨✨✨
हुये चंद्र  बदनाम, जगत तुम नारि विरोधी।
तब भी भारत भूमि, हमारी  हुई  न क्रोधी।
धरा  भारती  धीर, तुम्हे  भाई  सम  माना।
मातुल  कहते लोग, भारती  रिश्ता  जाना।
.                   ✨✨✨
कैलाशी  परमेश, शीश  पर  तुमको  धारे।
कृष्ण चंद्र  भगवान, जन्म ले  वंश तुम्हारे।
इतना  दें  सम्मान, तुम्हे  हम भारत वासी।
क्षमा किये अपराध, तुम्हारे चंद्र  सियासी।
.                   ✨✨✨
चंद्र  तुम्हारा  मित्र, इंद्र  जब भी भरमाया।
नल राजा अरु कृष्ण, सभी से था शर्माया।
हम  भारत के  पूत, धरा मरु में  रह  लेते।
सुनें इंद्र अरु चंद्र, कष्ट सुख सम सह लेते। 
.                   ✨✨✨
होगी अब भी याद, तुम्हे जयंत की घटना।
सींक बाण की मार, भटकता चाहा बचना।
मिला नहीं वह देव, कहे  शचि पुत्र बचालूँ।
शरण गये सिय राम, तभी दी क्षमा कृपालू।
.                   ✨✨✨
रहे इन्द्र को  याद, पार्थ के  गुण उपकारी।
तजी  अपसरा  स्वर्ग, देख  ऐसे  व्रतधारी।
कैसे भी हो  स्वर्ग, नहुष  ने राज  चलाया।
दैव शाप सम्मान्य,देख शचि धर्म निभाया।
.                   ✨✨✨
वरना हम तो सिंह, नहुष के देश निवासी।
करें  स्वर्ग  प्रस्थान, शीघ्र बन चंदा  वासी।
दसरथ अरु मुचुकंद, बने  देवों के  रक्षक।
लाते तुम्हे उतार, अहल्या के सत भक्षक।
.                   ✨✨✨
डाल  इन्द्र को कैद, सजा देते, तब भारी।
बच्चा बच्चा आज, सुनाता, तुमको गारी।
पर मर्यादित  राम, अहल्या जन  उद्धारी।
इन्द्र  चंद्र  अपराध, क्षमा दे दी शुभकारी।
.                   ✨✨✨
सृष्टि संचलन हेतु,बचा अस्तित्व तुम्हारा।
मान धरा ने  भ्रात, तुम्हारा  मान  सँवारा।
इसीलिए  सम्मान, करें हम मातुल कहते।
धरामात परिवृत्त,भ्रमणरत जो तुम रहते।
.                   ✨✨✨
सृष्टि संतुलन हेतु, जरूरत जान तुम्हारी।
देते  तुमको मान, शंभू अरु कृष्ण मुरारी।
पावन  प्रेम प्रकाश, धरा को तुम जो देते।
उसे  चंद्रिका  मान, सदा अमृत सम लेते।
.                   ✨✨✨
चाल तुम्हारी  देख, यहाँ त्यौहार मनाते।
करते  व्रत  उपवास, नये पंचांग  बनाते।
धन्य भारती  नारि, तुम्हे ईश्वर सम माने।
करती पूजन दर्श, सदा सौभाग्य सजाने।
.                   ✨✨✨
पूनम  बारह चौथ, यहाँ नारी, व्रत धरती।
भोजन  से  जो पूर्व, दर्श चंदा का करती।
तुम्हे कलंकी मान, चौथ भादों नर तजते।
शेष दिनों में  चंद्र, तुम्हें  ईश्वर सा भजते।
.                   ✨✨✨
पर मत भूलो हे चंद्र, दिया सम्मान हमारा।
हमें  ज्ञात कर्तव्य, तुम्हे  दायित्व  तुम्हारा।
जन्म  नहुष  के देश, स्वर्ग में तो है आना।
सतत चंद्र अभियान,नये हैं स्वप्न सजाना। 
.                   ✨✨✨
मिल कर होगी बात, इंद्र से, मातुल  तुमसे।
होगा, गर्व गुमान, आपको  मिल के हमसे।
पिछले  भातइ,  दंड, चुके मामा, से  सारा।
स्वर्ग लोक मय चंद्र, प्रथम हो राज हमारा।
.                   ✨✨✨
आप निभाओ नेह, निभाएँ हम भी नाता।
कभी दिखाओ आँख,हमें टकराना आता।
भूल गये क्या  चंद्र, दक्ष का शाप  सहारा।
रवि को ले मुख दाब,बली हनुमान हमारा।
.                   ✨✨✨
हम  भारत  के लोग,  निभावें  नाते  वादे।
रखते स्वअभिमान, नेक अरु अटल इरादे।
चंद्र  इंद्र  का मान, रखें हम भी मनभावन।
नेह  मेह की प्रीत, आप भी रखना पावन।
.                   ✨✨✨

.        🌹   *रोल़ा-छंद*  🌹

.            1.🌼 *सावन*🌼
तन मन रहे कलेश, रात दिन नींद न आवे।
लग जाए कहिँ  नैन , रैन  में सपन सतावे।
"लाल" पपीहा मोर,शब्द दादुर मन भावन।
प्यासी चातक देख, निहारूँ आवन सावन।

.        2. 🌾 *पावस*🌳
 साजन नित उपहास, पिया परदेश बसत हैं।
नई  नई  नित नार , राह  भर  तंज कसत  है।
कहे लाल कविराय,बिजुरिया तन सुलगावन।
नित बरसे ये नयन ,झड़ी ज्यों पावस सावन।
 
.          3. 🌴 *बिरखा*🌳
खोजे  अपने  मीत, नचत गावत वन डोले।
शिव पूजा नर नार , हरे  हर बम बम बोले।
कहे लाल कविराय,चुनर धानी  जो  सरसे।
शिव से है अरदास ,नित्य ही बिरखा बरसे।

.       4.  🌼 *सावन वर्षा*🌼

नदियां  चलती  नाव , राग मल्हारें  गावत।
कागज की  है नाव, बालपन नीर बहावत।
कहे लाल सुन बाल,खेलकर के मन हरषा।
नेह स्नेह व दुलार , प्रीत कर सावन बरसा।

.        5. 🌵 *विरह बधूटी*🌵

टूट  जाय  घर  बार , कई  ईमान  हारते।
शेष  महेश  सुरेश, नहीं  विश्वास  धारते।
कहे'लाल'कविराय,आस खुशहाली टूटी।
बचा रहे निज मान ,पावनी विरह बधूटी।
.                      *हिन्दी भाषा*
.                        (रोला छंद)
.            ✨✨✨✨
सत साहित्य सुजान,सभी की है अभिलाषा।
मातृभाष   सम्मान , हमारी  अपनी   भाषा।
सजे भाल पर *लाल*, भारती  माँ  के बिन्दी।
भारत  देश  महान, बने   जनभाषा   हिन्दी।
.               ✨✨✨✨
फैला  खूब   प्रभास,  उत्तरी   भारत   सारे।
तद्भव  तत्सम  शब्द, बने   नवशब्द  हमारे।
कहे लाल कविराय,तभी से जन अभिलाषा।
देवनागरी    मान,  बसे   मन  हिन्दी  भाषा। 
.                ✨✨✨✨
व्यापक नियम सतोल,सही उच्चारण मिलते।
लिखें पढ़ें अरु बोल, बने अक्षर ज्यों खिलते।
कहे *लाल* कविराय, मिलेगी सच  परिभाषा।
हर   भाषा   से   श्रेष्ठ, हमारी  हिन्दी  भाषा। 
.              ✨✨✨✨
गाँव नगर परिवेश, निजी हो या  सरकारी।
हिन्दी हित  हर कर्म, राग अपनी  दरबारी।
कहे *लाल*  कविराय, विरोधी  होंगें गारत।
कर हिन्दी का मान, श्रेष्ठ तब होगा भारत।
.                ✨✨✨✨
प्रादेशिक पहचान,सभ्यता संस्कृति वाहक।
उनका अपना मान, विवादी  बकते  नाहक।
शर्मा  बाबू  *लाल* , सजे  गहनों  पर बिन्दी।
प्रादेशिक  हर  भाष, देश की  भाषा हिन्दी।
.                 ✨✨🌞✨✨

.              *रोला छंद*
.           *गीता के उपदेश*
.                    👀👀
गीता के उपदेश, पार्थ को कृष्ण सुनाते।
अर्जुन त्यागो मोह, सभी तो आते जाते।
रिश्ते  नाते  नेह, सभी जीवित  के  नाते।
मृत्यु सत्य सम्बंध, साथ नही  कोई पाते।
.                  👀👀
क्या लाए थे साथ, नहीं  लेकर  कुछ  जाना।
अमर आत्म पहचान, लगे बस जाना आना।
सभी ईश मुख जाय, निकलते सभी वहाँ से।
करते  रहो  सुकर्म, ईश  दें सुफल  यहाँ  से।
.                     👀👀
लगे  धर्म  को हानि, अवतरे ईश धरा पर।
संतो  हित  सौगात, मरे सब दुष्ट सरासर।
उठो पार्थ तत्काल, धर्म हित करो  लड़ाई।
करो  पूर्ण  कर्तव्य, भावि  में  मिले बड़ाई।
.               👀👀
धरा   मिटे   संताप,  अधर्मी  पापी  मारो।
सत्य  धर्म हित  मान, कौरवी  दल संहारो।
समझो सब को मर्त्य,मिले अमरत्व मनुजता।
सृष्टि चक्र सु विचार,मिटे बल सोच दनुजता।
.                 👀👀
.          🇮🇳 *संविधान* 🇮🇳
.               (रोला छंद)

भारत  भू   स्वाधीन,  हुई  कुर्बानी  देकर।
वतन  बाँट दो भाग, घाव गहरा  ये लेकर।
पहले  फूँके   स्वप्न, पूत    हमने  न्यौछारे।
संविधान  अरमान, मिले अधिकार  हमारे।
 
आजादी   पर  हर्ष, मनाए  हमने  भारी।
बँटवारे  के  साथ, स्वदेशी   सत्ता   धारी।
संविधान   निर्माण ,मान गणतंत्र   दुलारे।
संविधान अरमान, मिले अधिकार हमारे।

लोकतंत्र  मजबूत, रहे जनता के  हित में।
मात भारती शान, बसे सब ही के चित में।
सब मिल करें प्रयास,वतन तकदीर सँवारे।
संविधान  अरमान, मिले अधिकार  हमारे।

झगड़ें  धर्म  न  पंथ, सभी  निरपेक्ष  रहेंगे।
विकसित हो यह देश,देश हित कष्ट सहेंगे।
सैनिक और  किसान, देश की दशा सुधारें।
संविधान अरमान, मिले  अधिकार  हमारे।

संविधान का मान,अमर हो विजय तिरंगा।
जब तक सूरज चाँद,हिमालय,पावन गंगा।
लाल  किले  प्राचीर, कभी न हिम्मत  हारे।
संविधान अरमान, मिले  अधिकार  हमारे।

चुने राष्ट्रपति योग्य,नमन अरमान तिरंगा।
इन्द्र धनुष सम्मान, वतन हो यह सतरंगा।
मात भारती शान, सिंधु भी चरण पखारे।
संविधान अरमान, मिले अधिकार  हमारे।

भारत माँ के पूत,नमन हम करते तुमको।
देके अपनी जान,किये आजाद वतन को।
देखें  हम  आकाश, चमकते  दूर  सितारे।
संविधान अरमान, मिले अधिकार  हमारे।

बना देश गणतंत्र, रखें हम इसे  सुरक्षित।  
मिले हमें अधिकार,रहें कर्तव्य सुनिश्चित।
मातृशक्ति सम्मान, बढ़े नित यही विचारें।
संविधान अरमान,मिले अधिकार  हमारे।

हो  विज्ञान  विकास, धरा सोना  उपजाए।
विश्व गुरू सम्मान,देश विकसित कहलाए।
जय जवान बलवान, देश के  अरि  संहारे।
संविधान अरमान, मिले  अधिकार  हमारे।

कर शहीद का मान, मातु बलिवेदी प्यारे।
देश  हेतु  बलिदान, बने है जो  ध्रुव  तारे।
शर्मा  बाबू  लाल,  विधानी   गीत  उचारे।
संविधान अरमान, मिले अधिकार  हमारे।

करे  सुजन  अरदास, देश  में  भाई चारा।
सुजस फैल संसार,वतन हो अपना प्यारा।
करे प्रगति समुदाय,अभी जो दीन बिचारे।
संविधान अरमान, मिले अधिकार  हमारे।

निकट पड़ोसी देश,चीन व पाक सदा से।
करे  हमे  हैरान, आपकी  छुद्र  अदा  से।
बड़ बोले हैं  शंख, शेखियाँ नित्य  बघारे।
संविधान अरमान, मिले अधिकार हमारे।

शिक्षा  हो वरदान, यही अरदास  हमारी।
लेखक, रचनाकार, लगा दे ताकत सारी।
मात भारती  गीत, आरती  नित्य  उतारे।
संविधान अरमान, मिले अधिकार हमारे।

आतंकी  शैतान, नहीं जो सगे किसी के।
गोली या गलफाँस, बने वे योग्य इसी के।
करते रक्तिम बात, टाँग कर चाँद सितारे।
संविधान अरमान, मिले अधिकार हमारे।

सजग निभा कर्तव्य,बनाएँ अपना भारत।
द्वेष दम्भ पाखंड, करें हम इनको  गारत।
उन्हे  दिलाएँ  याद, जिन्हें कर्तव्य बिसारे।
संविधान  अरमान, मिले अधिकार हमारे।

.              *रोला छंद*
.          ...सजग प्रहरी..
.                *शहीद*
.                  ------
प्रहरी सजग सुजान,सदा सीमा पर रहते।
शीत घाम बरसात,सभी हिम्मत से सहते।
सोय  चैन से  देश, जगे  रखवाली  करते।
प्रीत शहादत  रीत, वही बलिदानी  रचते।

देश धरा का मान, रखे  जो जीवन देकर।
कहते उन्हे शहीद,गये जो यश को लेकर।
करता  वतन सलाम, सपूती भारत माता।
मरे राष्ट्र के हेतु, कभी यह अवसर आता।

हमे बहुत है  गर्व, वतन भारत  है अपना।
मेरा  देश  महान , हमारा  जागृत  सपना।
सैनिक के अरमान,तिरंगा कफन सदा से।
लड़े शहीदी शान, सजग प्रहरी विपदा से।

देकर निज बलिदान,नई जागृति वो लाते।
रखे  देश  ईमान, शहादत जो  सिखलाते।
बलिदानी  संगीत, बना जाते  स्वर लहरी।
देकर अपनी  जान, अमर रहते  ये प्रहरी।
.           
.              🇮🇳 *तिरंगा* 🇮🇳

मातृभूमि का ताज, आज कश्मीर हमारा।
स्वागत  को  तैयार, तिरंगा  फहरे  प्यारा।
केशर घाटी फूल, झील अरु कूल किनारा।
जन गन मंगल  गान, करेगा  भारत सारा।

देता  यह  पैगाम , तिरंगा  आज  वतन  का।
रहना सब मिल साथ, भरोसा रखें चमन का।
उपवन का हर फूल,कली हर जन अपना हो।
भारत रहे अखण्ड, सत्य शिव यह सपना हो।

.       
.                🤱  *रोला छंद* 🤱
.                    🦅  *चंद्र*  
ऋषि गौतम की पत्नि, अहल्या सुन्दर नारी।
मोहित होकर इन्द्र, स्वयं की नियति बिगारी।
आये   गौतम  वास, चन्द्र  को   संगी  लेकर।
हुए  कलंकित  दोउ, नारि  को  धोखा देकर।
.                   
भोले  मातुल  चंद्र, इन्द्र के वश  में  आकर।
मुर्गा बन दी बाँग, निशा आश्रम पर जाकर।
अपराधी  थे  इन्द्र, चंद्र  बस बने  सहायक।  
ढोते  भार  कलंक, मीत  संगति नालायक।
.                   
.                      *हिन्दी भाषा*
.                        (रोला छंद)
.           
सत साहित्य सुजान,सभी की है अभिलाषा।
मातृभाष   सम्मान , हमारी  अपनी   भाषा।
सजे भाल पर *लाल*, भारती  माँ  के बिन्दी।
भारत  देश  महान, बने   जनभाषा   हिन्दी।
.             
फैला  खूब   प्रभास,  उत्तरी   भारत   सारे।
तद्भव  तत्सम  शब्द, बने   नवशब्द  हमारे।
कहे लाल कविराय,तभी से जन अभिलाषा।
देवनागरी    मान,  बसे   मन  हिन्दी  भाषा। 
.               
व्यापक नियम सतोल,सही उच्चारण मिलते।
लिखें पढ़ें अरु बोल, बने अक्षर ज्यों खिलते।
कहे *लाल* कविराय, मिलेगी सच  परिभाषा।
हर   भाषा   से   श्रेष्ठ, हमारी  हिन्दी  भाषा। 
.             
गाँव नगर परिवेश, निजी हो या  सरकारी।
हिन्दी हित  हर कर्म, राग अपनी  दरबारी।
कहे *लाल*  कविराय, विरोधी  होंगें गारत।
कर हिन्दी का मान, श्रेष्ठ तब होगा भारत।
.                
प्रादेशिक पहचान,सभ्यता संस्कृति वाहक।
उनका अपना मान, विवादी  बकते  नाहक।
शर्मा  बाबू  *लाल* , सजे  गहनों  पर बिन्दी।
प्रादेशिक  हर  भाष, देश की  भाषा हिन्दी।
.                
.            🤷‍♀ *रोला छंद* 🤷‍♀
.                    नवरात्रि
.                ✨✨✨✨
आदि  भवानी  मात, वही  दुर्गे  नव  रूपा।
भजते जो मन भाव,भिखारी जन या भूपा।
नौ दिन के  नौ रूप, धरे सुन्दर  जग माता।
महा  पर्व   नवरात्रि, दशहरे  पहले  आता।
.                ✨✨✨✨
श्राद्धपक्ष के बाद,दिवस जो पहला आता।
सब के मन  सद्भाव, मातृ पूजा को भाता।
बेटी बहिनें  मात, पराई  सब  की  अपनी।
श्रेष्ठ एक संदेश, मात  सम इन्हे  समझनी।
.      
कन्या  पूजन  पर्व, अंत नवरात्रि  मनाते।
लाते घर घर  ढूँढ, दक्षिणा  देय  जिमाते।
बिटिया का सम्मान, सदा ही करलें भैया।
नारी  दुर्गा  रूप, बहिन  बेटी  सब  मैया।
.              
✍©
बाबू लाल शर्मा, बौहरा
सिकंदरा,दौसा,राजस्थान
👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀

Comments

Popular posts from this blog

दोहा छंद विधान

गगनांगना छंद विधान

सुख,सुखी सवैया