विज्ञ रचित- *प्रमुख २२सवैया छंद*
. *सवैया २२*
छंदों के कई प्रकारों में सवैया भी एक प्रकार का छंद है।
सवैया चार चरणों का समपाद वर्ण छंद है। वार्णिक वृत्तों में २२ से २६ वर्ण प्रति चरण वाले, जिनमें चार चरण समतुकांत हो,और मापनी आधारित लिखें हो ऐसे जाति छंदों को सामूहिक रूप से हिन्दीशास्त्र में सवैया कहते हैं।
इस प्रकार सामान्य जातिवृत्तों से बड़े और वर्णिक दण्डकों से छोटे छंद को सवैया समझ सकते हैं।
तुलसीदास जी एवं रसखान जी जैसे कविजन दो या अधिक सवैयों के मिश्रण से भी रचना करते थे जिन्हे 'उपजाति सवैया' कहतें हैं।
हिन्दी साहित्य में प्रचलित २२ सवैये क्रमश: निम्न प्रकार मय विधान एवं रचना-उदाहरण के लिख रहा हूँ।
---- ~~~~~~~~बाबूलालशर्मा विज्ञ
१. मदिरा सवैया
. ( वर्णिक छंद )
विधान :--
चार चरण
२२ वर्ण प्रति चरण
१०-१२ वर्ण पर यति,
चरणान्त गुरु,
(२११×७) +२
(भगण×७) +गुरु
चारो चरण समतुकांत !
. _____
. माँ
. ______
उत्सव फाग बसंत तभी
जब मात महोत्सव संग मने।
जीवन प्राण बना अपना,
तन माँ अहसान महान बने।
दूध पिये जननी स्तन का,
तन शीश उसी मन आज तने।
धन्य कहें मनुजात सभी,
जन मातु सुधीर सुवीर जने।
. ..........
भाव सुनो यह शब्द महा,
जनमे सब ईश सुसंत जहाँ।
पेट पले सब गोद रहे,
अँचरा लगि दूध पिलाय यहाँ।
मात दुलार सनेह हमें,
वसुधा मिल मात मिसाल कहाँ।
मानस आज प्रणाम करें,
धरती बस ईश्वर मात जहाँ।
. .........
पूत सुता ममता समता,
करती सम प्रेम दुलार भले।
संतति के हित जीवटता,
क्षमता तन त्याग गुमान पले।
आँचल काजल प्यार भरा,
शिशु देय पिशाच बलाय टले।
आज करे पद वंदन माँ,
पद पंथ निशान पखार चले।
. ..........
पूत सपूत कपूत बने,
जग मात कुमात कभी न रहे।
आतप शीत अभाव घने,
तन जीवन भार अपार सहे।
संत समान रही तपसी,
निज चाह विषाद कभी न कहे।
जीवन अर्पण मात करे,
तब क्यों अरमान तमाम बहे।
............
©~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा विज्ञ
.२. सुखी सवैया
विधान:- आठ सगण + लघु लघु
११२×८+११(१२,१४ पर यति)
. .......
. फागुन
. . .........
जब से यह फागुन माह लगे,
तब से मन चाह बसंत समेटन।
अरदास करुँ ,भगवान भजूँ,
असमान तकूँ,अरमान सहेजन।
मन भावन सावन याद करूँ,
तब आय न साजन वे दिन सालन।
प्रभु से मन से विनती करती,
अब साजन बाँह जरूर मरोरन।
. . ..........
©~~~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा विज्ञ
३. सुख सवैया
विधान:-आठ सगण + लघु गुरु
११२×८+१२(यति १२,१४ पर)
. ------------
. फागुन
. ...........
जब से यह फागुन माह लगे,
तब से मन चाह सु रंग समेटने।
अरदास करुँ ,भगवान भजूँ,
असमान तकूँ,अरमान सहेजने।
मन भावन सावन याद करूँ,
तब आय न साजन वे दिन सालने।
प्रभु से मन से विनती करती,
अब साजन बाँह जरूर मरोरने।
. .........
©~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा विज्ञ
४. दुर्मिल सवैया
विधान:- आठ सगण ११२×८
१२,१२यति,४चरण समतुकांत
. ........
. विरहा
. ........
पिक बोल सुने,तड़पे विरहा,
मन मोर शरीर सखी हुलसे।
अब रंग बसंत चढा सबको,
तन आज मसोस रही मन से।
वन मोर नचे तितली भँवरे,
सब मीत बनात फिरे कब से।
पिय सावन आ कर लौट गये,
तब से न मिली तन से उनसे।
. ......
भँवरे रस पान करे फिरते,
तितली मँडराय रही रस को।
पिक कूजत पीव मिले मन के,
वन मोर चहे वसुधा रस को।
बस रंग बसंत यही समझे,
अब खंजन लौट रहे घर को।
मम कंत बने हुलियार सखी,
मन चाहत पीव मिले मन को।
. ..........
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा
५. किरीट सवैया-
विधान:--
२११×८ भगण× ८
२४ वर्ण, १२,१२ पर यति
चार पद समतुकांत
. ----------
चाह शहादत मानस भारत
. --------------
भारत देश महान बने सब,
लोग निरोग रहे जन भावन।
मेल मिलाप रहे सब धर्मन,
जाति सबै मिल देश बनावन।
सीम सुरक्ष करे बल सैनिक,
शत्रु बिसात पड़े कस आवन।
*लाल* हमार स्वदेश हिते सब,
मानव मानस मान मनावन।
रीत सु प्रीत निभे अपनी बस,
चाह शहादत मानस भारत।
आन निभे अरमान निभे सब,
देश हितैष निछावर चाहत।
आज यही बस है मन मे अब,
काज करूँ मन मानुष राहत।
मानवता हित जीवन अर्पण,
दूर सभी कर भारत आरत।
शान तिरंग सँभाल सकूँ बस,
मान स्वदेश सदा अपना पन।
जन्म मिले फिर भारत मानुष,
तो बलिदान करूँ अपना तन।
जीवन ज्योति चले मन में बस,
याद शहीद यही जपना मन।
देश समाज सुकाज करूँ नित,
भाव रचूँ कविता मन भावन।
साहित साधन साज सरे सब,
शान सुराज सुरक्षण भारत।
गीत लिखूँ ममता समता जब,
मीत सुरीत समाज निभावत।
भाव स्वभाव भरे तन भीतर,
मानव मानस प्रीत कहावत।
संकट हो जब देश धरा पर,
मानस चाहत *लाल* शहादत।
पास पडौ़स छिपे कुछ दानव,
काज करे नित मान अपावन।
मानवता पर भार कलंकित,
केवल ये धन लोभ लुभावन।
दीन जिहाद विधर्म सने मन,
चाहत है बस स्वर्ण कमावन।
द्वेष भरे यह काम करे बस,
मानव मानस *लाल* सतावन।
भारत भूमि मिले हर जीवन,
दूँ अपना तन भारत अर्पण।
दुश्मन के दिल चीर करूँ पर,
देश हितैष करूँ न समर्पण।
दुष्ट जनों हित होकर दानव,
मार करूँ उनका फिर तर्पण।
छंद रचूँ मन चेतन हो जन,
देखि सके मुख आपन दर्पण।
. --------
©~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा विज्ञ
६. सुमुखि सवैया छंद
विधान:-- सात जगण + लघु गुरु
१२१ × ७ + १२,
११,१२ वर्ण पर यति,
दो पद सम तुकांत
. .........
. हुलियार
. ..........
बसंत चले पुरवाइ थमे ,
. तब,भोर सुहावन लागि भली।
अनाज पके,सरसों सिमटे,
. मन मोर नचे मन चाह अली।
गुलाब,कनेर गुँथे गजरे,
. रमणी मिलने मनमीत चली।
दिनेश तजी निज शीतलता,
. मन होलिन मानस प्रीत पली।
. .........
सुरंग,गुलाल अबीर लिए,
. हुलियार बने सब साथ चले।
कन्हाइ बने सिरमौर सभी,
. मन चाह सखी सब गैल मिले।
छिपाइ सखी वृष भानु सुता,
. तब पीपल पेड़ विशाल तले।
निगाह पड़ी सब की उन पे,
. फिर खूब सुरंग गुलाल मले।
. . ..........
सनेह सुधारस पान किए,
. सब गोरि कपोल अबीर सने।
सखी वृषभानु सुता मिलके,
. तब कान्ह सखा सब संग जने।
मचा हुड़दंग अबीर उड़े,
. हुलियार विचित्र चरित्र बने।
कहीं तन रंग सने मन में
. कछु लाजन लाल कपोल घने।
. ..........
©~~~~~~~~बाबूलालशर्मा
७. मत्तगयंद सवैया
विधान:--
. भगण × ७ + २ गुरु,
. (२११×७ +२२)
. १२,११ वर्ण पर यति
( चार चरण सम तुकांत )
. ........
. शहादत
. ......
देश धरा पर संकट हो तब,
रक्षक वीर करे रखवाली।
सैनिक के बल सोय रहे सुख,
जीम रहे हम भोजन थाली।
चौकस धीरज धारक सैनिक,
शान सपूत रहे वन माली।
आन निभा कर मान रखे वह,
रीत शहीद नई रच डाली।
. .....
बारिश शीत सहे हिम आतप,
शस्त्र रखे अरि शूल मिटाए।
देश रखे निज वेष रखे वह,
मान शहीद बड़े कहलाए।
गर्व करे हम वीर सभी पर,
धीर सपूत धरा पर जाए।
और सगर्व रहे मम भारत,
रक्षक वीर शहीद कहाए।
. . .....
वीर करे बलिदान धरा हित,
मात समान मही वह माने।
जन्म मिले इस भारत भू पर,
अंतिम चाह शहादत जाने।
सीम हिमालय पर्वत तीरथ,
रेत नदी सब चाह सजाने।
शत्रु मार भगा निज ताकत,
शान शहादत रीत रचाने।
. ......
मान करे हम मीत शहादत,
रीत सु प्रीत सदा यश गाएँ।
प्राण दिए उन मात धरा हित,
आज सभी मिल मान बढ़ाएँ।
ईश समान रहे बन रक्षक,
मूरत सुंदर साज सजाएँ।
देश धरा यश मान शहादत,
वे परिवार सभी अपनाएँ।
. ...........
पाक अराजकता कर कायर,
मानव बम्म दगेे पुलवामा।
वीर बयालिस भारत भू सुत,
छोड़ गये परिवार व वामा।
देश शहीद समाज कहे पर,
वे भगवान बसे सुर धामा।
आज करे प्रण मान धरा हित,
पावन मंदिर मस्जिद जामा।
. .........
©~~~~~~~बाबू लाल शर्मा "बौहरा
८. अरसात सवैया
विधान: --
. २११×७+२१२
भगण × ७+ रगण
( भगण भगण भगण भगण
भगण भगण भगण रगण)
चार चरण सम तुकांत हो।
. ...........
. भावन भारती
. .......
भारत भाग्य विधान बना तब
लोक सभी मन भावन भारती।
वीर शहादत याद करें सब
लोग करे मन पावन आरती।
शासन भार सँभाल लिया जन
लोक भला सब साधन धारती।
पूत सपूत सभी सुत भारत
हेतु भला सरकार विचारती।
. ______'
पूत सपूत कपूत सभी हित
मात समान रहे मन पालती।
चोट खसोंट लगे तन के सुत
मात हिये तब आपद सालती।
बाग गुलाब कनेर सभी द्रुम
फूल सुशोभित मालिन मालती।
आपद कष्ट सुने जब संतति
भाँति अनेक विधा कर टालती।
. ______
© बाबू लाल शर्मा, बौहरा, विज्ञ
९. मातंगी सवैया
विधान: --
प्रति चरण (पंक्ति,) ३६ मात्रा १८ वर्ण,
२२२ × ६
(मगण मगण, मगण मगण, मगण मगण।)
१२, २४, ३६ मात्रा या
६,१२,१८,वर्णों पर यति
चार चरण सम तुकांत हो
. _______
. आओ साथी
. .......
वर्षा भी आएगी, खेती भी झूमेंगी,
झूले डाले जाएँ।
भीगेंगे भागेंगें, खेलेंगे खाएंगे,
ठाले बैठें गाएँ।
आओ साथी सारे, पौधे पानी लाओ,
गड्ढे खोदें आएँ।
आजादी भाती है, मैना गाना गाती,
आओ खाना खाएँ।
. ________
गंगा की धारा का, पानी प्यारा मीठा,
आओ साथी पीलें।
गंगोत्री से आती, मैदानों को भाती,
माँझी काहे ढीले।
खेतो को हर्षाती, गोते मारे हाथी,
दीखे काले नीले।
सर्दी ले आती है, गर्मी में गाती है,
गंगा रेती टीले।
. ________
© ~~~~~~~~~बाबू लाल शर्मा, बौहरा, विज्ञ
१०. चकोर सवैया
विधान: --
(भगण भगण भगण भगण
भगण भगण भगण + गुरु लघु)
. (२११ × ७ + २१)
चार चरण समतुकांत हो
. __पुरन्दर__
राजत राजन में चतुरानन
मानस उच्च लगे जस बाज।
सुन्दर सोच विचार पुरन्दर
भू हित साधक सावन साज।
खेत हरे मन भाव भले तन
उत्तम सोच बनाकर आज।
भारत भूमि सदा मन भावन
आप सहेज रखो सुर राज।
. __मनमोहन__
बालक आँगन में चलता तब
आँचल छोर कसे निज मात।
दौड़ रहा जब द्वार दिशा तब
अंगुलि पोर कसे निज तात।
खेल रहे द्वय संग खड़े लड़
हाथ छुड़ा भगता निज भ्रात।
दूर खड़ी वृषभानु सुता मन
चाह रही मन मोहन बात।
. ______
© ~~~~~~~~~बाबू लाल शर्मा, बौहरा, विज्ञ
११. अरविंद सवैया
विधान:--
. ११२ × ८ + १
(सगण सगण सगण सगण सगण
सगण सगण सगण + लघु )
. चार चरण सम तुकांत हो।
. __यशगान__
कहते सब कृष्ण भजो मन में
वृषभानु सुता हँसती भगवान।
यसुदा कहती सुन कृष्ण भगे
मत आज सुधार रहूँ तव शान।
वसुधा जननी वर भाग सुनो
जिन अंक पले प्रभु जी मय मान।
लिखता पढता कविता कवि जो
शुभ भाव रखे मन मेंं यशगान।
. __सुत नंद__
वन में जन के मन में तन में
रहते बसते हँसते सुत नंद।
तपसी जन संत रहे तुम को
सब ठौर निहार थके मतिमंद।
जल में थल में घर में तरु में
हर ओर उजास करे नभ चंद।
फल में दल में अब भी कल भी
वन बाग पहाड़ मिले मूचुकंद।
. _________
© ~~~~~~~~~~बाबू लाल शर्मा, बौहरा, विज्ञ
१२. महा भुजंगप्रयात सवैया
विधान:--
१२२ × ८ ( यगण यगण यगण
यगण यगण यगण यगण यगण)
चार चरण , सम तुकांत हो
. __लिखूँ छंद तेरे__
हमारा भरोसा यही है प्रदाता।
प्रभो बाग मेरे तुम्ही हो बहारे।
चली नाव मेरी नदी घाट ढूँढे।
प्रभो बोझ भारी इसे पार तारे।
बनाऊँ सुनाऊँ लिखूँ छंद तेरे।
दया हो प्रभो कष्ट काटो हमारे।
कहानी लिखूँगा तुम्हारी गुमानी।
रचूँ काव्य दोहा सवैया तुम्हारे।
. -----------
हमेशा अनेको कथाएँ सुनाते।
इसी हेतु मैने चटाई बुनी है।
पधारो यहाँ बैठ बातें करेंगे।
दया की दवा प्रेम पाने चुनी है।
धरा भारती मानवी आज चाहे।
मिटाओ सभी कष्ट भारी ठनी है।
हरो द्वेष सारे दुखो की कहानी।
बनादो सुहानी नही जो बनी है।
. -----------
युगों से यही पीर देखी सुनाई।
लिखे लेखनी गीत मेरी कहानी।
कभी तो पढ़ोगे दुखों के दहाने।
खड़ी है यहाँ नाव देखो पुरानी।
विवादी हुआ जीव नेकी गँवाता।
बिना बात भारी हताशा बखानी।
भलाई बुराई सभी रोग भारे ।
सुरक्षा प्रतीक्षा सनेही सुजानी।
. _______
© ~~~~~~~~~~बाबू लाल शर्मा, बौहरा, विज्ञ
१३. वागीश्वरी सवैया
विधान:--
१२२ × ७ + १२ ( यगण यगण यगण
यगण यगण यगण यगण लघु गुरु)
चार चरण , सम तुकांत हो
. __नाव देखो वृथा__
हमारा भरोसा यही है प्रदाता।
प्रभो बाग मेरे तुम्ही हो सखे।
चली नाव मेरी नदी घाट ढूँढे।
प्रभो बोझ भारी इसे भी रखें।
बनाऊँ सुनाऊँ लिखूँ छंद तेरे।
दया हो प्रभो कष्ट भारी चखे।
कहानी लिखूँगा तुम्हारी गुमानी।
रचूँ काव्य दोहा सवैया लखे।
. -----------
हमेशा अनेको कथाएँ सुनाते।
इसी हेतु मैने चटाई बुनी।
पधारो यहाँ बैठ बातें करेंगे।
दया की दवा प्रेम पाने चुनी।
धरा भारती मानवी आज चाहे।
मिटाओ सभी कष्ट भारी ठनी ।
हरो द्वेष सारे दुखो की कहानी।
बनादो सुहानी नही जो बनी।
. -----------
युगों से यही पीर देखी सुनाई।
लिखे लेखनी गीत मेरी व्यथा।
कभी तो पढ़ोगे दुखों के दहाने।
खड़ी है यहाँ नाव देखो वृथा।
विवादी हुआ जीव नेकी गँवाता।
बिना बात भारी हताशा यथा।
भलाई बुराई सभी रोग भारे ।
सुरक्षा प्रतीक्षा सनेही कथा।
. _______
© ~~~~~~~~~~बाबू लाल शर्मा, बौहरा, विज्ञ
१४. सुंदरी/माधवी सवैया
विधान:--
. ११२ × ८ + २
(सगण सगण सगण सगण सगण
सगण सगण सगण + गुरु )
. चार चरण सम तुकांत हो।
. __सुख दानी_
कहते सब कृष्ण भजो मन में
वृषभानु सुता करती मनमानी।
यसुदा कहती सुन कृष्ण भगे
मत आज सुधार रहूँ अभिमानी।
वसुधा जननी वर भाग सुनो
जिन अंक पले प्रभु जी सुख दानी।
लिखता पढता कविता कवि जो
शुभ भाव रखे मन मेंं जिद ठानी।
. ____नभ चंदा__
वन में जन के मन में तन में
रहते बसते हँसते सुत नंदा।
तपसी जन संत रहे तुम को
सब ठौर निहार थके मतिमंदा।
जल में थल में घर में तरु में
हर ओर उजास करे नभ चंदा।
फल में दल में अब भी कल भी
वन बाग पहाड़ मिले मूचुकंदा।
. ________
~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
१५. वाम सवैया
विधान:- सात जगण + यगण
१२१ × ७ + १२२,
दो पद समतुकांत,चार चरण का एक छंद
. .........
. __लाजन लाल कपोल__
. ..........
बसंत चले पुरवाइ थमे ,
. तब,भोर सुहावन लागि भली है।
अनाज पके,सरसों सिमटे,
. मन मोर नचे मन चाह अली है।
गुलाब,कनेर गुँथे गजरे,
. रमणी मिलने मनमीत चली है।
दिनेश तजी निज शीतलता,
. मन होलिन मानस प्रीत पली है।
. .........
सुरंग,गुलाल अबीर लिए,
. हुलियार बने सब साथ चले वे।
कन्हाइ बने सिरमौर सभी,
. मन चाह सखी सब गैल मिले वे।
छिपाइ सखी वृष भानु सुता,
. तब पीपल पेड़ विशाल तले वे।
निगाह पड़ी सब की उन पे,
. फिर खूब सुरंग गुलाल मले वे।
. ..........
सनेह सुधारस पान किए,
. सब गोरि कपोल अबीर सने थे।
सखी वृषभानु सुता मिलके,
. तब कान्ह सखा सब संग जने थे।
मचा हुड़दंग अबीर उड़े,
. हुलियार विचित्र चरित्र बने थे।
कहीं तन रंग सने मन में
. कछु लाजन लाल कपोल घने थे।
. ..........
©~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
१६. मोद सवैया
विधान :--
चार चरण, समतुकांत
चरणान्त गुरु,
(२११×५) +२२२+११२+२
(भगण×५) + मगण + सगण + गुरु
चारो चरण समतुकांत !
. ...........
. __धरती पर माँ ही ईश बताए__
. .............
शीश झुके इस भू हित में
मिट जाय धरा माँ भारत पे ही।
वीर शहीद धरा जनमें
हित युद्ध किये हैं आरत के ही।
धीर सपूत अनेक हुये
कवि काव्य रचे हैं चाहत में ही।
पीड़ित पूत धरा पर जो
मनुजात वही है आहत नेही ।
. ...........
भाव सुनो यह शब्द सखे
हम हैं सब, माता ईश्वर जाए।
पेट पले सब गोद रहे
अँचरा लगि, माता दूध पिलाए।
मात दुलार सनेह हमें,
वसुधा पर, माँ के कारण आए।
मानस आज प्रणाम करें,
धरती पर, माँ ही ईश बताए।
. .........
पूत सुता ममता समता
करती सम, भारी नेह भलाई।
संतति के हित जीवटता
क्षमता तन, त्यागे गेह कमाई।
आँचल काजल प्यार भरा
शिशु देय पिशाची हाय टलाई।
आज करे पद वंदन माँ
हित पंथ निशानी पूज्य कहाई।
. ..........
पूत सपूत कपूत बने
जग मात कुमाता हो न कभी जो।
आतप शीत अभाव घने,
सह जीवन, भारी भार सभी जो।
संत समान रही तपसी
निज चाह विरागी तान तभी जो।
जीवन अर्पण मात करे
बस पूत कपूती आस निभी जो।
..........
~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
१७. मुक्ताहरा सवैया
विधान:- आठ जगण
१२१ × ८
(जगण जगण जगण जगण
जगण जगण जगण जगण)
चार चरण सम तुकांत
. .......
. मानस प्रीत विधान
. ..........
बसंत चले पुरवाइ थमे ,
. तब,भोर सुहावन लागि किसान।
अनाज पके,सरसों सिमटे,
. मन मोर नचे मन चाह वितान।
गुलाब,कनेर गुँथे गजरे,
. रमणी मिलने मनमीत मचान।
दिनेश तजी निज शीतलता,
. मन होलिन मानस प्रीत विधान।
. .........
सुरंग,गुलाल अबीर लिए,
. हुलियार बने सब साथ विभात।
कन्हाइ बने सिरमौर सभी,
. मन चाह सखी सब गैल सुहात।
छिपाइ सखी वृष भानु सुता,
. तब पीपल पेड़ चढे छिप पात।
निगाह पड़ी सब की उन पे,
. तब डाल सुरंग गुलाल हठात।
. ...........
सनेह सुधारस पान किए,
. सब गोरि कपोल अबीर सनेह।
सखी वृषभानु सुता मिलके,
. तब कान्ह सखा सब संग सदेह।
मचा हुड़दंग अबीर उड़े,
. हुलियार विचित्र चरित्र विदेह।
कहीं तन रंग सने मन में
. कछु लाजन लाल कपोलन नेह।
. ..........
©~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
१८. लवंगलता सवैया
विधान:- आठ जगण + लघु
१२१ × ८ + १
(जगण जगण जगण जगण
जगण जगण जगण जगण +लघु)
चार चरण सम तुकांत
. .......
. मन चाह नटे कब
. ..........
बसंत चले पुरवाइ थमे ,
. शुभ भोर सुहावन लागि सबै जब।
अनाज पके,सरसों सिमटे,
. मन मोर नचे मन चाह नटे कब।
गुलाब,कनेर गुँथे गजरे,
. रमणी मिलने मनमीत मचे अब।
दिनेश तजी निज शीतलता,
. मन होलिन मानस प्रीत पले तब।
. .........
सुरंग,गुलाल अबीर लिए,
. हुलियार बने सब साथ गुणी जन।
कन्हाइ बने सिरमौर सभी,
. मन चाह सखी सब गैल सुहावन।
छिपाइ सखी वृष भानु सुता,
. तब पीपल पेड़ चढे छिपते तन।
निगाह पड़ी सब की उन पे,
. तब डाल सुरंग गुलाल हठी मन।
. ...........
सनेह सुधारस पान किए,
. सब गोरि कपोल अबीर सनेहन।
सखी वृषभानु सुता मिलके,
. तब कान्ह सखा सब संग सहेजन।
मचा हुड़दंग अबीर उड़े,
. हुलियार विचित्र चरित्र विदेहन।
कहीं तन रंग सने मन में
. कछु लाजन लाल कपोलन नेहन।
. ..........
©~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
१९ . सर्वगामी सवैया
विधान :--
२२१ × ७ + २२
(तगण तगण तगण तगण
तगण तगण तगण + गुरु गुरु)
चार चरण समतुकांत
. --------------------
. __सौंधी रुहानी जवानी मिली__
. ---------------
होली मचे फाग गाए घुटे भंग
आओ चलें आज आजाद मेले।
पंछी पिया नाच गाए घुले रंग
साथी नये ढूँढ त्यागें झमेले।
मैं तो हुई आज बेचैन हे श्याम
झूले नये डाल दो आज खेलें।
गाओ प्रिये फाग की राग में गीत
आया गया पर्व कौड़ी न धेले।
...... _______
आसान है यों चले भी कहीं शाम
गाते रहें गीत गीता नवेली।
बागान मे भी बहे गंध की वात
जूही लता फूल गेंदा चमेली।
आवाज देती हवाएँ चले प्रात
धीमी सुहानी नदी भी अकेली
सौंधी रुहानी जवानी मिली मौज
त्योहार माने कहाँ आज ठेली।
. _________
~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
२०. आभार सवैया
विधान:--
२२१ × ८
(तगण तगण तगण तगण
तगण तगण तगण तगण)
चार चरण समतुकांत
. --------------------
. होली
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होली मचे फाग गाए घुटे भंग
आओ चलें आज हों संग आजाद।
पंछी पिया नाच गाए घुले रंग
साथी नये ढूँढ त्यागें चले याद।
मैं तो हुई आज बेचैन हे श्याम
झूले नये डाल दो आज के बाद।
गाओ प्रिये फाग की राग में गीत
आया गया पर्व कौड़ी न आबाद।
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आसान है यों चले भी कहीं शाम
गाते रहें गीत गीता नये ढंग।
बागान मे भी बहे गंध की वात
जूही लता फूल गेंदा रमे भंग।
आवाज देती हवाएँ चले प्रात
धीमी सुहानी नदी में नये रंग।
सौंधी रुहानी जवानी मिली मौज
त्योहार माने कहाँ कौन के संग।
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~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा विज्ञ
२१. गंगोदक सवैया
विधान:--
. २१२ रगण × ८
रगण रगण रगण रगण
रगण रगण रगण रगण
चार चरण समतुकांत हो
. __भारती__
.
भारती की बने शान ऐसे करो,
काम तो नित्य गावें सभी आरती।
आरती ये सखे होय आवाम मे,
वीर की माँ सुने गीत माँ टालती।
टालती पीर कैसे हमारे हैं सभी,
आज तेरे पड़ी चोट जो सालती।
सालती पाक आगे यही राग हो,
बाज़ ये पालती वीर माँ भारती।
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आरती गान भी सैन्य का मान है
ये तिरंगा सदा देश की शान हो।
आइये आप भी नाद ये बोल दें
शीश दानी कही बात का मान हो।
गाइये कृष्ण गीता नये जोश से
पार्थ गाण्डीव से तेज ही बान हो।
एक हो देश ऐसी रहे भावना
भारती मात का नित्य ही ध्यान हो।
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~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
२२. मंदारमाला सवैया
विधान:--
. २ + २१२( रगण ) × ७
गुरु + रगण रगण रगण
रगण रगण रगण रगण
चार चरण समतुकांत हो
. __नित्य ही ध्यान हो__
.
माँ की बने शान ऐसे करो काम
तो नित्य गावें सभी आरती।
ऐसे सखे होय आवाम मे वीर
की माँ सुने गीत जो टालती।
वे वीर कैसे हमारे हैं सभी आज
तेरे पड़ी चोट जो सालती।
हे पाक आगे यही राग हो बाज़
यों पालती वीर माँ भारती।
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ये गान भी सैन्य का मान है ये
तिरंगा सदा देश की शान हो।
लो आप भी नाद ये बोल दें
शीश दानी कही बात का मान हो।
गा कृष्ण गीता नये जोश से
पार्थ गाण्डीव से तेज ही बान हो।
हो भावना देश ऐसा रहे आज
से मात का नित्य ही ध्यान हो।
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✍©
बाबू लाल शर्मा "बौहरा" विज्ञ
सिकंदरा, दौसा, राजस्थान
पिन ३०३३२६
mob. no. ९७८२९२४४७९
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