जल संरक्षण
. *जल संरक्षण हितार्थ जन चेतना*
. *के उद्देश्य से सृजित २५ छंद*
. ~©~ बाबू लाल शर्मा बौहरा विज्ञ
१. पदपादाकुलक छंद
विधान-- १६ मात्रा प्रति चरण
आदि में द्विकल अनिवार्य है
चार चरण, दो-दो समतुकांत
__पाँचों पूज्या पावन माई__
प्रात: नमन मात को करना।
धरती गौ माँ सम आचरना।
माँ धरती सम धरती माँ सम।
मन से वन्दन करना हर दम।
गौ माता भी मात सरीखी।
बचपन से ही हमने सीखी।
माँ गंगा है पतिता पावन।
यमुना सबको हृदयाभावन।
शारद माता विद्या देती।
तम अज्ञान सभी हर लेती।
पाँचो पूज्या पावन माई।
शर्मा 'विज्ञ' छंद मय गाई।
. ------+-------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
२. जयकरी / चौपई छंद
विधान:-- १५ मात्रा प्रति चरण
चरणांत में गुरु लघु २१ हो
चार चरण दो-दो समतुकांत हो
. __मनभावन प्रीत__
. .....
सावन मास पुन्य मनमीत।
मोर पपीहा दादुर गीत।
नभ में छाएँ बादल श्याम।
रिमझिम वर्षा प्रात: शाम।
पूजे कनक चढ़ा जल आक।
मूर्ति शिंभु सेवक नित ताक।
झूलन चाह कुमारी पींग।
याद रहे नट कान्हा धींग।
हर्षित कृषक बावरे खेत।
भरते गमले पौधे रेत।
सर सरिता वन बाग तलाव।
नीर भार खुशहाली बाव।
प्रियतम से मिलने की होड़।
जड़ चेतन तट बंधन तोड़।
सावन पावन वर सुख रीत।
भक्ति शक्ति मनभावन प्रीत।
. ------+-----
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
३ . प्रतिभा छंद
विधान:-- १४ वर्ण प्रति चरण
८, १४ वें वर्ण पर यति
चार चरण दो-दो समतुकांत
सगण भगण तगण नगण गुरु गुरु
११२ २११ २२१ १११ २ २
. __जल वरदानी__
जल है ईश्वर की देन सहज पाए।
करते दोहन नादान समझ जाएँ।
रखलो जीवन वे भावि प्रकृति सारी।
कल को काल धुनेगा मति जन मारी।
बरसे मानव वर्षा घट भर पानी।
रखले मानस रोकें जल वरदानी।
सब कुंडे भर वर्षा जल हरषाओ।
चल खेतों पर पानी नर रुकवाओ।
रहना ईश्वर दाता भगवन साथी।
रखना अंकुश साधे नर तन हाथी।
अपना जीवन चाहूँ गिरधर राधे।
वसुधा सावन पानी मलयज साधे।
. ------+-----
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
४. पंडव छंद
विधान:- १० वर्ण प्रति चरण
५, १० वें वर्ण पर यति
चार चरण, दो-दो समतुकांत
मगण नगण यगण गुरु
२२२ १११ १२२ २
. __घर घर टाँके हों__
हारा मानव कर नादानी।
वर्षा सावन भर लो पानी।
धारो मानस अब मुंडो में।
रोको जीवन जलकुंडों में।
बाँधो में सरवर में पानी।
मानें मानव जल है दानी।
खेतों में जल भर के रोको।
बापी कूप सरित को ढोको।
आकाशी पर वश खेती है।
आशा भीग धरण देती है।
चेतो तो घर घर टाँके हो।
भूलो वे पल जब ताके हों।
. ------+-----
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
५ . चंचल छंद
विधान:-
चार चरण क्रमश:१६,१५,१५,१४
मात्रा के हों
दो-दो चरण समतुकांत हो।
चरण के आदि अंत में त्रिकल हो
तृतीय के अलावा तीनो चरणों में
चरणांत त्रिकल (वाचिक भार १२)
की पुनरावृत्ति हो।
. __भज वरुण वरुण__
नीर बिना तरसे नगर नगर,
प्यास भर ताके नजर नजर।
भूमि रज तपती कठिन मगर,
कुंड वारि भर डगर.....डगर।
खेत रहे जल से मचल मचल,
मदन मद दादुर उछल उछल।
सावन सरोवर खिले कमल,
स्वेद मेघ जल पिघल..पिघल।
नीर बिना है नर मरण मरण,
मीत मानव भज वरुण वरुण।
कुंड जल भरिए विमल धरण,
'विज्ञ' मेघ घट शरण...शरण।
. --------+-------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
६ . पावन छंद
विधान:-- १५ वर्ण प्रति चरण
८, १५ वें वर्ण पर यति
चार चरण दो-दो समतुकांत
भगण नगण जगण जगण सगण
२११ १११ १२,१ १२१ ११२
. __अंबुज विमल बचे__
पावन सलिल बहे,भर कुंड घट लें।
सावन सरस रहे, जल गीत रट लें।
मानस समझ बने, भवमान भरना।
जीवन सहज चले, अरदास करना।
नीरज जलज रहे,जल स्रोत बचने।
प्राकृत वनज खगे, नर नीर रचने।
अंबुज विमल बचे, तब पीर घटनी।
सागर सरवर भी, नद कूप तटनी।
कुंड घर घर बने, जल मेह रखिए।
कूप हर पथ भरे, हर खेत भरिए।
जीवन जगत रहे, जल नेह बचते।
'विज्ञ'जन सब सुने, हम छंद रचते।
. ------+-----
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
७ . बृहत्य छंद
विधान:-- ९ वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत हो।
यगण यगण यगण
१२२ १२२ १२२
__बिना नीर कैसे बचोगे__
सभी की रही चाह पानी।
सुनोगे कभी पानी कहानी।
मिलेगा कहाँ से नीर मानी।
बहे ..नीर.....वर्षा रुहानी।
बिना नीर कैसे बचोगे।
सखा पीर पानी रचोगे।
हँसेगी मशाने तभी तो।
बहाते रहे नीर ही तो।
सखे नीर वर्षा बचाओ।
मिटा पीर लीला रचाओ।
लिखूँ छंद 'बाबू' पढ़ो तो।
बचे नीर आगे बढ़ो तो।
. ------+------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
८. 🌼 *रास छंद* 🌼
( शिल्प:- ८+८+६=२२ चरणांत--१ १ २ )
. 🌳 *सलिला सरित बहे* 🌳
. 🌾🌾
पेड़ लगाले, नीर बचाले , धीर पथी,
धरती अंबर, शुद्ध रहेगा, रश्मि रथी।
सागर-नदियाँ,ताल-तलैया,उज्ज्वल हो,
मानुष प्राणी, प्राकृत वायू, निर्मल हो।।
. 🌾🌾
स्वच्छ हवा हो,पावन जल हो,विमल सभी,
पेड़ लगायें, तरु रखवारे, सँभल अभी।
धरा सुरक्षा, जल की रक्षा , मदद करो,
पर्यावरणन, हो संरक्षण, सनद करो।।
. 🌾🌾
ओजोन परत,विकिरण नाशी,कवच बड़ा,
उत्तर प्रहरी, हिमगिरि,ऊँचा, अटल खड़ा।
गंगा , यमुना , नर्मद सलिला, सरित बहे,
हो संरक्षण, वचन विनय के, सहित कहे।।
. 🌾🌾
अपनी धरती, सागर अंबर, तरु नदियाँ,
अपनी खेती, फसलें होंगी, शत सदियाँ।
सब का तन मन ,हो संजीवन, रोग हरें,
धरा, वायु जल, नहीं प्रदूषण, लोग करें।।
. 🌴🌴
©~~~~~~~~बाबू लाल शर्मा "बौहरा" विज्ञ
९ . रत्नकरा छंद
विधान:-- ९ वर्ण प्रति चरण
चार चरण दो दो-दो समतुकांत हो।
मगण सगण सगण
२२२ ११२ ११२
__झूलों पर रमणी चढ़ती__
आया सावन नीर बहे।
भीगे भूमि किसान रहे।
खेतों में फसलें बढ़ती।
झूलों पर रमणी चढ़ती।
पौधारोपण भी करना।
खेतों में जल भी भरना।
बैठे मीत नही अब तो।
साधें काज प्रकाशित तो।
साथी प्रीत चहे मन की।
चाहे रीत सजे तन की।
भावे गीत सखी बनिता।
शर्मा, छंद लिखे कविता।
. -----+-----
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
१०. अमृतगति छंद
विधान:-- १० वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत
नगण जगण नगण गुरु
१११ १२१ १११ २
__प्रीत मचलती__
दधि घट हेतु लपकना।
वन पथ मेड़ भटकना।
हरि हर ग्वाल यमुन में।
भव भय नाग नथन में।
मनसुख संग विचरते।
पनघट पोर पहुँचते।
झट घट रंग पटकने।
हँस हँस पीर गटकने।
तनसुख मीत मिल रहे।
ब्रज वन गीत घुल रहे।
गिरिधर प्रीत मचलती।
शुभ जनमानस पलती।
. ----+------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
११ . सीता छंद
विधान :-- १५ वर्ण २६ मात्रा प्रति चरण
चार चरण दो-दो समतुकांत हो
२१२२ २१२२ २१२२ २१२
__नीर नैनों ने निकाला__
वारि हारे पेड़ पौधे, जीव सारे खेत भी।
रेत भाटे ईंट गारे, नीड़ हारे रेत भी।
आज देखो रो रही माँ, देख बेटे काश ने।
नीर मैला भूलता है, दे दिया आकाश ने।
नीर नैनों ने निकाला, सागरों में बाढ़ है।
सूखते वे ताल नाले, बाढ़ के ही कोढ़ है।
मानवी हो भूल माँगे, त्रासदी का राज है।
नीर दोहा देख भू भी, काँपती जो आज है।
आज पूरा विश्व देखें, काल से ही त्राण है।
रोग के आगोश में जो, भीरु सारे प्राण है।
है डरे आकाश भू तो, चंद्र तारे ताप भी।
होड़ के वे पंथ नाशी, बीज बोए आप भी।
. ----+-----
© ~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
१२. रामा छंद
विधान:-- ८ वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत
जगण यगण लघु लघु
१२१ १२२ १ १
. __बचे जल__
बहे यह वर्षा जल।
बचा जल प्राणी कल।
धरा पर हो जीवन।
सदा जल राखें वन।
कुए घट टाँके भर।
बना जल कुण्डे घर।
बहा मत वर्षा जल।
करे मत रीता कल।
कुए भर खेती कर।
रखें जल खेतों पर।
भरें जल जीवों हित।
मिले तरु पंछी नित।
लगा तरु मेड़ो पर।
मिले फल पेड़ों पर।
धरा हरियाली बन।
रखें भव पानी घन।
. ------+------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
१३. पदम छंद
विधान:-- ८ वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत
नगण सगण लघु गुरु
१११ ११२ १ २
___चमन के लिए___
मनुज बन मानवी।
तज चलन दानवी।
जल विमल पीजिए।
यश सतत लीजिए।
पथ तरुण लो चुनो।
नित सपन भी बुनो।
नव सृजन कीजिए।
हित वतन दीजिए।
जन अमन में जिए।
वन चमन के लिए।
शुभ समय सोच हो।
मन बदन लोच हो।
. -----+-----
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
१४ . दीपिकाशिखा छंद
विधान:-- २० वर्ण प्रति चरण
३,९,२० वें वर्ण पर यति
चार चरण दो-दो समतुकांत हो
भगण नगण यगण नगण नगण रगण लघु गुरु
२११, १११ १२२, १११ १११ २१२ १ २
. __माधव, चरण पखारे__
सावन, रिमझिम वर्षा, बतरस पति संग नेह से।
साजन, मधुरिम हर्षे, पल पल तिय संग मेह से।
सुन्दर, तरुवर भीगे, टप टप घन ढंग नीर है।
बोझिल,हर द्रुम झाँके, घर पथ पर मग्न धीर है।
मोहन,नटखट राधा,सखियन सब खेल खेल में।
भावुक, तन मन होते, तब गलियन गैल मेल में।
पावन, यमुन नहाते, प्रभु गिरधर कूद तैर के।
माधव, चरण पखारे, चुन चुन पद कंट कैर के।
वारिद, गरज डरावे, नटवर हँस जोर जोर से।
चंचल, तड़ित झँकावे, नभ तल जल शोर से।
सूरज, तमहर तापी, अविरल प्रभु दर्श कामना।
भावन, रच पद देखे, नर मन भव छंद साधना।
. ------+-------
©~~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
१५. गंग छंद
विधान:-- ९ मात्रा प्रति चरण
चरणांत गुरु गुरु २२
चार चरण, दो-दो समतुकांत
__जल बचाएँ__
जीव हित पानी।
जन मन कहानी।
हम जल बचाएँ।
प्रकृति मन भाएँ।
जल अमृत मानो।
बचत सब ठानो।
व्यर्थ न बहाओ।
पाठ यह पढ़ाओ।
हम तरु लगाएँ।
बिरखा बुलाएँ।
घन जल बचाएँ।
सब हित बताएँ।
. ----+----
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
१६. लीला छंद
विधान:-- १२ मात्रा प्रति चरण
चरणांत में जगण हो
चार चरण, दो-दो समतुकांत हो
. __सावन__
सावन आया सुजान।
बरसे वर्षा समान।
भीगे धरती विशाल।
भरे पोखर सर ताल।
खेती फसलें किसान।
पौधे पशुधन विहान।
झूले मचते धमाल।
उड़ते चुनरी रुमाल।
सजती रमणी शृंगार।
वन में मंगल विहार।
शासन सावन सुरेंद्र।
ढूँढे मिलते न चंद्र।
. -----+------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
१७ . कुसुमविचित्रा छंद
विधान:-- १२ वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत हो
नगण यगण नगण यगण
१११ १२२ १११ १२२
_प्रणय पुराने चितवन वादे_
रिमझिम वर्षा नद तट भाए।
मन विरहा दादुर सम गाए।
सजन सनेही प्रियजन यादें।
प्रणय पुराने चितवन वादे।
जल बरसे सावन हरियाली।
दृग बरसाए तिय मतवाली।
कृषक अगेती फसल निराए।
पवन पसीना सहज सुखाए।
पशु खग भीगे वन तरु भीगे।
तिय अलि झूले झटपट पींगे।
मन भटके साजन बिन आए।
कवि लिखते छंद सरस गाए।
. -----+------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
१८. मणिमाल छंद
विधान:- १९ वर्ण प्रतिचरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत
१०,१९ वें वर्ण पर यति
सगण जगण जगण भगण रगण सगण लघु
११२ १२१ १२१ २, ११ २१२ ११२ १
. __सहते सदा__
भरते नदीश उदार है, निज वक्ष भार अतीव।
सहते समुद्र समान ही, नर मानवी जन जीव।
सपने किसान सुजान के,हित भूमि जीवन हेतु।
नर जो विवेक भवान हो, भव सागरो हित सेतु।
रमणी सहे हित रीति के, तन कष्ट पालन धर्म।
सहते रहे पितु मात भी, भव हेतु कर्म अकर्म।
निज देश माँ यह भारती, सहते सदा मनुजात।
भर नीर पावन जाह्नवी, बहती सहे जन घात।
वन दे रहे सब आपको, सह ताप शीत अपार।
हिमराज भी सहता रहे, जन हेतु शीतल धार।
हम भी बनें हित मानवी,जन जैव जीवन वन्य।
रच छंद गीत कवित्त ये,कवि विज्ञ मानस धन्य।
१९. कुबलयमाला छंद
विधान:-- १० वर्ण प्रति चरण
चार चरण दो-दो समतुकांत
मगण नगण यगण गुरु
२२२ १११ १२२ २
_पानी जीवन हर प्राणी का_
पाए मानव तन क्यों रोता।
वर्षा पावन जल को खोता।
पानी जीवन हर प्राणी का।
रक्षो आदर गुरु वाणी का।
कूपों में घन जल डालोगे।
चाहोगे तब फिर पा लोगे।
बापी कुंड सहजले नाड़ी।
मोड़ोगे तब मुड़नी गाड़ी।
खेतों में तल पट बाँधे तो।
कुण्डे भी भर कर राखें तो।
खेती में जल भर के देना।
अच्छी आमद तुम भी लेना।
कुण्डे खोद भवन में यारों।
वर्षा नीर सतह में धारो।
टाँके नीर पथिक को होए।
पानी बूँद मनुज क्यों खोए।
. -----+-----
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
२० . मदकलनी छंद
विधान:-- २० वर्ण प्रति चरण
५,१०,१५,२० वें वर्ण पर यति
चार चरण, दो-दो समतुकांत हो
नगण जगण नगण भगण
सगण नगण लघु गुरु
१११ १२,१ १११ २,११
११२, १११ १ २
*(११११२×५)*
. __कृषक__
बदन थके, नयन तके,
नभ छलना, पवन चले।
कृषक चला, मगन मना,
श्रम करता, विपद छले।
मनन करे, खनन करे,
फसल उगे,प्रकृति हँसे।
अथक श्रमी, गुरबत में,
तन पिचके, रहन फँसे।
जल बरसे, जब हरषे,
सब सह लें, तरु सरसे।
जल घट ले, घन लटके,
बिन गरजे, बिन बरसे।
सतत सहे, कृषक दहे,
प्रभु सुनिए, कृषक मरे।
जल बरसे, तरु सरसे,
फसल बढ़े, विपद टरे।
. -----+------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
२१ . रजनी छंद
विधान:-- २३ मात्रा प्रति चरण
सप्तक की तीन आवृत्ति + गुरु
३,१०,१७,वीं मात्रा लघु अनिवार्य
मापनी- २१२२ २१२२ २१२२ २
. __अनमोल है पानी__
मीत पानी को बचाना भूमि जीवों को।
मेघ वर्षा नीर पाएँ हित सजीवों को।
आसमानी आस देखें वे किसानों की।
प्यास खेतों की मिटाएँ बेजुबानों की।
बंधु पौधों को लगाना मेड़ खेतों पर।
पंथ छाँया के लिए भी, पेड़ गेंतो पर।
मेघ हरियाली लुभाने, भूमि सरसा दे।
जीव नर पौधे हितों में, मेघ बरसा दे।
कुंड खेतों में बनाएँ, जल सहेजेंगे।
पंथ टाँके में भरें जल, कल बचा लेंगे।
विज्ञ छंदों को पढ़ें अन मोल है पानी।
संग आओ गीत गाएँ, भूल नादानी।
. ---------+++-------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
२२ . चित्रपदा छंद
विधान:-- ८ वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत
भगण भगण गुरु गुरु
२११ २११ २ २
_चित्र बना शुभकारी_
नीरज जो मुरझाए।
सावन नीर बहाए।
वाह कहीं सुन आहें।
चित्र बना मन चाहे।
पौध लगा कर पालें।
रीत निभे फल खालें।
प्राकृत भूमि बचाओ।
पावन चित्र बनाओ।
जोहड़ पोखर टाँका।
मूल्य पुरातन आँका।
नीर बचा भव सारी।
चित्र बना शुभकारी।
. -----+------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
२३. मंगल वत्थु छंद
विधान :-- २२ मात्रा प्रति चरण
११,वीं मात्रा पर यति के दोनो
ओर त्रिकल अनिवार्य
चरणांत में गुरु हो।
. __धरा सुरक्षा नीर सुरक्षा__
मीत हवा ये नीर, शुद्ध हो विमल सभी।
पेड़ लगायें मेघ, बुलाएँ सँभल अभी।
धरा सुरक्षा नीर, सुरक्षा मदद करो।
पर्यावरणन सखे, सुरक्षण, सनद करो।
.
ओजोन परत धूम्र, विनाशे कवच बड़ा।
उत्तर प्रहरी महा,हिमालय अटल खड़ा।
गंगा यमुना मात, सरीखी सरित बहे।
हो संरक्षण छंद, गीत ये विनय कहे।
.
अपनी धरती सिंधु, गुमानी तरु नदियाँ।
अपनी खेती हरी, भरी हो शत सदियाँ।
सब का तन मन रहे, सजीवन रोग हरें।
धरा वायु जल नहीं, प्रदूषण लोग करें।
. --------+---------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
२४ . मंगलमंगना छंद
विधान:-- १६ वर्ण प्रति चरण
४,१२,१६ वें वर्ण पर यति
चार चरण दो-दो समतुकांत
नगण भगण जगण जगण जगण गुरु
१११ २,११ १२१ १२१, १२१ २
. __श्रम करें, श्रम हरें__
नभ झरे, उठ किसान सँभाल,धरा कहे।
जल बहे,तरु लगा चल मीत, सभी सहे।
पथ रहे, जल मिले तरु संग, सुवासिता।
मन चहे,फल मिले घर नीड़, प्रभाविता।
हम सभी, उठ चलें हर रंग, प्रभात में।
श्रम करें, श्रम हरें मजदूर, विभाँति मे।
अरि मिटे, हम जुटें रणवीर, स्वदेश में।
खुश रहे, सब बढ़े मन भाव, सुवेश में।
विनय है, यह सुने निज देश, महान हो।
सरल हो,विनत वीर उछाह, सुजान हो।
सिर कटे, हम मिटे इस देश, सुरक्ष में।
मत भले, सत पले शुभ विज्ञ, सपक्ष में।
. --------++-------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
२५ . तमाल छंद
विधान:-- १९ मात्रा प्रति चरण
चौपाई + गुरु लघु
. __शीत काल__
भोर काल में बजते दंता शीत।
चालीसा भावे बजरंगी गीत।
मन से ही उपजे चौपाई छंद।
धीमे स्वर में कंपित गाते द्वंद।
अवसर मिले रजाई ओढ़े शाल।
बंद किंवाड़ी करते कान्हा ग्वाल।
दूर नींद से नयन हमारे आज।
गीत भजन से बैन उचारे साज।
गजक रेवड़ी लागे खिचड़ी भोग।
वृद्ध जनों की सेहत बिगड़े रोग।
लिखें काव्य कैसे चौपाई गीत।
कँपे हाथ अँगुली थर्राई मीत।
गर्म वसन बाँटो सुखदाई रीति।
अन्न दान कर लो जगताई प्रीति।
पीर नीर की सभी समझते धीर।
जल की बचत काँपते करते वीर।
. -------+++-------
© सर्वाधिकार सुरक्षित
बाबू लाल शर्मा, बौहरा, *विज्ञ*
सिकंदरा, दौसा, राजस्थान
pin.३०३३२६
mob.no. ९७८२९२४४७९
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