जल संरक्षण
भू जल एवं वर्षा जल पुनर्भरण
💧 *जल संरक्षण* 💧
. ---- बाबू लाल शर्मा, बौहरा, विज्ञ
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. *आत्म विचार*
. ( लेखकीय )
जल ही जीवन है, जल से ही जीवन है। ब्रह्माण्ड में पृथ्वी ही एक मात्र पिण्ड है, जहाँ जल एवं वायु (प्राण वायु) उपलब्ध है। जल और वायु से जन जीवन,वन वनस्पति आदि संभव है। वैश्विक स्तर पर वर्तमान में, वन विनाश, खनिज दोहन, मानवीय भूलें, जल का अतिदोहन , ग्रीन हाउस इफेक्ट ,कंकरीट वन, कार्बन गैसों की वृद्धि, ओजोन परत का क्षरण, पृथ्वी का बढ़ता तापमान, हिम ध्रुव गलन, सागर जल वृद्धि आदि अनेक ऐसे कारण हैं, जिससे पृथ्वी पर वर्षा की असमानता और अनियमितता के साथ ही भूमिगत जल , भूजल की गिरावट ,कमी या अनुपल्बधता की समस्याएँ उत्पन्न हो गई है।
. कई देश प्रदेश क्षेत्र और हमारा राजस्थान तो आदिकाल से ही न्यून वर्षा से पीड़ित रहता आया है, भूजल की कमी और अकाल यहाँ के जनमानस में बसा हुआ है।
ऐसी स्थिति में हमारा दायित्व है कि जल का अनावश्यक दोहन न करें, जल की बचत करें एवं वर्षा जल को फिजूल बहने से बचाकर उसे संग्रह करें या भूमि में पुनर्भरण करें।
इसी पावन उद्देश्य को अभियान के रूप में जन जन तक पहुंचाकर जन जागृति लाने की उत्तम कार्य योजना की हमारे दौसा के माननीय जिलाधीश महोदय श्रीयुत अविचल चतुर्वेदी जी ने पहल की है, आपकी पुनीत सोच को सादर साधुवाद।
आदरणीय जिलाधीश दौसा के इस पुनीत अभियान की कमान सँभाल रहे श्रीयुत महेश आचार्य जी, जिला परियोजना अधिकारी जी सतत श्रमशील और प्रयासरत रहते हैं, लगातार वर्षा जल पुनर्भरण हेतु आप द्वारा प्रयास एवं जागरण अभियान आपकी कर्मठता की प्रत्यक्ष कहानी है।
. श्री महेश आचार्य जी के इस अभियान में मन वचन और कलम से सहयोग के रूप में "जल संरक्षण" नामक इस पुस्तक से दौसा की पावन भूमि से यह जनहितकारी संदेश दौसा जिले के जन मानस में अंकित हो कर समस्त राजस्थान फिर सभी प्रदेशों में और देश देश में जागृति लाते हुए यह जागरण वैश्विक स्तर पर पहुँचे।
इस हेतु, प्रथमत:- दौसा दर्शन , दौसा का परिचय, फिर संदेश परक गीत, मुक्तक, एवं छंदों के साथ वृहद - नेह - नीर चालीसा का समावेश किया है।
पुस्तक के रूप में मेरा यह प्रयास आप सभी को सादर अर्पित है।
आशा और विश्वास है कि सृष्टि , सजीवों और जन जीवन के लिए जल की महत्ता वाला यह संदेश आप पाठक गण यथा संभव प्रसारित कर जन जारूकता लाएँगे।
आप पाठक गणों का स्नेह, समीक्षा और समालोचना ही कविमन का मनोबल बढाएंगे।
जय हिन्द, जय भारत
जय जल, जय जीवन 🙏
दिनांक ०५.०७.२०२० सोमवार
सादर,
बाबू लाल शर्मा, बौहरा, विज्ञ
(शिक्षक एवं साहित्यकार)
निवासी - सिकंदरा, ३०३३२६
जिला - दौसा, राजस्थान
mob.no.९७८२९२४४७९
आइए आपको हमारे यहाँ दौसा की सैर
करवादें-
मेरा जिला,मेरी बोली, मेरा गाँव ,संस्कृति, रीति,
पर्यटन,इतिहास,फसल
सब से रुबरू.....
..तो आइए
दौसा दर्शन
( १६ मात्रिक छंद मय )
. °°°°°°
आओ सैर कराँ दौसा की,
नामी बड़गूजर धौंसा की।
सूप सो किलो दौसा माँई।
शिवजी नीलकंठ प्रभुताई।
गाँवा कस्बावाँ शहराँ की,
आओ सैर कराँ दौसा की।
यातो जिलो बड़ो ही नामी,
ईंका माणस भी सर नामी।
पचपन याद करै बचपन नै,
भूलै सहज नही छप्पन नै।
मनसां पढ़ बा लिख बा की।
आओ सैर................
देखो लालसोट अल बेलो,
छतरी ख्यालन् को छै हेलो।
मंडावरी गजब की, नगरी।
पपलज माता परबत पधरी।
डूँगर रेल सुरंग हवा की,
आओ सैर ...............
बसवा रही पुरानी पूँजी,
डाइट,भांडा,दरगाह गूँजी।
राणा सांगा प्रण संरक्षण।
बाबर संग लड़ाई तत्क्षण।
रेलाँ बाँदीकुई सब देखी,
गजबण आभानेरी चोखी।
टोळी देश विदेश जणा की,
आओ सैर...............
या सिकराय भाग्य सूँ नामी,
हिँगलज माताजी जनजामी।
घाटा मेंहदी पुर दरबार,
लागै भगताँ भीड़ अम्बार।
सिकंदरो अरमान समूचो,
पत्थर नक्काशी दर ऊँचो।
लकड़ी सौड़ रजाई बाँकी,
आओ सैर..... .........
महुवा पाटोली को लेखो।
होळी मनै पावटा देखो।
महुवा गढ़ री देवी माता।
पाछै मण्डावर जुग बातां।
बाला हेड़ी बरतन नगरी।
मंडी लोहा मींडा बकरी।
गाढ़ी भू खेती करषाँ की,
आओ सैर.............
तहसिल नई लवाण नवेली,
खादी दरियाँ याँ गो भेळी।
नाहन पाटन नीचै दाबी,
अब तो नई नाथ पै चाबी।
दरशन नाचै भाभी काकी,
आओ सैर.......... ....
दौसा तहसिल देवगिरी मैं,
शिवजी पाँच पंच सा जीमैं।
होटल भाँडरेज गढ वाळी,
बजै गिर्राजधरण कै ताळी।
सड़काँ ,रेलाँ घणी सवारी,
बसन्ती पवन चलै मेळा री।
कामना डोवठा खाबा की,
आओ सैर कराँ..........
मोदक गीजगढ़ का खाओ,
डूँगर किलो घूम नै आओ।
झाझी राम पुरा मैं न्हावो,
भोजन साँवलिये दर पावो।
दाळ पचवारा री ढब की,
मारो आलूदा मै डबकी।
खीर बिनौरी रा बाला की,
आओ सैर....... .......
आभानेरी घणी पुराणी,
भंडा भद्रा किणरै जाणी।
चालो चाँद बावड़ी देखो,
हर्षद माता शुभ अमळेखो।
सल्ला बाबू लाल शर्मा की,
आओ सैर ..............
रेतली बाण गंगा यामै,
मौरल सावाँ सूरी जामै।
बन्दो काळा खो हरषावै,
माधो सागर सुर भरजावै।
महिमा ढूँढाड़ी, भासा की,
आओ सैर ...............
हींगवा नाथ समाजी कंथी।
राम, कबीरा, दादू पंथी।
देव मीन मय सर्व इबादत।
दरगा हजरत करें जियारत।
कविता काव्य पिपासा की,
आओ सैर........ .....
सुन्दर दास संत की नगरी,
देखो दादू धाम टहलड़ी।
गेटोलाव सन्त सर , पावन,
पंछी मैना पिक मनभावन।
भरोसा और जिज्ञासा की,
आओ सैर.............. .
नींबू कैरी आम करूंजा,
ककड़ी कद्दू अरु खरबूजा।
चोखा निपजै फळ तरकारी।
गायाँ भैंस कृषक उपकारी।
डेयरी सरस भली आसा की,
आओ सैर....... ......
फैंटा चूनड़ली फहराबो,
सादा जीवन सादा खाबो।
सुड्डा दंगल साहित हेला।
गाँव गाँव में भरताँ मेळा।
रीत प्रभू भोग पतासा की,
आओ सैर कराँ .........
. °°°°°°°
रचनाकार ©ढूँढाड़ी
बाबू लाल शर्मा, बौहरा, *विज्ञ*
~~~~~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. 💧 *नीर - नेह, युग-चालीसा* 💧
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दोहा--
मेघपुष्प पानी सलिल, आपः पाथः तोय।
लिखूँ वन्दना वरुण की,निर्मल मति दे मोय।।१
मेह नेह का रूप जल, जीवन का आधार।
बिंदु बिंदु से सिंधु है, समझ स्वप्न साकार।।२
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चौपाई--
प्रथम पूज्य गौरी के नंदन।
मात शारदे का शुभ वंदन।।
वरुण देव, जल महिमा गाथा।
लिखूँ सुनाउँ नवाकर माथा।।१
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नेह नीर मनुजात निभाए।
भू पर तभी नीर बच पाए।।
जल से जीवन यह जग जाना।
जल मे प्राणवायु को माना।।२
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नभ से मेघ पुष्प बरसाए।
सलिल स्रोत सारे सर साए।।
जल से जीव और परजीवी।
जल से वसुधा बनी सजीवी।।३
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वर्षा जल होता अति निर्मल।
रक्षण करना सब को ही मिल।।
जल से अन्न अन्न से जीवन।
जल बिन कैसे हों धरती वन।।४
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रहे संतुलित वितरण जल का।
नीर सहेज रखें हित कल का।।
जल कुल भाग तीन चौथाई।
जल की महिमा सके न गाई।।५
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घर घर में वर्षा जल रक्षण।
सत संकल्पों हित संरक्षण।।
जल गागर में हो या सागर।
तन और धरती भाग बराबर।।६
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बूँद बूँद जल सुधा समझिए।
जल से जीवन मोल परखिए।।
धरती जल या वरषा जल हो।
नीर जरूरत तो पल पल हो।।७
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जल से पेड़ पेड़ से वसुधा।
नीर न्यूनता बहुता दुविधा।।
प्राणी तन मे रक्त महातम।
सृष्टि हेतु जल जीवन आतम।।८
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नयन नीर सूखे नही अपने।
व्यर्थ नीर खोएँ मत सपने।।
वरुण देव हैं पूज्य हमारे।
धरा चुनरिया रंगत डारे।।९
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सूर्य ताप जल वाष्प बनाए।
पवन वेग नभ तक पहुँचाए।।
देव इन्द्र बादल बन बरसे।
वर्षा जल से वसुधा सरसे।।१०
💧🦢
दोहा--
जनहित पानी देशहित, जागरूक हो मीत।
जीवन के आसार तब, जल स्रोतों से प्रीत।।३
नीर धरोहर सृष्टि की, रखलो इसे सहेज।
करना सद उपयोग है, अति दोहन परहेज।।४
💧🦢
चौपाई--
कूप बावड़ी ताल तलाई।
युगों युगों पय धार पिलाई।।
सब जीवों की प्यास बुझाए।
मीन मकर मोती जल जाए।।११
💧🦢
बाँध नहर से फसल सरसती।
खेत खेत मुस्कान पसरती।।
शंख कमल जल बीच निपजते।
जिनसे देव ईश सब सजते।।१२
💧🦢
वर्षा जल को बचा सहेजो।
यह संदेशा घर घर भेजो।।
जल से ताल तलैया कूपा।
बापी सरवर सिंधु अनूपा।।१३
💧🦢
बूँद बूँद से घट भर जाते ।
दादुर ताल पोखरे गाते।।
खाड़ी सागर से महासागर।
मरु भूमि में अमृत गागर।।१४
💧🦢
नेह मेह का जल कण सपना।
छत का नीर कुंड भर अपना।।
झील बाँध सर सरित अनेका।
भिन्न रूप रखते जल एका।।१५
💧🦢
गाँव राह बहु कूप पुराने।
स्वच्छ रखों तब लगे सुहाने।।
सागर खारा जल भर ढोता।
क्रिस्टल बने राम रस होता।।१६
💧🦢
गिरि पर्वत रज नीर सहेजे।
जीव जगत हित धारा भेजे।।
शीत नीर जम बर्फ कहाता।
बहे पिघल जल धार बनाता।।१७
💧🦢
वही धार नदिया बन जाती।
कुछ नदियाँ बरसाति सुहाती।।
बरसे जब घन घोर घटाएँ।
ध्यान रहे जल व्यर्थ न जाए।।१८
💧🦢
सम वर्षा कृषि हित सुखकारी।
अन्न फसल उपजाए भारी।।
जल अतिवृष्टि बाढ़ कहलाती।
अल्पवृष्टि हो फसल सुखाती।।१९
💧🦢
थार मरुस्थल जल अति न्यूना।
चतुर सुजन जल रखे सतूना।।
मध्यम जल वर्षा हित कारी।
जीव जन्तु मानव उपकारी।।२०
💧🦢
दोहा--
वारि अंबु जल पुष्करं, अम्मः अर्णः नीर।
उदकं घनरस शम्बरं, रक्ष मनुज मतिधीर।।५
हो आँखों में नीर तो, देख समझ जन पीर।
भू पर जल महिमा बड़ी, जानें मीत सुधीर।।६
💧🦢
चौपाई--
कैलासन में पूज्य शिवालय।
नेह नीर से सजे हिमालय।।
हिमगल नीर, मेह से नीरा।
बह के बने सरित गम्भीरा।।२१
💧🦢
नदियाँ निज पथ स्वयं बनाती।
खेती फसल धान सरसाती।।
जीव जन्तु वन तरु संजीवन।
नद सर नीर मीन मय धीमन।।२२
💧🦢
घर घर टाँके हम बनवाएँ।
वर्षा जल से जो भरजाएँ।।
नदियों के तट तीर्थ हमारे।
पुरा सभ्यता नदी किनारे।।२३
💧🦢
बापी पोखर सरवर सारे।
स्वच्छ रहें जल स्रोत हमारे।।
नदियाँ ही जन जीवन धारा।
प्यारा लगता सरित किनारा।।२४
💧🦢
उत्तम जल की ये सद् वाहक।
गन्द प्रदूषण मत कर नाहक।।
नौका चले जीविका पलती।
माँझी चले ग्रहस्थी चलती।।२५
💧🦢
टाँके स्वच्छ भरो जल चंगे।
हर हर बोलो घर घर गंगे।।
नदी नीर पावन जग माने।
सरिता को माँ सम सम्माने।।२६
💧🦢
जल जीवन हित बहुत जरूरी।
अति दोहन बच मनुज गरूरी।।
गंगा माँ पावनतम सरिता।
काव्य कार हारे लिख कविता।।२७
💧🦢
श्रमिक खेत पर बना तलाई।
जीवट कृषक फसल लहराई।।
यमराजा की श्वास अटकती।
सबको पाप मुक्त नद करती।।२८
💧🦢
अपने सरवर बाँध हमारे।
घर के टैंक स्वच्छ परनारे।।
गंगा माँ सम पावन धारा।
छू कर दर्शन पुण्य हमारा।।२९
💧🦢
गाँव गाँव जल स्रोत सँभालें।
स्वच्छ किनारे पूल बनालें।।
यमुना यादें गंगा भगिनी।
कान्हा- लीला गोपी- ठगनी।।३०
💧🦢
दोहा--
सरिता तटिनी तरंगिणी, द्वीपवती सारंग।
नद सरि सरिता आपगा, जलमाला जलसंग।।७
सागर सर सरिता सभी, सदा सुभागे नीर।
मनुज सभ्यता थी बसी, पुरा इन्ही के तीर।।८
💧🦢
चौपाई--
कभी भूमि मरु पर था सागर।
मानुष करनी भटकी गागर।।
बह कर सरस्वती नद धारा।
अब तक गर्व गुमान हमारा।।३१
💧🦢
सरस्वती की राम कहानी।
कहते सुनते पुरा जुबानी।।
नदी नर्मदा का हर कंकर।
लगता हमको भोला शंकर।।३२
💧🦢
माही और बनास पुनीता।
मरु मेवाड़ी प्राण प्रणीता।।
सरयू घग्घर माही चम्बल।
नदियाँ सब धरती को सम्बल।।३३
💧🦢
वर्षा जल बहने से बचता।
तभी खेत में हलधर हँसता।।
नदियों पर जल बाँध बनाते।
बिजली हित संयत्र लगाते।।३४
💧🦢
पेड़ लगा कर मेघ बुलाएँ।
शुद्ध रहे जल स्रोतों आए।।
बाँध बने से बहती नहरें।
इनसे जल स्तर भी ठहरे।।३५
💧🦢
नहरी जल खेतों तक जाए।
खेत खेत फसलें लहलाए।।
हम भी घर घर कुण्ड बनाले।
उस जल से बगिया महकालें।।३६
💧🦢
जलपथ साफ हमेशा रखने।
संभव घट टाँके रख ढँकने।।
इसीलिए जल नदी सफाई।
करना सब यह काज भलाई।।३७
💧🦢
भूमि नीर वर गड़ा दफीना।
अतिदोहक नर है मतिहीना।।
नदी मिले ज्यों सागर नीरा।
पंच तत्व में मिले शरीरा।।३८
💧🦢
घर घर गाँव शहर हो चेतन।
संग्रह कर लें नीर निकेतन।।
तन मन नदियाँ नीर सँवारो।
स्वच्छ नीर रख भावि सुधारो।।३९
💧🦢
सखे बचाना घर घर पानी।
धरा रहे मम चूनर धानी।।
शर्मा बाबू लाल सुनाई।
नेह नीर लिख कर चौपाई।।४०
💧🦢
टाँके घर घर में बन जाए।
बूँद बूँद जल की बच जाए।।
चालीसा मन चित पढ़ लीजे।
जल नदियों का आदर कीजे।।४१
💧🦢
दोहा--
अपगा लहरी निम्नगा, निर्झरिणी जलधार।
सदा सनेही सींचती, करलो नमन विचार।।९
नीर वायु से ही बने, पवन नीर से मान।
शर्मा बाबू लाल यह, सहज शोध विज्ञान।।१०
. …...............💧🦢
✍©
बाबू लाल शर्मा, बौहरा, *विज्ञ*
सिकंदरा, 303326 जिला- दौसा ,
. *गंगा महिमा*
. दोहा छंद
. 👀१ 👀
*सुरसरि* पावन पुण्य है, भारत में वरदान।
*देवनदी* कहते सभी, माता सम सम्मान।।
. 👀२ 👀
कहे *त्रिपथगा* कुम्भ में, मेला भरे विशाल।
रीत *जाह्नवी* पुण्य की, सदा भक्ति जयमाल।।
. 👀३ 👀
*भगीरथी* भू पर बहे, भागीरथी प्रयास।
रहे सदा *देवापगा*, भारत जन की आस।।
. 👀४ 👀
*मंदाकिनी* का नीर तो, अमरित पान समान।
*मोक्षदायिनी* मात यह, भारत का अरमान।।
. 👀५ 👀
*गंगा* सबका हित करे, अपना भी कर्तव्य।
साफ रखे इस नीर को, भाग्य बनेगा भव्य।।
. 👀६ 👀
पाप विनाशी नीर को, कर मत नर तू गंद।
स्वार्थ मनुज ये त्याग दे,खुद को रख पाबंद।।
. 👀७ 👀
जन जन का सौभाग्य है, इस नदिया के तीर।
न्हाए पीए पाप हर, और मिटे मन पीर।।
. 👀८ 👀
*विष्णुपगा गंगे* सदा, धारित शिव के शीश।
केवट की महिमा बढ़ी, पार उतारे ईश।।
. 👀९ 👀
*ध्रुवनंदा* कहते जिसे, पाप काटती *गंग*।
हिमगिरि से आती सदा, निर्मल जल के संग।।
. 👀१० 👀
*सुरसरिता सुरधुनि* कहें, *नदीश्वरी* हे *गंग*।
*गौराभगिनी हिमसुता*, बहिने दोनो संग।।
. 👀११ 👀
*त्रिपथगामिनी सुरनदी, सुरापगा* सब प्रीत।
शर्मा बाबू लाल यह, लिखे वंदना गीत।।
. 👀👀
✍©
बाबू लाल शर्मा "बौहरा"
. दोहा छंद
. *सागरवंदन्*
. सागर के 27 नाम
. .....👀🌹👀....
. १
वरुण देव को लें सुमिर, नमन करूँ कर जोरि।
सागर वंदन मैं लिखूँ, जैसी मति है मोरि।।
. २
बिन पानी क्या कल्पना, सृष्टा *रत्नागार*।
वरुणराज तुमसे बने , वंदन *नीरागार*।।
. ३
अगनित नदियाँ भी उमड़, आती रहे *नदीश*।
सब तटिनी तट तोड़नी, रम जाती *बारीश*।।
. ४
विविध रूप जीवन सरे, प्राणप्रिय *जलागार*।
पुरा सभ्यताशेष का , जीवन *पारावार*।।
. ५
हृदय मध्य राखे जतन, *रत्नाकर* के मान।
परिघटनाओं को रखे, *उदधि* सँभाल सुजान।।
. ६
रहे मान मर्याद से, *कंपति* तभी महान।
कभी न छोड़े साथ श्री, रमापते भगवान।।
. ७
देवासुर मिल के किया, *सागर* मंथन साज।
जहर रखा शिव कंठ में, सरे सृष्टि हित काज।।
. ८
बाँट दिये थे सृष्टि हित ,चौदह रत्नाभार।
लक्ष्मी श्रीहरि की हुई, देवन अमृत धार।।
. ९
*क्षीरसिंधु* श्री हरि बसे, आश्रय लक्ष्मी शेष।
बीच *नीरनिधि* शेष की, शैय्या बनी विशेष।।
. १०
*जलधि* शांति के दूत सम, भक्तिपुंज साभार।
राम सेतु *वारिधि* बँधे, राम शक्ति संसार।।
. ११
*अकूपाद* अवशेष में, खोज रहा विज्ञान।
राघव धर्मन् अस्मिता, सेतु विशेष बखान।।
. १२
मझ *पयोधि* जन जीविका, सहता ताप दिनेश।
सीमा देश विदेश की, बने *समुद्र* विशेष।।
. १३
*पंकनिधी* व्यापार के, साधन बंदरगाह।
सीमाओं पर *तोयनिधि*, करते सद आगाह।।
. १४
*अंबुधि* अन्वेषण सदा, होते हैं अविराम।
*जलनिधि* से संभावना, विविध वस्तु के धाम।।
. १५
साधन युद्धक पोत भी, रहते आते नित्य।
युद्ध शान्ति संसार की, निभा प्रीति आदित्य।।
. १६
जगन्नाथ अरु द्वारिका, रामेश्वर *जलधाम*।
कपिल मुने आश्रम वहाँ, शोभा है अभिराम।।
. १७
*बननिधि* मानव मन शमन, सभी मिटाते भ्रांति।
*महासागरो* तुम करो, जन के मन में शान्ति।।
. १८
दर्शन शिला विवेक से, भारत जन मन क्रांति।
अग्रदूत वे क्रांति के, हिन्द *सिन्धु* विश्रांति।।
. १९
गहन *समन्दर* धीरता, जल रहस्य भरमार।
*अर्णव* की माने सदा, खारे वीचि अपार।।
. २०
महा द्वीप सारे बसे, धरती के श्रृंगार।
खार सार है पी लिया, चन्दा के अभिसार।।
. २१
प्रभु ने भी वंदन किया, पूजा सागर तीर।
शर्मा बाबू लाल हित, जीवन पालक नीर।।
......👀🌹👀.....
उक्त 👆रचना में सागर के 27 नामोल्लेखित है।
🙏🏻रचनाकार©
बाबू लाल शर्मा "बौहरा"
नीर - नेह, युग-चालीसा
https://kavitabahar.com/?p=14285
बाबू लाल शर्मा, बौहरा,'विज्ञ'
. *कुण्डल छंद विधान*
२२मात्रिक छंद--१२,१० मात्रा पर यति,
यति से पूर्व व पश्चात त्रिकल अनिवार्य,
चरणांत में गुरु गुरु (२२)
दो दो चरण समतुकांत हो।
चार चरण का एक छंद कहलाता है।
.....
. *नीर नेह*
. ...👀🌹👀...
जल ने आबाद किया,सुने है कहानी।
जीवन विधाता बंधु , रीत रहा पानी।
पानी बर्बाद किया, भावि नहीं देखे।
पीढ़ी आज कह रही, कौन देय लेखे।
खोज रहा नीर धीर, मान मानवो में।
खो गया है जो आज,राम दानवों में।
सूख रहे झील ताल ,नदी बाव सारे।
युद्ध से न मान हार, नीर बिन हारे।
सूख गया नैन नीर, पीर देख भारी।
सत्य बात मान मीत,रीत गई सारी।
सिंधु नीर बढ़ रहा, स्वाद याद खारा।
मनुज देख मनुज संग,नीर नेह हारा।
कूप सूख गए नीर, कृषक हताशे है।
नीर देते घट आज, स्वयं पियासे हैं।
नलकूप खोदे नित्य, धरा रक्त खींचे।
मनुज नीर दोउ मीत,नित्य चले नीचे।
सरिताएँ डाल गंद , नीर करें गंदा।
हे मनुज माने मातु , नदी बुद्धिमंदा।
बजरी निकाली रेत,खेत किये खाली।
फूल पौधे खा गये, बाग वान माली।
छेद डाले भू खेत, खोद कूप डाले।
पेड़ नित्य काट रहे, और नहीं पाले।
रेगिस्तान बढ़ रहा, बीत रहा पानी।
कौन फिर तेरी सुने, बोल ये कहानी।
रक्षा कर मीत नीर, जीव जंतु प्यासे।
सारे जल स्रोत रक्ष, देख अब उदासे।
जल बिना जीवन नहीं,सोच बना भाई।
जीवन बचालो बंधु , बात यह भलाई।
. 👀👀
© बाबू लाल शर्मा,"बौहरा"
. *उडियाना छंद विधान*
२२मात्रिक छंद--१२,१० मात्रा पर यति,
यति से पूर्व व पश्चात त्रिकल अनिवार्य,
चरणांत में गुरु (२)
दो दो चरण समतुकांत हो।
चार चरण का एक छंद कहलाता है।
.....
. *खोज रहा नीर नेह*
.
वरुण देव कृपा करे, नीर पीर हरिये।
जल से सब जीव बने,जीव दान करिये।
दोहन मनुज ने किया, रहा जल बीत है।
बिन अंबु कैसे निभे, जीव जग रीत है।
जल ने आबाद किया,सत्य सुने कथनी।
जीवन विधाता बंधु , रीति रही अपनी।
पानी बर्बाद किये, भावि नहीं बचता।
पीढ़ी अफसोस रही, कौन कहाँ रमता।
खोज रहा नीर नेह , मान सम्मान को।
खो रहा है जो आज,नीर वरदान को।
सूख रहे झील ताल ,नदी कूप अपने।
युद्ध से न सके हार, नीर हार सपने।
सूख गया नैन नीर, पीर देख डरते।
सत्य बात मान मीत, रीत प्रीत करते।
सिंधु नीर बढ़ रहा, स्वाद जो खार का।
मनुज देख मनुज संग,नेह जल हार का।
कूप सूख गए नीर, कृषक हताश रहे।
नीर देते घट आज, प्यास खुद ही सहे।
नलकूप खोदे नित्य, रक्त खींच धरती।
मनुज नीर दोउ मीत,नित्य साख गिरती।
नदियों में डाल गंद ,नीर करें गँदला।
हे मनुज माने मातु ,नदी नेह बदला।
बजरी निकाली रेत, खेत रहेे खलते।
फूल पौधे खा गये, बाग लगे जलते।
छेद डाले भू खेत, खोद कूप धरती।
पेड़ नित्य काट रहे, भूमि बने परती।
रेगिस्तान बढ़ रहा, बीत रहा जल है।
कौन फिर तेरी सुने, बोल एक पल है।
रक्षा कर मीत नीर, जीव जंतु तरसे।
सारे जल स्रोत रक्ष, देख मेघ बरसे।
जल बिना जीवन नहीं,सोच बने अपनी।
जीवन बचालो बंधु , बात यही जपनी।
. 👀👀
© बाबू लाल शर्मा,"बौहरा"
. *किरीट सवैया-विधान*
२११×८ भगण× ८
२४ वर्ण, १२,१२ पर यति
चार पद समतुकांत
. ----------
*नाचत मोर...*
. --------------
नाचत मोर धरा वन सावन,
घोर घटा नभ से बरसावन।
बारिश चाहत हो सब के मन,
मोर कहे बस मेघ बुलावन।
रंग बिरंग बिखेर सु पाँखन,
नाच रहा मन मान सुहावन।
देख रहे जन नारि मयूरिन,
चाहत है सब नेह लुभावन।
देखन चाहत है सब के उर,
लागत मोर सबै मन भावन।
मोर पखा अति सुंदर सोहत,
याद दिलावत कान्ह सुपावन।
आपन पैर निहार मयूरिन,
भावन अश्रु रहे टपकावन।
बूँद सहेज पिये सु मयूरिन,
प्रीत सुरीत, सनेह निभावन।
. 👀👀
© बाबू लाल शर्मा "बौहरा"
*सावन सरस सुजान*
. ( दोहा छंद )
. १
सावन शृंगारित करे, वसुधा, नारि, पहाड़।
सागर सरिता सत्यशिव,नाग विल्व वन ताड़।
. २
दादुर पपिहा मोर पिक, नारी धरा किसान।
सबकी चाहत नेह जल,सावन सरस सुजान।।
. ३
नारि केश पिव घन घटा, देख नचे मन, मोर।
निशदिन सपन सुहावने,पिवमय चाहत भोर।
. ४
लता लिपटती पेड़ से, धरा चाहती मेह।
जीव जन्तु सब रत रति,विरहा चाहत नेह।।
. ५
कंचन काया कामिनी, प्राकृत मय ईमान।
पेड़ लगा जल संचयन,सावन काज महान।।
. ६
हरित तीज त्यौहार है, पूज पंचमी नाग।
रक्षा बंधन नेह मय, रीत प्रीत मन राग।।
. ७
मन मंदिर झूले पड़े, पुरवा मंद समीर।
सावन मनभावन चहे, मादक हुआ शरीर।।
. ८
रीत प्रीत पालो सखे, पावन सावन माह।
प्रेमभक्तिमय जगत हो,साजन साहिब चाह।।
. ९
भक्ति प्रीत संयोग का, मधुरस सावन मास।
जैसी जिसकी भावना, वैसी कर मन आस।।
. १०
शिवे शक्ति आराधना, कान्हा राधा नेह।
कृषक धरा की प्रीत से, सावन बरसे मेह।।
. ११
सावन का संदेश है, करो मीत उपकार।
शर्मा बाबू लाल का, नमन करो स्वीकार।।
© बाबू लाल शर्मा,
. समझ ले वर्षारानी
१३ मात्रिक मुक्तक
. (वर्षा का मानवीकरण)
बरस अब वर्षा रानी,
बुलाऊँ घन दीवानी।
हृदय की देखो पीड़ा,
मान मन प्रीत रुहानी।
हितैषी विरह निभानी,
स्वप्न निभा महारानी।
टाल मत प्रेम पत्रिका,
याद कर प्रीत पुरानी।
प्राण दे वर्षा रानी।
त्राण दे बिरखारानी।
सूखता हृदय हमारा,
देह से नेह निभानी।
तुम्ही जानी पहचानी,
वही तो बिरखा रानी।
पपीहा तुम्हे बुलाता,
बनो मत यूं अनजानी।
हार कान्हा से मानी,
सुनो हे मन दीवानी।
स्वर्ग में तुम रहती हाँ,
तो हम भी रेगिस्तानी।
सुनो हम राजस्थानी,
जानते आन निभानी।
समझते चातक जैसे,
निकालें रज से पानी।
भले करले मनमानी,
खूब करले नादानी।
हारना हमें न आता,
हमारी यही निशानी।
मान तो मान सयानी,
यादकर पुरा कहानी।
काल दुकाल सहे पर,
हमें तो प्रीत निभानी।
तुम्हे वे रीत निभानी,
हठी तुम जिद्दी रानी।
रीत राणा की पलने,
घास की रोटी खानी।
जुबाने हठ मरदानी,
जानते तेग चलानी।
जानते कथा पुरातन,
चाह अब नई रचानी।
यहाँ इतिहास गुमानी।
याद करता रिपु नानी।
हमारी रीत शहादत,
लुटाएँ सदा जवानी।
सतत देते कुर्बानी,
हठी हे वर्षा रानी।
श्वेद से नदी बहाकर,
रखें माँ चूनर धानी,
प्रेम की ऋतु पहचानी,
लगे यह ग्रीष्म सुहानी।
याद बाते सब करलो,
करो मत यूँ शैतानी।
निभे कब बे ईमानी,
चले ईमान कहानी।
आन ये शान निभाते,
समझते पीर भुलानी।
बात की धार बनानी,
रेत इतिहास बखानी।
तुम्ही से होड़ा- होड़ी,
मेघ प्रिय सदा लगानी।
व्यर्थ रानी अनहोनी,
खेजड़ी यों भी रहनी।
हठी,जीते कब हमसे,
साँगरी हमको खानी।
हमें, जानी पहचानी,
तेरी छलछंद कहानी।
तुम्ही यूँ मानो सुधरो,
बचा आँखों में पानी।
जँचे तो आ मस्तानी,
बरसना चाहत पानी।
भले भग जा पुरवैया,
पड़ी सब जगती मानी।
याद कर प्रीत पुरानी,
झुके तो बिरखारानी।
सुनो हम मरुधर वाले,
रहे तो रह अनजानी।
मान हम रेगिस्तानी,
बरसनी वर्षा रानी।
मल्हारी मेघ चढ़े हैं।
समझ ले वर्षा रानी।
-----------
बाबूलाल शर्मा
8 मात्रिक छंद-मुक्तक
*आजा वर्षा*
*हँसे जवासा*
भर चौमासा,
मरू निराशा।
सूखा सावन,
मन है प्यासा।
💧
मेघ न सरसा,
पादप तरषा।
सदा रूठनी,
अल्हड़ बरषा।
💧
सदा पिपासा,
जनमन आशा।
फसल रूठती,
अमृत बरसा।
💧
वर्षा💧वर्षा,
दादुर प्यासा।
जल्दी आकर,
सागर हर्षा।
💧
फड़का मारे,
फसल बिगारे।
खुद भी मरता,
हमको मारे।
💧
खेती सूखे,
पशु वन भूखे।
भटके,पनघट,
रीते मटके।
💧
सावन आवन,
कह गय साजन।
लगती ग्रीषम,
भूल भुलावन।
💧
तीज मनाई
राखी आई।
बंधन भूले,
मेघ रिसाई।
💧
झाँके नासा,
बजते ताशा।
ढोल नँगाड़ा,
करें तमाशा,
💧
आजा वर्षा,
हँसे जवासा।
वर्षा💧रानी
खेती आशा।
💧
धरा तृषित है,
कृषि पतित है।
कृषक जोहता,
मनो दमित है।
💧
तपता दासा,
चुभते फाँसा।
ऐसा आतप,
घोर निराशा।
💧
हँसे जवासा,
फिर भी आशा।
मत कर ऐसा,
आजा वर्षा।
💧
कृषक कृश यथा,
डिगे यश वृथा।
अप यश होना,
असमंजस था।
💧
खेला कैसा,
मनो पिपासा।
व्याकुल तन है,
गरमी जैसा।
💧
मोर हताशा,
हँसे जवासा।
चातक कहता,
वरषा💧वर्षा।
💧
तलैया काल,
नदी बे हाल।
ताल रिक्त हो,
रुके है चाल।
💧
रही,जिजिविषा,
मन जिज्ञासा।
तन मन हारे,
देय दिलासा।
💧
नौका आशा,
हँसे जवासा।
गैया चाहें,
बरसे💧वर्षा।
💧
रूंख विरूखे,
कुएँ विसूखे।
कृषक बुभुक्षे,
अंतस चीखे।
💧
मन के मन्शा,
खूब तलाशा।
झाँसा ,झूँठन,
ग्रीष्म तराशा।
💧
सबकी भाषा,
चलते श्वाँसा।
आए💧वर्षा,
मिटे निराशा।
💧
पपिहा तरषे,
आजा घर से।
हरष जवासा,
नयनन बरसे।
💧
दैव दुराशा,
शकुनी पासा।
नौबत बाजे,
होगा जलसा।
💧
प्राणी आशा,
हँसे जवासा।
हर मन चाहे,
वर्षा💧बरसा।
💧
वन्यज हर्षा,
गिरिवर तरषा।
कोयल कुहके,
बरसे💧बरषा।
💧
अच्छा खासा,
इनको हुलसा।
सर्वस💧दीखें,
कौआ प्यासा।
💧
चातक प्यासा,
हँसा जवासा।
कबतक चीखें,
आजा💧वर्षा।
💧
पान पताशा,
पूरित आशा।
भोग लगाएँ,
सर्वस भाषा।
💧
अबहि न आये,
हम गश खाये।
फिर का बरसे,
तू पछताये।
💧
कहीं प्रलय जल,
हमें अमर फल।
कहीं आज तक,
हमें नहीं कल।
💧
कहीं बाढ़ है,
बिनाषाढ़ है।
शहर तलैया,
कहीं खाड है।
💧
सब सम सरसा,
सबको हरषा।
समझ सयानी,
बरसो💧वरषा।
(जवासा=
एक झाड़ी)
© बाबू लाल शर्मा "बौहरा"
. *पानी है अनमोल*
. (दोहा छंद)
.
*क्षिति जल पावक नभ पवन,*
. *जीवन 'विज्ञ' सतोल।*
*जीवन का आधार वर,*
. *पानी है अनमोल।।*
.
मेघपुष्प ,पानी सलिल, आप: पाथ: तोय।
*विज्ञ* वन्दना वरुण की, निर्मल मति दे मोय।।
.
जनहित जलहित देशहित, जागरूक हो *विज्ञ*।
जीवन के आसार तब, जल रक्षार्थ प्रतिज्ञ।।
.
वारि अम्बु जल पुष्करं, अम्म: अर्ण: नीर।
उदकं, घनरस शम्बरं, *विज्ञ* रक्ष मतिधीर।।
.
सरिता तटिनी तरंगिणी, द्वीपवती सारंग।
नद सरि सरिता आपगा, जलमाला जलसंग।।
.
अपगा लहरी निम्नगा, निर्झरिणी जलधार।
सदा सनेही सींचती, करलो *विज्ञ* विचार।।
.
स्वच्छ रखो जल *विज्ञ* नर, नहीं प्रदूषण घोल।
नयन नीर नर नारि रख, पानी है अनमोल।।
.
✍© बाबू लाल शर्मा बौहरा
सावन
कह गये आवन,
साथिया साजन।
कब से निहारूँ,
आ गया सावन।💧
कलापि कलापे,
मोर जिय काँपे।
मैं रहुँ अन मनी,
अँखियाँ न झाँपे।💧
पावस व पावन,
आ गया सावन।
अबइ मनचाहत,
झुलन झुलावन।💧
कोयल चुप हुई,
मै गुम सुम हुई।
आ गया सावन,
चाह मचल गई।💧
ऋतु है सुहानी,
बात बतरानी।
अपनी हमारी,
मनकी जुबानी।💧
मान मन भावन,
आग सुलगावन।
चमके बिजुरिया
आ गया सावन।💧
कंचन कमावन,
हमहिं तड़पावन।
केश रजत भये,
आ गया सावन।💧
~~~~~~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा
सावन
. ( दोहा छंद )
. १
सावन शृंगारित करे, वसुधा, नारि, पहाड़।
सागर सरिता सत्यशिव, नाग विल्व वन ताड़।।
. २
दादुर पपिहा मोर पिक, नारी धरा किसान।
सबकी चाहत नेह जल, सावन सरस सुजान।।
. ३
नारि केश पिव घन घटा, देख नचे मन, मोर।
निशदिन सपन सुहावने, पिवमय चाहत भोर।।
. ४
लता लिपटती पेड़ से, धरा चाहती मेह।
जीव जन्तु सब रत रति, विरहा चाहत नेह।।
. ५
कंचन काया कामिनी, प्राकृत मय ईमान।
पेड़ लगा जल संचयन, सावन काज महान।।
.
© बाबू लाल शर्मा,"बौहरा"
. उल्लाला छंद विधान:--
सम मात्रिक छंद है,
२६ मात्रिक ( १३ + १३)
दोहा की तरह कल संयोजन
११ वीं मात्रा लघु रहे।
दो दो चरण समतुल्य हो।
. __सृष्टि सार संयोग__
जल ही जीवन है मनुज, करना सद उपभोग है।
जीव जगत वन वन्य हित, सृष्टि सार संयोग है।
सागर से वाष्पित करे, पवन सूर्य संयोग से।
नभ में जा घन श्याम हो, बने मेह शुभ योग से।
धरती पर बरसे जलद, चूनर धानी मात की।
खेत फसल वन बाग में, खुशहाली बरसात की।
वर्षा नीर सहेजिए, खेत मेड़ मजबूत जब।
घर में भी टाँका बना, पानी मिले अकूत तब।
बचे नीर भू सोखले, मिले कूप में नीर हो।
व्यर्थ बहे बहता चले, खारे सागर सीर हो।
नीर बचे प्राकृत बचे, जैव जगत वन वन्य भी।
नयन नीर मर्याद भव, नहीं कल्पना अन्य भी।
. _________
~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा बौहरा,
इन्द्रवज्रा छंद विधान:--
.------११ वर्ण------
चार चरण का छंद
दो दो चरण समतुकांत
तगण तगण जगण गुरु गुर
२२१ २२१ १२१ २ २
. __नैना झरे नित्य__
पानी गया डूब रही तलाई।
नैना झरे नित्य बही ललाई।
बापी कुएँ पोखर बंध खाली।
देखो बहे नीर निबंध नाली।
वर्षा हुई वारि बहाव रोको।
ये नीर हो व्यर्थ कृपालु टोको।
आकाश में सागर मूर्ख जाने।
पाताल में गागर 'विज्ञ' माने।
रोको बहे नीर सुजान सारे।
टोको यही आपद आज टारे।
पानी बिना धीर किसान खोए।
कैसे बिना नीर अनाज बोए।
टाँके बनालो जल रोकना है।
साथी सभी को यह टोकना है।
पानी बचे जीवन भावि मानो।
आओ सभी कीमत नीर जानो।
. ______
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. बरवै छंद विधान:--
बरवै छंद या बरवै दोहा
अर्द्ध सम मात्रिक छंद है।
विषम चरण-१२ (८+४)मात्रा
चरणांत गुरु(२ या११)
समचरण- ७ (४+३) मात्रा
चरणांत २१(गाल)
. पानी है अनमोल
. (बरवै छंद)
.
क्षिति जल अग्नि पवन नभ,
. मनुज सतोल।
जीवन है आधारित,
. जल अनमोल।।
.
मेघपुष्प ,जल, पानी , पाथ: तोय।
करनी *विज्ञ* वन्दना , मति दे मोय।।
.
जनहित जलहित वनहित, जागो *विज्ञ*।
जीवन की आशा जल, रक्ष प्रतिज्ञ।।
.
वारि अम्बु जल पुष्कर, अर्ण: नीर।
उदकं, घनरस शम्बर, रख मतिधीर।।
.
नद तटिनी तरंगिणी, सरि सारंग।
नद सरि सरित आपगा, पय जलसंग।।
.
लहरी नदी निम्नगा, नद जलधार।
नदियाँ सदा सनेही, *विज्ञ* विचार।।
.
स्वच्छ रखो जल हे नर, गंद न घोल।
नयन नीर का नर रख, जल अनमोल।।
. 💧
© ~~~बाबू लाल शर्मा बौहरा "
. आँसू छंद विधान:--
२८ मात्रा का एक चरण(१४+१४)
दो दो चरण समतुकांत
चार चरण का एक छंद
मात्रा बंटन :- २-८-२-२ के क्रम में
. __भू जल रक्षण__
धरती पर जीवन अमरित, है दिया ईश ने पानी।
सब जीव इसी से जन्मे, वन तरु नीर कहानी।
जल रखें सहेजे भू हित, तो बचा रहे भवजीवन।
अति दोहन हो जल का, विपदा का न्यौते नर्तन।
भू जल रक्षण संरक्षण ही, ये उपाय है बचने का।
दोहन कर बरबादी जल,की हर जीवन मरने का।
बरसाती जल को रोको, अब खेत खेत में टाँका।
घर घर भरो नीर भू तल, में नहीं कहीं हो नाका।
छत का जल नीचे लाएँ, भू गत टैंक बनालें हम।
जल की बूँद बूँद संग्रह, कर के नीर बचाओ तुम।
पानी से ही कल होगा, तरु वन जैव जंतु जीवन।
मानस बदलें हे मानव, जल सच्चा नैनों का धन।
. _________
~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा बौहरा,
*सूने पनघट...*
. .. *अब प्यासे*
. (लावणी छंद)
नीर धीर दोनो मिलते थे,
कान्ह संग राधे हासे।
समय एक,था कथा बने अब,
लगे आज गप्पे झाँसे।
मन की प्यास शमन करते वे,
सूने पनघट अब प्यासे।
मन की आशा, चुहल बात के,
सब ठीये स्वयं उदासे।
नारी वार्ता स्थल पनघट थे,
रमणी तकते मतवाले।
पथिकों का श्रम हरने वाले,
प्रेम प्रीत बतरस पाले।
पंछी जल की बूँद आस के,
अब थोथे हुए दिलासे।
मन की प्यास शमन करते वे,
सूने पनघट अब प्यासे।
तब बनिताएँ सरिताएँ हो,
नीर पिलाती भटकों को।
निश्छल वाणी ममता वाली,
धीर दिलाती पथिकों को।
कान्हा राधे की राहों में,
अब लगते घोर कुहासे।
मन की प्यास शमन करते वे,
सूने पनघट अब प्यासे।
पनघट संगत पनिहारिन भी,
राह निहारे गत बिसरी।
नीर भरी प्यासी अँखियाँ वे
बात पूछती रस मिसरी।
जरापने सब दुख ही पाते,
शेष सभी तो जग झाँसे।
मन की प्यास शमन करते वे,
सूने पनघट अब प्यासे ।
रीते सरवर ताल तलैया,
बापी कूप सूख सारे।
घट गागर भी लुप्त हुए हैं,
डोर धुरी खोए हारे।
दादी नानी बात कहानी,
जमघट तरसे परिहासे।
मन की प्यास शमन करते वे,
सूने पनघट अब प्यासे।।
रीत प्रीत से लोटा डोरी,
गले बंधे शुभ बंधन थे।
ललनाओं से चुहल कहानी,
निजपन के अनुबन्धन थे।
रिश्ते मय मर्याद ठिठोली,
पथ भटके दूध बतासे,
मन की प्यास शमन करते वे,
सूने पनघट अब प्यासे।।
सास ससुर की बाते करती,
रमणी भोली भाली सी।
करे शिकायत कभी प्रशंसा,
पनिहारिन मतवाली सी।
याद कहानी बसी रह गई,
वह पाएँ प्रीत कहाँ से।
मन की प्यास शमन करते वे,
सूने पनघट अब प्यासे।।
प्रेम कहानी घर के झगड़े,
मौन गवाही था सुनता।
कभी चुहल देवर भौजाई,
मन में ईश भजन गुनता।
जल घट रस्सी डोल मटकियाँ
अब दर्शन करूँ कहाँ से।
मन की प्यास शमन करते वे,
सूने पनघट अब प्यासे।।
पंछी,पथिक पाहुने प्रियजन,
गायों को भी जल देती।
वृद्धपीढ़ियों से अवसर पर,
पनिहारिन आयसु लेती।
सबको अपना हक मिलता था,
कब रीता कौन वहाँ से।
मन की प्यास शमन करते वे,
सूने पनघट अब प्यासे।।
वर्तमान की अंध दौड़ में,
संस्कृति भूले संस्कारी।
आभूषण पहने पनिहारिन,
परिधानों सँग पथ हारी।
याद रहे बस याद कहानी,
शुभ गुण अब हार हतासे।
मन की प्यास शमन करते वे,
सूने पनघट अब प्यासे।।
दंत खिलकती,नैन छलकती,
दो गागर ले कब फिसली।
देख दृष्य बाकी पनिहारिन,
मूक स्वरों में मन मचली।
खूब गवाही देता पनघट,
गायब सब खेल तमाशे।
मन की प्यास शमन करते वे,
सूने पनघट अब प्यासे।।
. _______
©~~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा
. प्रीत पुरानी
१६ मात्रिक मुक्तक
थके नैन रजनी भर जगते,
रात दिवस तुमको है तकते
चैन बिगाड़ा, विवश शरीरी,
विकल नयन खोजे से भगते।
नेह हमारी जीवन धारा।
तुम्हे मेघ मय नेह निहारा।
वर्षा भू सम प्रीत अनोखी,
मन इन्द्रेशी मोर पुकारा।
पंथ जोहते बीते हर दिन,
तड़पें तेरी यादें गिन गिन।
साँझ ढले मैं याद करूँ,तो,
वही पुरानी आदत तुम बिन।
यूँ ही परखे समय काल गति।
रात दिवस नयनों की अवनति।
तुम्ही हृदय हर श्वाँस हमारी,
आजा वर्षा मत कर भव क्षति।
बैरिन रैन कटे बिन सोये।
जागत सपने देखे खोये।
इन्तजार के इम्तिहान में,
कितने हँसते,कितने रोये।
प्रातः फिर अपने अवलेखूँ।
रात दिवस भव सपने देखूँ।
आजा अब तो निँदिया वर्षा,
तेरी यादें निरखूँ बिलखूँ।
धरा प्राण दे वर्षा रानी।
जीव त्राण दे हे दीवानी।
प्रीत पुरानी, यादें वादे,
पूरे करिये मन मस्तानी।
जग जानी पहचानी,धानी।
वही वही भू बिरखा रानी।
तुम मन दीवानी,अलबेली,
तो हम भी जन रेगिस्तानी।
-------------
बाबू लाल शर्मा,बौहरा,'विज्ञ'
. अनुष्टुप छंद विधान:-
. ---------
८ वर्ण का अर्द्ध समवृत छंद
चारो चरणों में
पहले ४ वर्ण स्वतंत्र, रहते हैं।
चारो चरणों की संरचना--
****१२२२, ****१२१२
****१२२२, ****१२१२
सम चरण सम तुकांत रहें।
. __जल सहेज ले__
जल की महिमा भारी,
मर्त्य जन्म जीव ले।
मनुज नीर आभारी,
याद कर अतीव ले।
नर सहेज पानी को,
भावि संतति भी रहे।
वन तरु रहे पंछी,
व्यर्थ जल नही बहे।
घर घर बना टाँके,
मेह जल सहेज ले।
जल नही वृथा जाए,
तू रख परहेज ले।
जमीन खेत मेड़ो से,
मेह में बिरवा लगा।
हरीतिमा वर्षा लाए,
अकाल को परे भगा।
. __________
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. "रूपमाला छंद विधान":--
२४ मात्रिक अर्द्धसममात्रिक छंद
२४ = १४(३२२ ३२२) + १०(३२२२१)
तीन सतकल चरणांत गाल
चार चरणीय छंद
दो दो पद समतुकांत हो।
. __नीर आँखो में रहा तो__
नीर सृष्टा की धरोहर, मनुज नीर सहेज।
पीर प्राणी की मिटाने, खर्च में परहेज।
नीर आँखों में रहा तो, देख ले हर पीर।
नीर महिमा ही बड़ी है, समझ लो सुधीर।
सरित सागर सर नदी भी, सत्य रखते नीर।
सभ्य मानव बस्तियाँ भी, पुरा इन के तीर।
वायु से ही जल बने यह,वायु जल से नेक।
प्राण वायू दो गुनी है, हाइ ड्रोजन एक।
बचा पानी को हमेशा, भूमि जन हित वीर।
जैव जंगल तरु पखेरू, प्राण चाहत नीर।
कुण्ड बनवा गेह बाबू, लाल शर्मा विज्ञ।
नीर है तो कल रहेगा, बनो दृढ़ी प्रतिज्ञ।
. _______
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. चौपइया छंद विधान:--
सम मात्रिक छंद प्रति चरण ३० मात्रा
१०,१८,३०वीं मात्रा पर यति
चरणांत गुरु या गुरु गुरु
चरण में प्रथम द्वितीय यति पर समांत।
(२-६-२, ६-२, ६-२-२+२)=३०
. __वर्षा जल__
१
जन मन अति प्यासा,बढ़ी
निराशा,
अब तो मेघा गाओ।
जब वर्षा बरसे, धरती हरषे,
दादुर गान सुनाओ।
हल बैल चलेंगें, खेत हँसेंगे,
बीज खाद ले आओ।
सब जागृत रहना, नीर न बहना,
घर घर टैंक बनाओ।
२
है जल ही जीवन, धरा सजीवन,
रखना नीर सँभाले।
जल सद उपयोगी, नर उपभोगी,
नीर न व्यर्थ बहाले।
कर जल की रक्षा, जैव सुरक्षा,
मत रह बैठे ठाले।
भू सृष्टि बचेगी, प्रकृति हँसेगी,
तब मन गीता गाले।
. ________
© बाबू लाल शर्मा, बौहरा, विज्ञ
. __अहीर छंद__
विधान:-- मात्रिक छंद मापनी रहित
११ मात्रिक छंद है, ८ वीं मात्रा लघु
होना अनिवार्य है।
चरणांत में जगण (१२१) अनिवार्य है।
दो दो चरण समतुकांत हो,
चार चरण का एक छंद होता है।
__देह मेह जल प्रीत__
प्रभु ने सब हित काज।
प्राकृत मय शुभ साज।
भू पर अनुपम रीति।
देह मेह जल प्रीत।
पावस ऋतु वरदान।
मेघ धरा अरमान।
भू पर मेघ मल्हार।
भू पर खुशी अपार।
घन जल अमृत समान।
मनुज मूल्य पहचान।
करें कद्र पय नीर।
बचे मनुज जल धीर।
मेह नेह धन मान।
बचे भावि नर जान।
जीव प्रकृति तरु हेतु।
जल ही जीवन सेतु।
. ________
©~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
: . "गजपति छंद"
विधान:--
८ वर्ण प्रति चरण का छंद
चार चरण,
दो दो चरण समतुकांत
नगण भगण लघु गुरु
१११ २११ १ २
__बचा जल सखे__
जल सदा परखना।
बचत नीर करना।
जल सजीवन करे।
वन हरे तन भरे।
जन सुनो जल बचे।
जन तभी भव नचे।
रख बचा जल सखे।
जग बचा जन रखें।
मनुज नीर न बहे।
वनज पीर न सहे।
तरु रहे द्रुम रहे।
जल बचे सब कहें।
कम विदोहन करें।
फिर धरा तल भरें।
पय बराबर सखे।
जल सजीवन रखे।
. ____
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
*उपेन्द्रवज्रा छंद विधान:--*
.------११ वर्ण------
चार चरण का छंद
दो दो चरण समतुकांत
जगण तगण जगण गुरु गुर
१२१ २२१ १२१ २ २
. __नीर निबंध नाली__
जलं डुबो डूब रही तलाई।
झरे नित्य बही ललाई।
नदी कुएँ पोखर बंध खाली।
सखे बहे नीर निबंध नाली।
सखे वारि बहाव रोको।
अनीति के कर्म कृपालु टोको।
प्रकाश का सागर मूर्ख जाने।
सुकाल में गागर 'विज्ञ' माने।
रुके बहे नीर सुजान सारे।
कहो यही आपद आज टारे।
जलं बिना धीर किसान खोए।
फँसे बिना नीर अनाज बोए।
कुएँ बनालो जल रोकना है।
सखे सभी को यह टोकना है।
रहे बचे जीवन भावि मानो।
सखे सभी कीमत नीर जानो।
. ______
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. " भृंग छंद "
विधान:-- २० वर्ण प्रति चरण
( १२,२० वें वर्ण पर यति )
चार चरण, दो-दो समतुकांत
नगण नगण नगण नगण, नगण नगण गुरु लघु
१११ १११ १११ १११,१११ १११ २ १
. ___गिरत फुहार___
घर घर मन भर मचल मचल गिरत फुहार।
दृग घट सम समय समझ पनघट पनिहार।
विकल विरहिनी विकट विपद मय तरस तीर।
रिमझिम झर झरत जलद भल बरसत नीर।
गरजत गरज गरज उमड़ घुमड़ बरसात।
चपल चमकती चटक चहकत गिर जात।
सरवर सरिता सरि सरित सरिस सहज झुंड।
घर घर हर तिय जल भरत घट घटित कुंड।
मनुज सुजन भरण करत भव हित जल बंध।
घन सजल सहज भवन भरत बरषत अंध।
सरस कलम कवि जन कवि मन रचियत छंद।
शुभम कथन सब सहित हित कहि मिटहि फंद।
. -------+-----
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. " पुण्डरीक छंद "
विधान :-- १२ वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत
मगण भगण रगण यगण
२२२ २११ २१२ १२२
. __घर नीर जान्हवी हो__
वर्षा आए हर काज मानवी हो।
कुण्डे खोदें, घर नीर जान्हवी हो।
पानी वाली,भव शान भारती की।
गंगा काशी, हर शाम आरती की।
आशा बोएँ, जल संग्रही बनें तो।
नैना रोये जल त्रासदी बने तो।
खेतों मेड़ों पर पेड़ भी लगालें।
मेघो से बारिश नीर को बुलाले।
डूबेंगे नाविक रेत नीर खोए।
बाँचेंगे भावि विनाश, प्राण रोए।
पानी से जीवन प्राण धीर ठानो।
छंदों की शान सहेज मीत मानो।
• ------+-----
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. " तोटक छंद "
विधान:-- प्रति चरण १२ मात्रा
चार चरण, दो-दो समतुकांत
सगण सगण सगण सगण
११२ ११२ ११२ ११२
__बिरखा जल क्यों बहना__
जल की महिमा सब ही कहते।
जन जीवन ही जल से मिलते।
गगरी जल की मन से रखना।
उस को ढँग से भरना ढँकना।
बरसे बिरखा जल क्यो बहना।
जल कुण्ड बना कर के भरना।
बगिया महके कपड़े धुलते।
बिरखा जल से सर भी भरते।
सबसे कहना सबकी सहना।
बिरखा जल व्यर्थ नही बहना।
रखना इसको हिय से मिलता।
सबके हित को जल ही सिलता।
. ________
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. " प्रहरण कलिका छंद "
विधान :-- १४ वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत हो।
नगण नगण भगण नगण लघु गुरु
१११ १११ २११ १११ १ २
. __तिय कुंडन जल भरती__
घर घर मन मानस मचल रहा।
दृग घट शुभ सावन सरस यहाँ।
विकल विरहिनी पनघट तरसे।
रिमझिम झर बादल जल बरसे।
गरज गरजती विकल बदलिया।
चपल चमकती गगन बिजलिया।
सरवर सरिता सरित विहँसती।
घर घर तिय कुण्डन जल भरती।
मनुज सुजन कुण्ड भरण करते।
घन सजल सहेज भवन भरते।
सरस कलम छंदस कवि रचता।
शुभम कथन सर्वस हित कहता।
. -------+-----
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. " मनोज्ञा छंद "
विधान :--- ७ वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत
नगण रगण गुरु
१११ २१२ २
__शुक कहे कहे रे__
जल बहे बहे रे।
शुक कहे कहे रे।
नर जगो उठो भी।
कुछ नये करो भी।
मनुज नीर आहें।
हृदय भाव चाहे।
सरल बोल वानी।
सजग रोक पानी।
जल करो सुरक्षी।
जल भरो सुकक्षी।
तृषित जीव सारे।
विवश वृक्ष हारे।
नर उपाय लाओ।
जल कक्ष बनाओ।
सब नीर बचाओ।
मत व्यर्थ बहाओ।
. --------+------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. घनश्याम छंद
विधान:--
प्रति चरण १६ वर्ण
६, १६ वें वर्ण पर यति
चार चरण, दो-दो समतुकांत
जगण जगण भगण भगण भगण गुरु
१२१ १२१ २११ २११ २११ २
. __किया जब नेह नीर__
कृपा कर नीर,देव धरा जल पीर हरो।
वृथा जल नष्ट,कार उन्हे अब दंड धरो।
विदोहन दुष्ट, जो कर नीर बिगाड़ वृथा।
उन्हे अब दण्ड, दे जल देव सुधार व्यथा।
रहा जल बीत, है बिन अंबु निभाव कहाँ।
निभे जग जीव, रीत धरापन भाव यहाँ।
किया जब नेह, नीर तभी जन जन्म हुआ।
रही कब कौन, रीति कहाँ जल को न छुआ।
सुनें सच बात, जीव यहाँ बच नीर रहे।
कहे कवि छंद, गीत दुखी मन नीर बहे।
किए जल नष्ट, भावि मरे जन नीर बिना।
बचे फिर कौन, 'विज्ञ' सहे सब पीर गिना।
.
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. " मौक्तिम दाम छंद "
विधान :-- १२ वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत
जगण जगण जगण जगण
१२१ १२१ १२१ १२१
. __भूमि बचे जब नीर__
सखे यह भूमि बचे जब नीर।
बचा जल मीत धरा जन पीर।
चढ़े नभ मेघ घने घन श्याम।
सचेतन मीत बना जल धाम।
भरो बिरखा जल भूतल मीत।
करो नर नीर पुरातन प्रीत।
तभी भव जीवन जंतु सजीव।
नहीं सब होय धरा निर जीव।
बहे जल मानव हार प्रमाण।
रहे तब जंगल जीवन त्राण।
उठो अब नीर सँभाल सुजान।
मही पर जीवन जोखिम मान।
समाज विकास कमान सँभाल।
दिखा कुछ नूतन मीत कमाल।
बना घर कुण्ड व खेत तलाव।
रहे जल भू तल मीत भराव।
. -----+----
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
.... गीत
. १६,१६
अब के सब कर्जे भर दूँगा,
बिटिया की शादी कर दूँगा।।
खेत बीज कर करी जुताई,
अब तो होगी बहुत कमाई।
शहर भेजना, सुत को पढ़ने।
भावि जीवनी उसकी गढ़ने।
गिरवी घर भी छुड़वा लूँगा,
बिटिया की शादी कर दूँगा।।
फसल बिकेगी,चारा होगा,
दुख हमने तो सारा भोगा।
अब वे संकट नहीं रहेंगे,
सहा खूब,अब नहीं सहेंगे।
दो भैंस दुधारू ला दूँगा,
बिटिया की शादी कर दूँगा।।
पका, बाजरा खूब बिकेगा,
छाछ मिलेगी, दूध बिकेगा।
घर खर्चो में रख तंगाई ।
घर वर देखूँ, करूँ सगाई।
फिर कमरा भी बनवा लूँगा,
बिटिया की शादी कर दूँगा।।
आस दिवाली मौज मनाऊँ,
सबको ही कपड़े दिलवाऊँ।
फसल पकेगी खूब निरोगी।
मौसम आए नहीं कुयोगी।
गृहिणी को झुमके ला दूँगा,
बिटिया की शादी कर दूँगा।।
.
✍© बाबू लाल शर्मा "बौहरा", *विज्ञ*
. " बुदबुद छंद "
विधान :-- ९ वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत
नगण जगण रगण
१११ १२१ २१२
__जल उपहार नेह का__
घन जल संग्रही बनो।
तरु वन जीव की सुनो।
जल पहुँचा पताल में।
कसर रही अकाल में।
घन जल शीश धारलो।
जलज विनाश वारलो।
जल बचना उजास है।
जन वन वन्य श्वाँस है।
घर घर कुण्ड लो बना।
घन जल हेतु योजना।
जल बहना विनाश है।
रख गहना विकास है।
जल हित 'विज्ञ' बौहरा।
जल उपदेश दोहरा।
जन रखवार मेह का।
जल उपहार नेह का।
. -------------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. " मलयज छंद "
विधान :-- ८ वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत
नगण नगण लघु लघु
१११ १११ १ १
__जल हितकर__
सरस विमल जल।
बरषत पल पल।
नर जग कुछ कर।
रख अमरित भर।
गगन कुसुम वर।
रख जल हितकर।
खग तरु पशु जन।
सब हित जन मन।
शुक पिक मछ बक।
जल पर रख हक।
सरि घट सरवर।
जल रख भर कर।
नर जल हितकर।
घर पथ जलघर।
सब हित रह यह।
गुरु कविजन कह।
. --+--
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
*मुक्तक- नेह प्यासे आज पनघट*
मापनी - २१२२ २१२२, २१२२ २१२२
१.
घाट तीरथ सभ्यताएँ, स्वाति सम तरसे किनारे।
चंद्र रवि शशि मेघ नीरस, ताकते नभ से सितारे।
खींच तन से रक्त भू का, क्यूँ उलीचा तोय मानुष।
खेत प्यासे पेड़ प्राणी, आज पंछी मौन सारे।
२.
शर्म आँखो की गई वह, भूमि-जल संगत सरूरी।
घाट-गागर में ठनी है, आज क्यूँ तन नेह दूरी।
हे छलावे दानवी मन, सत्य का पथ छोड़ने से।
नेह हारा नीर हारा , प्रीत की बाजी कसूरी।
३.
कूप नदियाँ ताल बापी, घाट वे जल नेह जमघट।
स्रोत रीते हो गये सब, नेह प्यासे आज पनघट।
आपदा को दे निमंत्रण, मर्त्य निज सपने सँजोए।
बोतलों में बन्द पनघट, याद भूलें कान्ह नटखट।
४.
वारि बिन वन पेड़ पौधे, जीव जंगम खेत सूने।
रेत पत्थर ईंट गारे, नीड़ सड़के नित्य दूने।
आज वसुधा रो रही माँ, देख सुत करतूत काली।
जल प्रदूषण भूलता नर, चल दिया आकाश छूने।
५.
नीर नयनों से निकलता, सागरों में बाढ़ आती।
सूखते बहु ताल नदियाँ, बाढ़ विप्लव गान गाती।
मानवी हर भूल माँगे, त्रासदी बन मूल्य समझो।
नीर दोहन देख भू की, धड़कती है आज छाती।
६.
आज मानव विश्व भर का, काल से बे हाल रोता।
रोग के आगोश में जो,भीरु नर निज प्राण खोता।
है विकल प्राकृत धरा नभ, चंद्र तारक सूर्य देखो।
होड़ के तम पंथ नाशक, बीज मानव आप बोता।
. *****
✍© बाबू लाल शर्मा बौहरा 'विज्ञ'
. " रथोद्धता छंद "
विधान:---- ११ वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत हो।
रगण नगण रगण लघु गुरु
२१२ १११ २१२ १ २
_ले कुदाल चल आज खेत में_
वीर पीर हर भूमि नीर की।
पेड़ जंतु खग ताल तीर की।
मेघ आज नभ चाल काल है।
देख अंत फिर मंद हाल है।
चेत धीर जन भाव भावना।
ले सहेज जल भूमि कामना।
मीत मान यह बात आज ले।
तो सुधार हर भाँति काज ले।
कूप कुण्ड भर ले विचार के।
खेत मेड़ कर ले सुधार के।
ले कुदाल चल आज खेत में।
हो सँभाल जल पंथ रेत में।
भावि पीढ़ि तब याद जानती।
नीर कुंड जल भोग मानती।
व्यर्थ नीर यदि आप ठेलते।
भावि भूत सब शाप झेलते।
. --------+--------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. " सुमति छंद "
विधान :- १२ वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत हो
नगण रगण नगण यगण
१११ २१२ १११ १२२
__सजीव अंबुज जन नाता__
बचत नीर से मनुज बचेगा।
जलज नीर से वनज रहेगा।
सुमति छंद है सरस सुहाना।
मनुज नीर से विहग बचाना।
गगन मेघ अंबुज बरसाता।
विवश वेग से जल बहजाता।
मनुज चेतना मय यदि गाता।
सतह खेत में जल बच जाता।
जल बचे कुआ घर बनवाओ।
सरल कुंडियाँ अब चिनवाओ।
कृषक खेत में सर खुदवा ले।
विविध योजना जल भरवाले।
पथ पदाति कुंडन जल हो वे।
जलद नीर व्यर्थ न जन खोवे।
सरस छंद पावन मन गाता।
लख सजीव अंबुज जन नाता।
. --------+-------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. " संयुत छंद "
विधान :--- १० वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत
सगण जगण जगण गुरु
११२ १२१ १२१ २
_जल देश का कल देश का_
नर नारि धीर सुधीर हो।
कवि माघ मीर कबीर हो।
रसपान पीर निवेश का।
रख मान 'विज्ञ' सुदेश का।
घन नीर को घर धार लो।
बह नीर पीर उबार लो।
जल देश का कल देश का।
रख नीर वीर स्वदेश का।
घर कूप कुण्डन खेत में।
जल धार ले रज रेत में।
जल आज है अब मेघ का।
कल राज है फिर रेत का।
अब ताल तो हर गाँव हो।
सब कूप नीर भराव हो।
घर खेत पंथ पडाव में।
जल कुण्ड हो हर गाँव में।
. ----+--- ~~~~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. .... नीर
नीर धरोहर सृष्टि की, रखलो इसे सहेज।
करना सद उपयोग है,अति दोहन परहेज।।
हो आँखों में नीर तो, देखे सब की पीर।
धरा नीर महिमा बड़ी,समझे लोग सुधीर।।
सागर सर सरिता सभी, सदा सुभागे नीर।
मनुज सभ्यता थी बसी,पुरा इन्ही के तीर।।
वायू से ही जल बने, जल से वायू मान।
आक्सीजन के दो गुणा,हाइ ड्रोजन प्रमान।।
. *ग्रीष्म*
. (सोरठा)
पंछी पथिक पदाति, झेल रहे लू ताप को।
थकित हुये सब भाँति,तन मन प्यासे नीर के।।
व्याकुल हैं मन प्यास,जड़ चेतन तरु जीव भी।
मोर पपीहे आस, विरहन कोयल पीव के।।
*जल*
. (सोरठा)
मानुष पौधे जीव, नीर बिना जीवन कठिन।
चाहत सभी सजीव, सजल रहे अपनी धरा।।
जल जीवन आधार, धरती पर अमरित यही।
बढ़ते पारावार, अटल क्षेत्र हिम गलन से।।
✍© बाबू लाल शर्मा, बौहरा
. कृपाण घनाक्षरी
विधान : - ३२ वर्ण(८८८८) प्रतिचरण
चार चरण समतुकांत
८,८,८,८ पर यति हो, एवं
चारो यति समतुकांत अनिवार्य
चरणांत गुरु लघु २१ (गाल)
. __वर्षा नीर__
माने जाने भू की पीर,
साथी सारे हैं जो धीर,
गायें पौधे कागा कीर,
रक्षे भैया वर्षा नीर।
ले कुदाली आओ बीर,
चेतो पानी रक्षा गीर,
वर्षा पानी औ समीर,
गो बचालें वर्षा नीर।
ध्यानी मानी हैं बे पीर,
पानी है तो है अमीर,
होली रंगोली अबीर,
रक्षें साथी वर्षा नीर।
बापी टाँके नदी तीर,
राखो तो साफ सुधीर,
दोहे गाए थे कबीर,
आओ रक्षे वर्षा नीर।
. +++++
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. " वर्ष छंद "
विधान: ---- ९ वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत
मगण तगण जगण
२२२ २२१ १२१
. __वर्षा पानी__
आँधी आई जागत भोर।
वर्षा रानी स्वागत तोर।
प्यासे पंछी गाय जमीन।
पानी लाओ चाहत दीन।
वर्षा पानी रोक किसान।
गाएँ ग्वाले भौमिक शान।
खेतों में कुण्डे बनवाय।
सूखे कूपों को झरवाय।
पानी का कुंडा घर शान।
राखो साथी नीर महान।
जाए पानी व्यर्थ कभी न।
रोके बाँधे मेड़ तभी न।
खेतो में हो संग मकान।
वर्षा पानी मीत मचान।
संरक्षा साथी कर आज।
धारें भैया मीत सुकाज।
. ----+---
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. जलहरण घनाक्षरी
विधान :-- ३२ वर्ण प्रति चरण
( ८८८८) १६,१६ पर यति
चार चरण समतुकांत
चरणांत लघु गुरु, या लघु लघु
. __नीर बहे__
मेघ घटा जल वर्षा
खेत खेत है सरसा
बाग पेड़ सर हर्षा
रोक जन नीर बहे।
नीर भावि जन शक्ति
उठो धीर मति व्यक्ति
वारि से हो अनुरक्ति
व्यर्थ यह नीर बहे।
जल कुंड बना घर
रख मेड़ बनाकर
कूप बापी बेरे भर
चेत नर नीर बहे।
उठ सब घर वाले
लख छत परनाले
जलहित नल डालें
सोच मत नीर बहे।
. ++++++
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. " विमल जला छंद "
विधान :--- ८ वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत हो।
सगण नगण लघु गुरु
११२ १११ १ २
_उठ अंबुज भरले_
जब नीरज खिलते।
खग गीत किलकते।
जब सूरज उगता।
अँधियार बिसरता।
नभ मेघ घुमड़ते।
घन घोर बरसते।
पय पावन बहता।
नर कायर सहता।
उठ अंबुज भरले।
शुभ काम सँवरले।
जल कूप पथ बहे।
घर कुंड जल रहे।
जल व्यर्थ न बहना।
कल जीवन रहना।
यह नीति सफल हो।
कवि छंद सरल हो।
. ------------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. "रत्नकरा छंद "
विधान:---- ९ वर्ण प्रति चरण
चार चरण, दो-दो समतुकांत हो।
मगण सगण सगण
२२२ ११२ ११२
. __वर्षा का जल संग्रह__
काहे नीर बहावत है।
पानी व्यर्थ लुटावत है।
प्यासी भूमि कहे नर से।
पौधे जंतु सभी तरसे।
वर्षा का जल संग्रह हो।
मेघों का नहि विग्रह हो।
कुंडों को जल से भरलो।
कूएँ खोद नये कर लो।
बापी स्वच्छ करें चल तो्।
पानी आज मिले कल तो।
आकाशी जल को रख लो।
भू के जीवन को रख लो।
प्राणों को जल ही रखता।
आओ नीर रखें ढँकता।
पानी जीवन का रचिता।
आओ छंद रचे कविता।
. -----+------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. मदन घनाक्षरी
विधान :- ३२ वर्ण (८८८८) प्रतिचरण
१६,१६ वर्ण पर यति
चार चरण समतुकांत
चलणांत २२ गुरु गुरु
__नीर जरूर बचाएँ__
वर्षा का नीर सहेजें
संदेश सभी को भेजें,
पुनर्भरण कर लो
व्यर्थ न नीर बहाएँ।
पेड़ लगाओ सब ही
मेड़ बनाओ तब ही,
खेत खेत जल कुंडे
घर भी कुंड बनाएँ।
कूप बावड़ी पोखर
भरे नीर वर्षा पर,
हर पथ कुण्ड बना,
बूंद बूंद जल लाएँ।
बाग बगीची घर की
अपनी हो या पर की,
वर्षा जल कुण्ड बना
नीर जरूर बचाएँ।
. +++++
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. सूर घनाक्षरी
विधान:-- ३० वर्ण(८८८६) प्रतिचरण
चार चरण समतुकांत
चरणांत की कोई शर्त नहीं है।
. __जल रक्षण__
मनुज भूल नादानी,
आज समय की मानी,
बचत वर्षा का पानी
सोचो कुण्ड बने।
नही बहा ये अमृत
बचा नीर से प्राकृत,
धरा हेतु है सुकृत
टांके कुण्ड बने।
ताल तलैया बापी
गहराई कब मापी,
रेत खेत तप तापी
कूएँ कुण्ड बनें।
घर हो या दफ्तर हो
ऊँचा हो कमतर हो,
जन मन सभी सुने
पक्के कुण्ड बने।
. -----+------
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. " रथ पद छंद "
विधान:--- ११ वर्ण प्रति चरण
चार चरण दो-दो समतुकांत हो
नगण नगण सगण गुरु गुरु
१११ १११ ११२ २ २
__जल भर लें कुण्डे__
रिमझिम बरषत है पानी।
महक चुनर तर है धानी।
रिझत फिरत मन गोरी है।
चमकत नयन कटोरी है।
तरुवर पशुधन की मौजे।
कृषिहर श्रमकर ही खोजे।
पनघट पथ अब सूना क्यों।
हरषत मन फिर दूना क्यों।
लजित नयन मन भावों में।
बिछुरत कछुक अभावों में।
चपल चमक दमकी जो है।
कड़क गरज बिजुरी वो है।
नर जन सब अब आओ तो।
कुछ तरुवर लगवाओ तो।
भर भर जल भर लें कुण्डे।
तपन सहन कर भी ठण्डे।
. ------+-------
✍©
बाबू लाल शर्मा, बौहरा, *विज्ञ*
सिकंदरा, दौसा राजस्थान
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